Thursday, April 10, 2008

लल्ला चुंगी की चाय बैठकी ....

याद आती है हमें उन दिनों की जब मैं इलाहाबाद विश्वविधालय का छात्र था और अपने सभी साथियों के साथ कटरा के लक्ष्मी चौराहे के पिंटू की दुकान पर बैठकी किया करता था। उन दिनों की बात तो और थी, ना तो गम था और ना किसी बात का अफसोस। बस हंसी मजाक का दौर जब चल पड़ता था तो समय का पता ही नहीं चलता था और एक-दूसरों की खिंचाई करने का अपना ही कुछ मजा था। हम सभी 10-12 मित्रों ने पत्रकारिता करने के बाद, जब इलाहाबाद छोड़ने का मन बनाया तो मन में एक उमंग और एक ख्वाहिश थी कि पत्रकारिता हमें जीवंत बनाएं रखेंगी और एक नयी सोच को बनाएगें... जब मैं दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर ऊतरा तो ऊफ की आवाजा जैसे मन से निकली कि मैं कहां आ गया...खैर मन में एक उत्साह था कि कुछ करना है। जब मैं नोएडा की धरती पर कदम रखा और चैनलों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा तो मालूम चला कि जीवन का मतलब क्या है कि कितनी मुश्किल से लोग संघर्ष करके अपना स्थान बनाते है। घर से दूर था लेकिन मित्रों से संपर्क इतना अच्छा था कि समय कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता था। लल्ला चुंगी तो दूर था लेकिन मन में एक आस थी कि लड़ाई जीतनी है... इसीलिए हम सभी मित्र एक जुट थे। सभी मित्रों की अपनी-अपनी महत्वकांक्षा थी लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा किसी पर भारी नहीं पड़ती थी... हम सभी मित्रों का दिमाग एक नहीं कई था और सभी मिलकर सोच को अंजाम देते थे और इसी का परिणाम निकला कि हम मित्रों के बीच से कोई डैडी बनकर निकला तो कोई ददू... लेकिन सभी का मकसद एक था... कुछ करना है। इलाहाबाद की मिट्टी को बदनाम नहीं होने देना है... शायद इसी का परिणाम है कि आज सभी मित्र अच्छी से अच्छी जगह काम कर रहे है... और समय आने पर इलाहाबाद का नाम रोशन भी करेंगे....जय हिंद

6 comments:

Divine India said...

संघर्ष की यह दास्तान सच की वह चाय है जिसे हम जैसे बहुतों पीते हैं… मगर भूल भी जाते हैं…
बहुत बढ़िया…।

हर्षवर्धन said...

लगे रहो।

Anonymous said...

har ilahabadi ke sangharsh ki dastan to kuchh aisi hi hoti hai. par ye samajh nahi aaya ki sunil bhai ka kya majra hai. poore lekh mein main is prasang ke sandarbh ko khojata raha...
abhinav.

sudhir shukla said...

अरे! अभिनव भाई मैने लेख का टाइटिल 'लल्ला चुंगी की चाय बैठकी' लिखा था...पर स्टोरी की एडिटिंग कराते समय जल्दबाजी में इंटर मार दिया... इसकारण सुनील भाई का नाम बाई डिफॉलट आ गया...

अभिनव said...

बढ़िया है, हम भी कटरा की चाय का लुत्फ़ नहीं भूले हैं, और उस भाषा का भी..
जिसमें कहते थे की "ज़रा कितबिया दीजियेगा गुरूजी."

आपको शुभकामनाएं.

Anonymous said...

hi sudhir,
well thanx for the response and clarification regarding the title of the blog.
abhinav raj.