Friday, January 15, 2010
Tuesday, January 5, 2010
पुरकैफ जी नहीं रहे
साथियों बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि अब पुरकैफ जी हमारे बीच नहीं रहे ! हालांकि राजेश त्रिपाठी 'पुरकैफ' के राजेश त्रिपाठी अभी मौजूद हैं और स्टार न्यूज़ मुंबई में मजे कि नौकरी कर रहे हैं लेकिन पुरकैफ जी कि बात ही कुछ और थी ! पुरकैफ यानी कि खिलंदड़ मिज़ाज का वोह शख्स जो एक नंबर का शातिर गेमबाज है , लाखैरों (लाला, लोमड़ी, देबू , विक्की) का लाखैरा है , खटिकाना टोला की शायरी गाने वाला शायर है, सड़क छाप लौंडों का सरगना है , अजीबों-गरीब कपड़े पहेनने का मास्टर है, नयी-नयी पत्र-पत्रिकाओं को चीथड़ा कर ख़ुशी महसूस करने वाला कोलाज़र है !
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु
Saturday, January 2, 2010
Sunday, December 20, 2009
और रिश्ता ख़त्म..
कुछ तुमने कहा
कुछ मैंने कहा
और जल उठी आग
सुलगने लगे ज़ज्बात
तुमने बुझाने की कोशिश नहीं की,
और संयोग से
मुझे भी पसंद है गरम चाय !
कुछ मैंने कहा
और जल उठी आग
सुलगने लगे ज़ज्बात
तुमने बुझाने की कोशिश नहीं की,
और संयोग से
मुझे भी पसंद है गरम चाय !
Thursday, December 17, 2009
Wednesday, November 4, 2009
कौन है सच्चा राष्ट्र भक्त ?
१- क्या आप सच्चे राष्ट्रभक्त हैं ?
२- हाँ मै हूं ।
१- सुबूत ?
२- मतलब ?
१- इसका सुबूत क्या है ?
२- जी ..... जी मुझे अपने देश से प्यार है ।
१- और ?
२- और ............................................................................... कुछ नहीं ।
वास्तव में किसी का भी यह कहना की वो सच्चा देशभक्त है, बेमानी है । इसकी वजह मैं बाद में बताऊंगा। पर दिल्ली आने के बाद मुझे मालूम हुआ कि असली देशप्रेमी कोई और हो या न हो मगर विजय राष्ट्रभक्त शिरोमणि निसंदेह हैं।
याद कीजिये बीते मार्च का तमाशा। जब पूरा देश और सरकार रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी की कुछ व्यक्तिगत निशानियों की नीलामी होते देख रहीं थी । विश्व भर का मीडिया इस बात पर नज़रें गडाये था कि देखें बापू का देश क्या करता है। देश की नाक खतरे में थी । ऐसे में विजय माल्या ने ही २७ मार्च २००९ को नीलामी में राष्ट्र का गौरव बचाया था।
इस घटना को राष्ट्र भक्ति के नज़रिए से देखने की दृष्टि मुझे दिल्ली के अपने कुछ मीडिया मित्रों के साथ बैठकी के दौरान मिली। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि महफिल में सिर्फ विजय माल्या ब्रांड उत्पाद ही है। अपने ब्रांड की तड़प ने मुझे उकसाया तो पहले लिखे जा चुके सवालों से मेरा सामना हुआ। और मैं उनसे पराजित हो गया । क्योंकि सार्वजनिक नियमो की धज्जियाँ उड़ना, जैसे-यातायात पुलिस से बचने के लिए ५०-१०० की रिश्वत देना, सड़क किनारे लघु शंका का निवारण कर लेना, धूम्रपान करना, सार्वजनिक सम्पतियों को नष्ट होते देखते रहना और सबसे बड़े देशद्रोह कि बात यह कि किसी नागनाथ या सांपनाथ को वोट देना ( मजबूरी में ) ताकि वो हजारों करोड़ रूपये का घोटाला कर देश को खोखला करते रहें, आदि किसी सच्चे राष्ट्रभक्त के गुन नही हो सकते।
पर मुझे इस शर्मिंदगी से उबारते हुए मित्रों ने मुझे एक माल्या ब्रांड पटियाला दिया और कहा इसे पीते ही मैं एक राष्ट्रभक्त की भक्ति मे शामिल हो जाऊंगा। इस तरह मेरी देशभक्ति साबित हो जायेगी । मेरे पिए हर पैग के ज़रिये माल्या तक पहुचने वाला हर रुपया माल्या के हाथों को मजबूत करेगा। इस समय विजय माल्या से बढ़कर देशहित के बारे मे सोचने वाला और कोई नहीं लिहाजा पीते रहिये ( सिर्फ़ माल्या उत्पाद ) और देश के गौरव की रक्षा करने वाले हाथो को मजबूती प्रदान कीजिये।
उनके इस तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उस दिन गुरु पर्व का ड्राई डे था । फिर भी देशभक्ति के नाम पर घंटों जाम टकराते रहे ।
धीरे धीरे राष्ट्रभक्ति प्रगाढ़ हो रही थी .....
सन्दर्भ के लिए लिंक
http://www.thaindian.com/newsportal/tag/york-auction
२- हाँ मै हूं ।
१- सुबूत ?
२- मतलब ?
१- इसका सुबूत क्या है ?
२- जी ..... जी मुझे अपने देश से प्यार है ।
१- और ?
२- और ............................................................................... कुछ नहीं ।
वास्तव में किसी का भी यह कहना की वो सच्चा देशभक्त है, बेमानी है । इसकी वजह मैं बाद में बताऊंगा। पर दिल्ली आने के बाद मुझे मालूम हुआ कि असली देशप्रेमी कोई और हो या न हो मगर विजय राष्ट्रभक्त शिरोमणि निसंदेह हैं।
याद कीजिये बीते मार्च का तमाशा। जब पूरा देश और सरकार रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी की कुछ व्यक्तिगत निशानियों की नीलामी होते देख रहीं थी । विश्व भर का मीडिया इस बात पर नज़रें गडाये था कि देखें बापू का देश क्या करता है। देश की नाक खतरे में थी । ऐसे में विजय माल्या ने ही २७ मार्च २००९ को नीलामी में राष्ट्र का गौरव बचाया था।
इस घटना को राष्ट्र भक्ति के नज़रिए से देखने की दृष्टि मुझे दिल्ली के अपने कुछ मीडिया मित्रों के साथ बैठकी के दौरान मिली। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि महफिल में सिर्फ विजय माल्या ब्रांड उत्पाद ही है। अपने ब्रांड की तड़प ने मुझे उकसाया तो पहले लिखे जा चुके सवालों से मेरा सामना हुआ। और मैं उनसे पराजित हो गया । क्योंकि सार्वजनिक नियमो की धज्जियाँ उड़ना, जैसे-यातायात पुलिस से बचने के लिए ५०-१०० की रिश्वत देना, सड़क किनारे लघु शंका का निवारण कर लेना, धूम्रपान करना, सार्वजनिक सम्पतियों को नष्ट होते देखते रहना और सबसे बड़े देशद्रोह कि बात यह कि किसी नागनाथ या सांपनाथ को वोट देना ( मजबूरी में ) ताकि वो हजारों करोड़ रूपये का घोटाला कर देश को खोखला करते रहें, आदि किसी सच्चे राष्ट्रभक्त के गुन नही हो सकते।
पर मुझे इस शर्मिंदगी से उबारते हुए मित्रों ने मुझे एक माल्या ब्रांड पटियाला दिया और कहा इसे पीते ही मैं एक राष्ट्रभक्त की भक्ति मे शामिल हो जाऊंगा। इस तरह मेरी देशभक्ति साबित हो जायेगी । मेरे पिए हर पैग के ज़रिये माल्या तक पहुचने वाला हर रुपया माल्या के हाथों को मजबूत करेगा। इस समय विजय माल्या से बढ़कर देशहित के बारे मे सोचने वाला और कोई नहीं लिहाजा पीते रहिये ( सिर्फ़ माल्या उत्पाद ) और देश के गौरव की रक्षा करने वाले हाथो को मजबूती प्रदान कीजिये।
उनके इस तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उस दिन गुरु पर्व का ड्राई डे था । फिर भी देशभक्ति के नाम पर घंटों जाम टकराते रहे ।
धीरे धीरे राष्ट्रभक्ति प्रगाढ़ हो रही थी .....
सन्दर्भ के लिए लिंक
http://www.thaindian.com/newsportal/tag/york-auction
Thursday, September 24, 2009
Friday, September 4, 2009
Monday, August 31, 2009
Sunday, August 30, 2009
महगाई के दोहे
महगाई ने ऐसा मारा की मिडिल वर्ग मार जाए
हे बनवारी मुरलीधारी मनमोहन लेव बचाय .
गोभी,भिंडी दाल तो अब सपनो मे दिखते हैं
आलू और टमाटर कभी कभी ही मिलते हैं.
शक्कर ने तो मध्यवर्ग का छोड़ दिया है साथ
इतने ऊँचे दम हुए की नही पहुँचता हाथ .
अभी तलाक़ मंदी ने मारा अब मार रही महगाई है
ये कैसा मौसम आया है ये कैसी शामत आई है .
मंदी ने नौकरी चीन ली अब महगाई लेगी जान
कुछ जतन करो हे दीनदयाला संसद के भगवान.
हे बनवारी मुरलीधारी मनमोहन लेव बचाय .
गोभी,भिंडी दाल तो अब सपनो मे दिखते हैं
आलू और टमाटर कभी कभी ही मिलते हैं.
शक्कर ने तो मध्यवर्ग का छोड़ दिया है साथ
इतने ऊँचे दम हुए की नही पहुँचता हाथ .
अभी तलाक़ मंदी ने मारा अब मार रही महगाई है
ये कैसा मौसम आया है ये कैसी शामत आई है .
मंदी ने नौकरी चीन ली अब महगाई लेगी जान
कुछ जतन करो हे दीनदयाला संसद के भगवान.
Monday, August 24, 2009
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो ...
ऑफिस में खुश रहो, घर में खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो ...
आज जिम जाने का समय नहीं , दो कदम चल के ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज दोस्तों का साथ नहीं, टीवी देख के ही खुश रहो ...
घर जा नहीं सकते तो फ़ोन कर के ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज कोई नाराज़ है, उसके इस अंदाज़ में भी खुश रहो ...
जिसे देख नहीं सकते उसकी आवाज़ में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
जिसे पा नहीं सकते उसकी याद में ही खुश रहो
Laptop न मिला तो क्या , Desktop में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
बिता हुआ कल जा चूका है , उसकी मीठी यादों में ही खुश रहो ...
आने वाले पल का पता नहीं ... सपनो में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
हँसते हँसते ये पल बिताएँगे, आज में ही खुश रहो
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो
ऑफिस में खुश रहो, घर में खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो ...
आज जिम जाने का समय नहीं , दो कदम चल के ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज दोस्तों का साथ नहीं, टीवी देख के ही खुश रहो ...
घर जा नहीं सकते तो फ़ोन कर के ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
आज कोई नाराज़ है, उसके इस अंदाज़ में भी खुश रहो ...
जिसे देख नहीं सकते उसकी आवाज़ में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
जिसे पा नहीं सकते उसकी याद में ही खुश रहो
Laptop न मिला तो क्या , Desktop में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
बिता हुआ कल जा चूका है , उसकी मीठी यादों में ही खुश रहो ...
आने वाले पल का पता नहीं ... सपनो में ही खुश रहो ...
ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ
हँसते हँसते ये पल बिताएँगे, आज में ही खुश रहो
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो
अनदेखी अनजानी सी
मधुर कल्पनाओं की सरिता में
तब बहते जाना
कितना अच्छा लगता था
कोलाहल से दूर कहीं
सूनी सड़कों पर उस धुंधली सी संध्या में
वो साथ तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
उन कम्पित अधरों को
मै जब छूने की कोशिश करता था
तब प्रतिवाद तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
किन्तु अब?........
यथार्थ के तिमिर कूप में
उन मधुर छनो की
केवल अनुजूंग ही शेष है
हाँ, बस स्मृति शेष है
१९९० से पहले लिखी रचनाओं में से एक...............
मधुर कल्पनाओं की सरिता में
तब बहते जाना
कितना अच्छा लगता था
कोलाहल से दूर कहीं
सूनी सड़कों पर उस धुंधली सी संध्या में
वो साथ तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
उन कम्पित अधरों को
मै जब छूने की कोशिश करता था
तब प्रतिवाद तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
किन्तु अब?........
यथार्थ के तिमिर कूप में
उन मधुर छनो की
केवल अनुजूंग ही शेष है
हाँ, बस स्मृति शेष है
१९९० से पहले लिखी रचनाओं में से एक...............
मौत नहीं है हल सपनो का,
माना टूटा बल अपनों का.
फिर भी हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलायें कैसे?
सपनो के टूटे पंखों से,
अपनों के विरह मनको से.
नीड़ भला सजायें कैसे,
सोते न जग जाएँ कैसे?
फिर भी उसकी किसी छवि को,
उसके नयनो के अमित रवि को,
खुद में हम झुठलायें कैसे?
कैसे ना जी जाएँ ऐसे?
नीड़ का अपने तिनका टूटा,
सबसे प्रियतम साथी छूटा.
राह पलट पर जाएँ कैसे,
उसके सपने झुठलायें कैसे?
आखिर हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलाएं कैसे?
माना टूटा बल अपनों का.
फिर भी हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलायें कैसे?
सपनो के टूटे पंखों से,
अपनों के विरह मनको से.
नीड़ भला सजायें कैसे,
सोते न जग जाएँ कैसे?
फिर भी उसकी किसी छवि को,
उसके नयनो के अमित रवि को,
खुद में हम झुठलायें कैसे?
कैसे ना जी जाएँ ऐसे?
नीड़ का अपने तिनका टूटा,
सबसे प्रियतम साथी छूटा.
राह पलट पर जाएँ कैसे,
उसके सपने झुठलायें कैसे?
आखिर हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलाएं कैसे?
Saturday, August 15, 2009
Friday, August 14, 2009
Friday, July 31, 2009
Monday, July 27, 2009
ऐसी आज़ादी और कहाँ..?
ऐसी आज़ादी और कहाँ..?
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में दिए उस फैसले का सबने स्वागत किया हैं जिसमे समलैंगिकता से संबंधित धारा '३७७' को हटाने के दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिए हैं...अब भारतीय संस्कृति पर एक बदनुमा दाग लग जायेगा क्योंकि 'ऐसी आज़ादी और कहा' ..जी हाँ...! होमोसेक्सुँलिटी में प्रयोग किये जाने वाले हर शब्द का मतलब ही कुछ और निकल रहा हैं ...'गे' शब्द की परिभाषा अब पूरी तरह से आम भाषा में खुलेआम प्रयोग की जाने लगी हैं..अगर आप किसी से पूछेंगे की मेरे साथ चलोगे तो यानि सामने वाला भौचक रहे जायेगा की वोह उसे चलो और गे दोनों ही कह रहा हैं..आंखिर अब खुलकर होमोसेक्सुँल्स सामने आ रहे हैं ...! दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद जैसे सबको खुली आज़ादी मिल गयी हो..हर चीज में गे शब्द का प्रयोग जैसे चलो गे , मिलो गे या तमाम वोह शब्द जिसमे आखिरी में गे शब्द लगता हैं....अब इस गे शब्द को हर आदमी खुल कर समाज में बोलने लगा हैं हैं क्योंकि इस बात की इजाज़त तो आंखिर उन्हें कानून ने ही दी हैं ...खुलकर समाज के सामने यह मानना की अब वोह पूरी तरह से आजाद हैं हर वोह काम करने के लिए जिसके लिए वोह पहले दस बार सोचते थे...चाहे वोह दिल्ली की सड़को पर खुलेआम एक दुसरे का हाथ पकड़ कर समाज को यह दिखाना की अब वोह गे संस्कृति को अपनायेगे ..! गे शब्द की जो परिभाषा थी वोह अब पूरी तरह से बदल चुकी हैं....लेकिन विदेशी संस्कृति को अपनाने वालो ने यह भी नहीं सोचा की इसका परिणाम क्या होगा...! लेकिन सवाल यहाँ उठता हैं की आंखिर इस बात की इजाज़त भी तो हमारे भारतीय कानून ने ही उन्हें दी हैं.. ! अभी भी कटघरे में कई ऐसे सवाल खड़े हैं जिसका जवाब किसी के पास नहीं हैं .....! जरुरत हैं तो सिर्फ सोचने की जो हम कर रहे हैं क्या वोह सही हैं.....?
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में दिए उस फैसले का सबने स्वागत किया हैं जिसमे समलैंगिकता से संबंधित धारा '३७७' को हटाने के दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिए हैं...अब भारतीय संस्कृति पर एक बदनुमा दाग लग जायेगा क्योंकि 'ऐसी आज़ादी और कहा' ..जी हाँ...! होमोसेक्सुँलिटी में प्रयोग किये जाने वाले हर शब्द का मतलब ही कुछ और निकल रहा हैं ...'गे' शब्द की परिभाषा अब पूरी तरह से आम भाषा में खुलेआम प्रयोग की जाने लगी हैं..अगर आप किसी से पूछेंगे की मेरे साथ चलोगे तो यानि सामने वाला भौचक रहे जायेगा की वोह उसे चलो और गे दोनों ही कह रहा हैं..आंखिर अब खुलकर होमोसेक्सुँल्स सामने आ रहे हैं ...! दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद जैसे सबको खुली आज़ादी मिल गयी हो..हर चीज में गे शब्द का प्रयोग जैसे चलो गे , मिलो गे या तमाम वोह शब्द जिसमे आखिरी में गे शब्द लगता हैं....अब इस गे शब्द को हर आदमी खुल कर समाज में बोलने लगा हैं हैं क्योंकि इस बात की इजाज़त तो आंखिर उन्हें कानून ने ही दी हैं ...खुलकर समाज के सामने यह मानना की अब वोह पूरी तरह से आजाद हैं हर वोह काम करने के लिए जिसके लिए वोह पहले दस बार सोचते थे...चाहे वोह दिल्ली की सड़को पर खुलेआम एक दुसरे का हाथ पकड़ कर समाज को यह दिखाना की अब वोह गे संस्कृति को अपनायेगे ..! गे शब्द की जो परिभाषा थी वोह अब पूरी तरह से बदल चुकी हैं....लेकिन विदेशी संस्कृति को अपनाने वालो ने यह भी नहीं सोचा की इसका परिणाम क्या होगा...! लेकिन सवाल यहाँ उठता हैं की आंखिर इस बात की इजाज़त भी तो हमारे भारतीय कानून ने ही उन्हें दी हैं.. ! अभी भी कटघरे में कई ऐसे सवाल खड़े हैं जिसका जवाब किसी के पास नहीं हैं .....! जरुरत हैं तो सिर्फ सोचने की जो हम कर रहे हैं क्या वोह सही हैं.....?
Saturday, July 25, 2009
लिखिए भाई लिखिए भाई
लिखिए भाई लिखिए भाई
पीपल पेड़ पुराना लिखिए,
गांव का एक ज़माना लिखिए।
भौजाई का ताना लिखिए,
देवर का गुर्राना लिखिए ।
नाना का वो गाना लिखिए
नानी का शर्माना लिखिए ।
अपना कोई फसाना लिखिए
बीवी से घबराना लिखिए ।
देश का ताना बाना लिखिए,
देश की जान बचाना लिखिए ।
धूप में पांव जलाना लिखिए,
बारिश में नहाना लिखिए ।
कागज़ की नाव बनाना लिखिए,
बारिश में उसे बहाना लिखिए।
आना लिखिए जाना लिखिए,
हरकत कोई बचकाना लिखिए.।
मुलायम का साथी लिखिए,
मायावती का हाथी लिखिए।
कांग्रेस का पंजा लिखिए
कमल का कसा शिकंजा लिखिए।
समय का अत्याचार भी लिखिए,
टूटते घर परिवार भी लिखिए।
महंगाई की मार भी लिखिए,
बढ़ते बेरोज़गार भी लिखिए।
पीपल पेड़ पुराना लिखिए,
गांव का एक ज़माना लिखिए।
भौजाई का ताना लिखिए,
देवर का गुर्राना लिखिए ।
नाना का वो गाना लिखिए
नानी का शर्माना लिखिए ।
अपना कोई फसाना लिखिए
बीवी से घबराना लिखिए ।
देश का ताना बाना लिखिए,
देश की जान बचाना लिखिए ।
धूप में पांव जलाना लिखिए,
बारिश में नहाना लिखिए ।
कागज़ की नाव बनाना लिखिए,
बारिश में उसे बहाना लिखिए।
आना लिखिए जाना लिखिए,
हरकत कोई बचकाना लिखिए.।
मुलायम का साथी लिखिए,
मायावती का हाथी लिखिए।
कांग्रेस का पंजा लिखिए
कमल का कसा शिकंजा लिखिए।
समय का अत्याचार भी लिखिए,
टूटते घर परिवार भी लिखिए।
महंगाई की मार भी लिखिए,
बढ़ते बेरोज़गार भी लिखिए।
Monday, July 20, 2009
अजय राय पुरस्कृत

चाय बैठकी के बैठकबाज अजय राय को आर्थिक पत्रकारिता में उनके उल्लेख नीय योगदान के लिए बनारस बीड्स आर्थिक पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है । पुरस्कार के लिए देश भर से तीन लोगों का चयन हुआ है अजय के अतिरिक्त प्रसिद्द आर्थिक पत्रकार संजय पुगुलिया और नागेन्द्र पाठक पुरस्कृत हुए हैं । चयन समिति में प्रख्यात विद्वान अच्युता नन्द मिश्रा ,पत्रकार आलोक मेहता आदि शामिल थे। अजय अमर उजाला बनारस में कार्यरत हैं और चाय बैठकी की संकल्पना और संचालन में साझीदार हैं। अजय को जल्द ही होने वाले पुरस्कार वितरण समारोह में ११००० की धन राशि और प्रशस्तिपत्र से सम्मानित किया जायेगा । अजय की लेखनी ने संगीत ,धर्म ,संस्कृति आदि विभिन्न विषयों पर लगातार सुंदरतम लिखा है पर आर्थिक विषयों पर उनकी इस पकड़ से कम ही लोग परिचित थे । उनकी इस उपलब्धि पर पूरे चाय बैठकी परिवार की ओर से बहुत बधाइयाँ .....
Monday, June 29, 2009
एक पैर का नाच...

शहर के बीच चौराहे की फुटपाथ पर जमा थी भीड़ चल रहा था एक पैर का नाच
लोग टकटकी लगाये देख रहे थे उस सोलह साल की लड़की को
जो फिल्मी धुन पर दिखा रही थी एक पैर का नाच
नाच का ये तमाशा दिखा रही लड़की बहुत सुन्दर थी
किसी गांव की गोरी की तरह
घुंघरुओं की छनक के साथ धड़क रहा था
वहां पर खड़े कितने नौजवानों का दिल
जिनकी नजर पैरों पर कम....उसके गदराये जिस्म पर टिकी थी
एक पैर के इस नाच पर खूब वाहवाही भी मिल रही थी
और तालियां भी बज रही थी
बीच बीच में आवाज भी आ रही थी..
जियो छम्मक छल्लो...
पूरे एक घंटे बाद नाच बंद हो गया
कितने लोगों के हाथ अपने अपने जेब में गये
जिनकी जेब से सिक्के निकले उन्होंने जमीन पर बिछे कपड़े पर उछाल दिए
जिनकी जेब से नोट निकली वो कुछ सोचने के बाद आगे बढ़ गये।
सब लोगों के जाने तक मैं वहां खड़ा रहा
मैंने उस लड़की से पूछा
तुम्हारा पैर कैसे कट गया
उस लड़की की आंखे नम हो गई
उसने मेरी तरफ देखा कुछ देर बाद बोली
एक ट्रेन एक्सीडेंट में मेरे मां बाप मर गये है
और मेरा पैर कट गया
वो रोने लगी थी
ढाढस के दो शब्द मैंने भी बोले थे
कुछ फुटकर सिक्के मैंने भी दिये
और आगे बढ़ चला।
Friday, May 22, 2009
Monday, May 18, 2009
Thursday, May 14, 2009
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