Sunday, May 11, 2008

मैं, माँ और मुनव्वर

मैने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू,
मां ने मुद्दतों नहीं धोया दुपट्टा अपना।
- मुनव्वर राणा

दरअसल "माँ" पर लिखने को मैने कई बार सोचा। कई बार कलम उठाई। कई कागज खराब किए। मन-मस्तिष्क में उठ रहीं असंख्य भावनाओं को जब-जब शब्द देने की कोशिश की, असफल रहा। असफल इसलिए क्योंकि हर बार मुनव्वर राणा की चन्द पंक्तियाँ याद आईं और मैं मां के ख्यालों में खो गया। और इस कदर खो गया कि फिर कुछ भी लिखने-पढ़ने का मन नहीं किया। हां, एक बात और... वो ये कि मुनव्वर साहब ने "मां" पर जो कुछ लिख डाला है उसे पढ़ना ही मेरे लिए इतना सुखद होता है कि खुद कुछ लिखना बेहद ग़ैरज़रूरी और बेमतलब सा लगता है। मुझे याद है वो दिन जब मैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में अपने कार्यकाल के दौरान मुनव्वर साहब से मिला था, इंटरव्यू के सिलसिले में। उन दिनों मैं इलाहाबाद में श्री एस एस ख़ान के साथ काम कर रहा था। मुझे खूब ठीक से याद है कि जब-जब ख़ान साहब अपनी स्मृतियों में खोते, अपने पत्रकार मित्र प्रताप सोमवंशी से लेकर जनाब मुनव्वर राणा तक कई लोगों के नाम उनकी ज़ुबान पर होते। मुझे वो दिन भी याद है जब एक बार मुनव्वर एक मुशायरे में इलाहाबाद आए और ख़ान साहब के साथ मैं उनसे मिला। घंटे भर की उस अनौपचारिक मुलाकात में मुनव्वर साहब बस बोलते रहे और हम सुनते रहे। मैं मंत्रमुग्ध सा कभी उन्हें देखता तो कभी उनके हाथों में दम तोड़ती सिगरेट को, जो शायद ही एक-आध बार उनके होठों तक पहुँची थी। वहाँ से लौटते वक़्त मैं लगभग झूम रहा था। वो इसलिए क्योंकि मुनव्वर साहब ने मेरे लिए चन्द लाइने लिखकर मुझे अपनी एक किताब के साथ विदा किया था। आज "मदर्स डे" पर फिर मैने जब कुछ लिखने की कोशिश की तो मां ( जो फिलहाल सैकड़ों किलोमीटर दूर इलाहाबाद में हैं ) और मुनव्वर एक साथ इतना याद आए कि कुछ भी लिख पाना दूभर हो रहा है.
- अभिनव राज, दिल्ली।

Friday, May 9, 2008

देश के 2 न्यूज़ चैनल : एक का तमाशा, दूसरे की अपील

अभी कल ही क़ी बात है। देश का सबसे उम्रदराज 24 घंटे का हिन्दी न्यूज़ चैनल करवट बदल रहा था। सभी की निगाहें टिकी हुईं थी- एक नई शुरुआत पर। तय समय था रात के 9 बजकर 56 मिनट। ठीक समय पर चैनल के "लोगो" पर से परदा उठा और स्क्रीन पर हिन्दी न्यूज़ चैनलों का एक जाना पहचाना चेहरा उभरा। पुण्य प्रसून बाजपेयी। प्रसून अपने चिरपरिचित अंदाज़ में दर्शकों से रूबरू थे। पर ब्रांडिंग के इस दौर में दर्शक तो किसी "मेगा रीलांच" की उम्मीद लगाये बैठे थे। लोगों को इंतज़ार था तो किसी आमूलचूल परिवर्तन का। तभी नज़र पड़ी चैनल के "लोगो" पर, जिसका रंग बदल चुका था। दिमाग में पिछली तमाम यादें ताज़ा हो आईं। जब किसी चैनल के आने पर बालीवुड से लेकर नेताओं की बधाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता था। बधाइयों का सिलसिला अब शुरू होगा की तब, मैं इसी ऊहापोह में था। तभी याद आई कुछ देर पहले की गई एक महिला एंकर की अपील- "बदले हुए चैनल की बदली हुई खबर आपको सोचने पर मज़बूर कर देगी"। मैने सोचने की पुरजोर कोशिश की। दिमाग़ पर भरपूर ज़ोर डाला की आख़िर ऐसा क्या देख पा रहा हूँ कि मैं सोच में पड़ जाऊं। एक बार फिर नज़र पड़ी चैनल के "लोगो" पर। नीचे लिखा था ज़रा सोचिए। मैने फिर सोचने की नाकामयाब कोशिश की। कुछ समझ में नहीं आया। रिमोट उठाया और चैनल बदल दिया। एक दूसरे टीवी न्यूज़ चैनल पर पहुँचते ही अँगुलियाँ एक बार फिर ठिठक गईं। उम्र में ये चैनल पहले वाले चैनल से थोड़ा ही छोटा था। इस चैनल का एक एंकर-पत्रकार WWE के पहलवान "खली" से दो-दो हाथ करने की फिराक में था। मन में उत्सुकता और सहानुभूति (एंकर के प्रति) एक साथ जगी। बतिस्ता और केन जैसे पहलवानो से तथाकथित नकली फ़ाइट करने वाला बच्चों का चहेता "द ग्रेट खली" कम से कम इस एंकर पर तो भारी ही पड़ेगा। तमाशा जारी था तभी मैने देखा, खली ने एंकर और उस बहुचर्चित पत्रकार को उल्टा उठाकर टाँग लिया। किसी न्यूज़ चैनल के स्क्रीन पर कोई पत्रकार ऐसी हालत में पहली बार नज़र आया था- असहाय और हारा हुआ। मुझे तुरंत पहले वाले चैनल क़ी टैगलाइन याद हो आई- "ज़रा सोचिए"। इस बार मैं वास्तव में सोच में पड़ गया था। मुझे लगा, तमाशा ही सही पर दिखाया तो "सौ फीसदी सच"। आख़िर पत्रकार और न्यूज़ चैनल क़ी तो यही दशा हो चुकी है...!!!
अभिनव राज

Sunday, May 4, 2008

सिक्ता देव की सीख

पत्रकारों की नई फसल को सींचने इलाहाबाद पहुँची एनडीटीवी की वरिष्ठ एंकर और पत्रकार सिक्ता देव बीते २ और ३ मई को इलाहाबाद में थीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेशन विभाग में सिक्ता छात्रों से रूबरू थीं। वेशभूषा और वाणी में अपनी चिरपरिचित सौम्यता ओढ़े सिक्ता बोले जा रहीं थीं और छात्र मंत्रमुग्ध होकर सुने जा रहे थे। टीवी पत्रकारिता में एक लंबा सफ़र तय कर चुकीं सिक्ता ने इन भावी पत्रकारों को टीवी न्यूज़ के कई गुर भी सिखाए। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में सफलता के लिए उत्साह और धैर्य नितांत ज़रूरी है। उम्मीद है दो दिन की कार्यशाला में सिक्ता की सोहबत और उनकी सीख छात्रों को एक दिशा ज़रूर देगी।

धन्यवाद सिक्ता... इलाहाबाद आती रहिएगा॥!
अभिनव राज, दिल्ली।
journalist.raj@gmail.com

Thursday, May 1, 2008

तापमान का तापमान

Tuesday, April 29, 2008

इलाहाबाद में थे प्रताप सोमवंशी...

बुंदेलखंड की दशा-दिशा की कई तस्वीरें पिछले दिनों कुछ टीवी न्यूज़ चैनलों ने ज़रूर दिखाई थी। काफ़ी हाय-तौबा भी मची और लोगों ने जमकर प्रदेश सरकार को कोसा भी। किंतु शहर (इलाहाबाद) के ही वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सोमवंशी ने अपनी लेखनी के ज़रिए इसकी जो मार्मिक तस्वीर खींची थी, उससे इस क्षेत्र की बेहतरी को लेकर आस ज़रूर जगी थी। सोमवंशी इस खोजपरक और विश्लेषणात्मक खबर या कहें कि "मुहिम" के लिए सम्मानित भी हुए। दिल्ली में एक खास समारोह में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आज़ाद के हाथों उन्हें प्रतिष्ठित "के सी कुलिश इंटरनेशनल मीडिया अवार्ड" मिला। सोमवंशी ने इस क्षेत्र के लोगों समेत तमाम समाजसेवियों के मन में उम्मीद की एक अलख तो जगाई ही, साथ ही असंवेदनशील और लगभग कॉमर्शियल हो चुके पत्रकारों के समक्ष एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। इसी की एक बानगी पिछले दिनों इलाहाबाद में दिखी जब "मानवाधिकार और पत्रकारिता की भूमिका" विषयक संगोष्ठी में सोमवंशी ने पत्रकारों से "गाँवों का ब्रांड एम्बेसडर" बनने का आह्वान किया। बीते २७ अप्रैल को प्रताप सोमवंशी के सम्मान में आयोजित इस संगोष्ठी में शहर ने उन्हें सम्मानित किया। साथ ही कुछ बरस पहले इलाहाबाद अमर उजाला के संपादकीय प्रभारी रह चुके और फिलहाल इसी अख़बार में कानपुर में स्थानीय संपादक की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे सोमवंशी के व्यक्तित्व का दीगर पहलू भी सामने आया।
प्रताप जी को हमारी ओर से भी एक बार फिर बधाई...

Sunday, April 27, 2008

वाह री पुलिस, पत्रकारों को समलैंगिक बना दिया...!

इलाहाबाद में बीते दिनों अगवा हुए दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार श्यामेंद्र कुशवाहा तकरीबन १५ दिनों की जद्दोजहद के बाद २० अप्रैल को सकुशल वापस लौट आए। प्रशासन ने बैनर पोस्टर लगाकर बक़ायदे एक भारी भरकम प्रेस कांफ्रेंस की और अपनी पीठ थपथपाई। पर दो हफ्ते बाद बेहद नाटकीय ढंग से कुशवाहा की वापसी ने कुछ सवाल ज़रूर खड़े कर दिए हैं। एक तो यह कि प्रेस कांफ्रेंस में कुशवाहा ने बताया कि उन्हे पत्रकारिता और दीन -दुनिया से लगाव ख़त्म हो गया था, और वैराग्य की अवस्था में उन्होने ऐसा कदम उठाया। यहाँ आपको यह बता देना लाजिमी है कि कुशवाहा काफ़ी ज़िम्मेदार, कर्मठ और कार्य के प्रति संवेदनशील पत्रकार हैं। और शायद इसीलिए उनके साथियों को तो कम से कम ये कहानी कतई गले नहीं उतरती। साथ ही वापसी के तुरंत बाद श्यामेंद्र से घर पर मिलने गए पत्रकार साथियों से उन्होंने अपहरण की बात बताई थी। मतलब रात भर में कहानी बदल गई। हालाँकि दबी छुपी ज़ुबान से ही सही पर शासन से जुड़े हुए कुछ लोग ये कहने से बिल्कुल नहीं चूकते कि पुलिस इस मुद्दे पर शासन और पत्रकार दोनों को साध लेने की कवायद में जुटी थी। और इसमे वो कामयाब भी रही। क्योंकि मामले को गौर से देख समझ रहे हर किसी शख्स की ज़ुबान पर यही बात है कि पुलिस ने मामले से जुड़े कुछ हाई प्रोफाइल लोगों को भी बेदाग रखा और पत्रकारों को उनका साथी मिल गया। भाई कम से कम इस लिए तो पुलिस को बधाई देना ही चाहिए... एक शानदार तरीका निकालने के लिए। "साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी" वाली कहावत चरितार्थ हो गई...! पर इस पूरे प्रकरण में एक और कहावत सच साबित हुई - होम (हवन) करते हाथ जलने वाली कहावत। दरअसल यहाँ पर पुलिस की एक करतूत लोगों को बेहद नागवार गुज़री। वो यह कि इस पूरे प्रकरण के दौरान एक बार पुलिस की जाँच की दिशा कुछ ऐसी दिग्भ्रमित हुई कि कुछ पत्रकार साथी बेमतलब चर्चा में आ गये। हुआ यूँ की जाँच के दौरान पुलिस ने इलाहाबाद के कुछ पत्रकारों को समलैंगिक करार दे दिया। सवाल खड़े किए कि देर रात दो पुरुषों में आख़िर ऐसी कौन सी ज़रूरी बात होती है ...और वो भी कभी-कभार घंटो तक। दरअसल इसका खुलासा तब हुआ जब मामले की छानबीन में पुलिस ने कई पत्रकारों का फ़ोन सर्विलांस में लगा दिया और उनके कॉल डीटेल्स निकलवाई। अब पुलिस वाले भाइयों को कौन समझाए कि कंपनी द्वारा प्रदत्त कॉरपोरेट फ़ोन कनेक्शन में पैसे की चिंता तो होती नहीं... और फिर किसी अख़बार का सिटी एडीशन निकालने वालों के लिए देर रात तक बात करना कोई नई या फिर चकित कर देने वाली बात नहीं। अब श्यामेंद्र तो वापस आ गए पर उन पत्रकारों का क्या, जो अब कम से कम मसखरे टाइप के बैठक बाज़ों के बीच चर्चा का केंद्र बन चुके हैं। इलाहाबाद के कुछ नवजात छुटभईए अख़बारों ने तो अपनी प्रति बेचने के लिए खूब मसालेदार लिखा ही... देश की एक सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली प्रख्यात पत्रिका में इस आशय पर छपी स्टोरी में भी इस शर्मनाक पहलू को छू लिया गया...! जो शर्मनाक है... और गैर ज़रूरी भी...!!!

Saturday, April 26, 2008

taapmaan

तापमान शहर का गरम बहुत है। लोगों के दिलों में इसके बावजूद ताप ही नहीं रहती। चाय भी गरमी नहीं दे रही। बात मौसम की तब की जाती है जब संवाद चूक जाते हैं। संवाद का चूकना आदमी का चूकना होता है ?
बात मौसम की उनके सामने भी की जाती है जिन के लिए दिल में गुदगुदी होती है। मौसम बेईमान होता है। चलावा देता है। उसी बुत की तरह जिससे बेपनाह मुहब्बत किसी को काफिर करार दिलाती है। किसी का ईमान उसे काफिर बना देता है। मौसम बेमानी है। आपको मौसम की बात करते हुए मौसम के खिलाफ जाना होगा ठीक उस्सी तरह उसे झूथ्लाना होगा जैसे प्रेमिका न होती है, जो दरअसल हाँ होती है। मौसम खिलाफ हो सकता है, अक्सर होता है। मत भूलना दोस्तों आदमी मौसम से ही लड़ता रहा है। जब कोई मौसम नहीं था, हवा भी नहीं थी आदमी ता क्या? लिहाजा मत करो मौसम की परवाह। बहुत मौसम आएंगे, जायेंगे। पर तुमरा क्या....... लेंगे.

Friday, April 11, 2008

dawe hain dawon ka kyon

aaj phir chai batithkee dekhi sunil bhai ka photo load karne ka unguided type ka prayas usfal raha. kal kamre par sunil bhai dawa kar rahe the ki photo naitkee me pad chuki hai aur photos ne baithkee me aag lagau type ka mahaul paida kar diya hai. unka dawa ek dum teekh nikla hindustani neta ki tarah. khair baki sub khairiyat hai hum log philhal ek saal meerut me hi hain. ye baat sarva samti se tayn hui hai. jis par hum dono aadig hain main parvat ki tarah aur sunil bhai...... ki tarah . upar se idea lagiye.phil aaj kal ka kamra geet (ye rastra geet type ke cheej hai )
jo wada kiya hai nibhna padega .... but kaise

बड़ा बाजार और बदलता इलाहाबादी

बाजार अब लोगों को नए जमाने के साथ रहने की तमीज सिखा रहा है। छोटे शहरों में पहुंचते बड़े बाजार ये सिखा-बता रहे हैं कि अब कैसे रहना है, कैसे खाना है, क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कितना खरीदना है और क्या किसके लिए खरीदना जरूरी है। बस एक बार बाजार तक पहुंचने की जरूरत है। छोटे शहरों के लोग बाजार पहुंचने में लेट न हो जाएं। इसके लिए छोटे शहरों तक खुद ही बड़ा बाजार पहुंच रहा है। घर की जरूरत का हर सामान करीने से वहां लगा है। इतने करीने से कि, काफी ऐसा भी सामान वहां जाने के बाद जरूरी लगने लगता है जो, अब तक घर में किसी जरूरत का नहीं था। हमारे शहर इलाहाबाद में भी बड़ा बाजार पहुंच गया है।

अब इलाहाबाद छोटा शहर तो नहीं है लेकिन, बाजार के मामले में तो, छोटा ही है। कम से कम मैं तो, ऐसा ही मानता हूं। लेकिन, बड़ा बाजार वालों को यहां के बड़ा बाजार की समझ हो गई। इससे सस्ता और कहां का नारा लेकर बड़ा बाजार ने अपनी दुकान इलाहाबाद में खोल ली। बड़ा बाजार पहुंचा तो, 40 रुपए के खादी आश्रम के तौलिए से हाथ-मुंह पोंछने वाले इलाहाबादियों को एक बड़ा तौलिया, महिलाओं के लिए एक नहाने का तौलिया, दो हाथ पोंछने के तौलिए और दो मुंह पोंछने के छोटे तौलिए का सेट बेचने के लिए। गिनती के लिहाज से ये 6 तौलिए का पूरा सेट है 599 रुपए का, जिसकी बड़ा बाजार में कीमत है सिर्फ 299, ऐसा वो लिखकर रखते हैं। इलाहाबादी खरीद रहे हैं महिलाओं के नहाने वाले तौलिये से भी पुरुष ही हाथ मुंह पोंछ रहे हैं क्योंकि, अभी भी इलाहाबाद में महिलाएं बाथ टॉवल लपेटकर बाथरूम से बाहर आने के बजाए पूरे कपड़े पहनकर ही बाहर आती हैं। लेकिन, बड़ा बाजार इलाहाबादियों के घर में बाथ टॉवल तो पहुंचा ही चुका है।

इलाहाबादी परिवार का कोई सदस्य सुबह उठकर गंगा नहाने गया तो, घाट के पास दारागंज मंडी से हरी सब्जी, आलू-मिर्च सब लादे घर आया। गंगा नहाने नहीं भी गया तो, अल्लापुर, बैरहना, फाफामऊ, तेलियरगंज, कीडगंज, मुट्ठीगंज, सलोरी, चौक जैसे नजदीक की सब्जी मंडी से दो-चार दिन की सब्जी एक साथ ही उठा लाता था। चार बार मोलभाव करता था। झोला लेकर जाता था। सब एक साथ भरता जाता था। सुबह सब्जी लेने गया तो, साथ में जलेबी-दही भी बंधवा लिया। लेकिन, अब बड़ा बाजार आया तो, सब सलीके से होने लगा। आलू भी धोई पोंछी और पॉलिथीन में पैक करके उसके ऊपर कीमत का स्टीकर लगाकर मिलने लगी है। बाजार ने नाश्ते का भी अंदाज बदल दिया है। नाश्ते में इलाहाबादी दही-जलेबी, खस्ता-दमालू की जगह सॉस के साथ सैंडविच खाने लगा है।

बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर बनी टॉफी के लिए भी इलाहाबादी बड़ा बाजार जाने लगा है। टॉफी का बिल देने के लिए लाइन में लगा है। पीछे से किसी ने मजे से बोला क्या एक टॉफी के लिए इतनी देर लाइन में लगे हो- ऐसही लेकर निकल जाओ। लाइन में ठीक पीछे खड़ा आलू की पॉलिथीन वाला जो, शायद मजबूरी में सलीके में था, खीस निपोरकर बोला-- चेकिंग बिना किए नए जाए देतेन, पकड़ जाबो। और नए तो, अइसे जाइ दें तो, सब भर लइ चलें।

इलाहाबाद का बिग बाजार तीन मंजिल के कॉम्प्लेक्स में खुला है। तीसरी मंजिल से खरीदारी के लिए जाते हैं। पहली मंजिल पर बिल जमा करके जेब हल्की करके और हाथ में बिग बाजार का भारी थैला लेकर बाहर निकलते हैं। इन तीन मंजिलों के चढ़ने-उतरने में और बिग बाजार की लाइन में लगे-लगे इलाहाबादी बदल रहा है। इलाहाबादी लाइन में लगने लगा है। सलीके से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा है। 55 साल का एक इलाहाबादी बाजार के साथ सलीका सीखती-बदलती अपनी 18-19 साल की बिटिया के साथ सॉफ्टी खा रहा है, बड़ा बाजार के भीतर ही। बड़ा बाजार जिस कॉम्प्लेक्स में खुला है उसके ठीक सामने शान्ती कुल्फी की दुकान है। शांती की कुल्फी-फालूदा इलाहाबादियों के लिए कूल होने की एक पसंद की जगह थी (जब तक कूल शब्द शायद ईजाद नहीं हुआ रहा होगा)। लेकिन, कुल्फी-फालूदा अब इलाहाबादियों को कम अच्छा लग रहा है, होंठ पर लगती सॉफ्टी का स्वाद ज्यादा मजा दे रहा है।

बड़ा बाजार के ही कॉम्प्लेक्स में मैकडॉनल्ड भी है, हैपी प्राइस मेन्यू के साथ। सिर्फ 20 रुपए वाले बर्गर का विज्ञापन देखकर इलाहाबादी अंदर जा रहा है और 100-150 का फटका खाकर मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा है। इलाहाबादी पैकेट का आटा लाने लगा है, पैकेट वाले ही चावल-चीनी की भी आदत पड़ रही है। सलीके से रहने-खाने-पहनने को बाजार तैयार कर रहा है। घर का आटा-दाल-चावल खरीदकर बिल काउंटर पर आते-आते इलाहाबादी फिर ठिठक रहा है, अमूल कूल कैफे का टिन भूल गया था। लाइन लंबी थी, नंबर आते तक अमूल कूल कैफे के 2 चिल टिन भी बिल में शामिल हो चुके हैं।

बाजार सलीका सिखा रहा है! बाजार में सलीके से रहने के लिए ब्रांड का सबसे अहम रोल है। जितनी ज्यादा ब्रांडेड चीजें, उतना ही ज्यादा सलीका (अब माना तो ऐसे ही जाता है)। किसी भी बड़े से बड़े बाजार में मिल रहे ब्रांड का नाम लीजिए। इलाहाबादी उस ब्रांड से सजा हुआ है। बाजार आया तो, अपने साथ बिकने की गुंजाइश भी बनाता जा रहा है। होली-दीवाली, कपड़े-जूते और साल भर-महीने भर का राशन एक साथ खरीदने वाला इलाहाबादी भी हफ्ते के सबसे सस्ते दिन का इंतजार कर रहा है। और, सबसे सस्ता बुधवार आते ही बड़ा बाजार में लाइन में लग जाता है।

मुझे याद है 5-7 साल पहले वुडलैंड का कोई खास मॉडल का जूता सिविल लाइंस के कपूर शूज, खन्ना शूज और ऐसी ही कुछ और बड़ी दुकानों के चक्कर लगाने पर भी मिल जाए तो, मजा आ जाता था। अब वुडलैंड के हर मॉडल से बाजार सजा हुआ है। दूसरे बदलते इलाहाबादियों की ही तरह मैकडॉनल्ड, बिग बाजार और दूसरे ऐसे ही खास ब्रांड्स को समेटने वाले मॉल में गया तो, छोटे भाई ने कहा गाड़ी आगे लगाइए, यहां पार्किंग मना है। सिविल लाइंस में जहां कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देने का सुख था। कार की खिड़की से झांकते रास्ते में लोगों से नमस्कारी-नमस्कारा करते निकलने वाले इलाहाबादियों का ये सुख बाजार ने उनसे छीन लिया है। अब इलाहाबादी सिविल लाइंस में पार्किंग खोजता है। पार्किंग खाली नहीं दिख रही थी तो, छोटा भाई गाड़ी में ही बैठा, मैं इलाहाबाद को बदल रहे बाजार के दर्शनों के लिए चल पड़ा। खैर अच्छा-बुरा जैसा भी सही बाजार उन शहरों के लोगों को बदल रहा है जो, बाजार के नाम से ही बिदक जाते हैं। बाजार लोगों को चलने-दौड़ने के लिए तैयार कर रहा है।

Thursday, April 10, 2008

लल्ला चुंगी की चाय बैठकी ....

याद आती है हमें उन दिनों की जब मैं इलाहाबाद विश्वविधालय का छात्र था और अपने सभी साथियों के साथ कटरा के लक्ष्मी चौराहे के पिंटू की दुकान पर बैठकी किया करता था। उन दिनों की बात तो और थी, ना तो गम था और ना किसी बात का अफसोस। बस हंसी मजाक का दौर जब चल पड़ता था तो समय का पता ही नहीं चलता था और एक-दूसरों की खिंचाई करने का अपना ही कुछ मजा था। हम सभी 10-12 मित्रों ने पत्रकारिता करने के बाद, जब इलाहाबाद छोड़ने का मन बनाया तो मन में एक उमंग और एक ख्वाहिश थी कि पत्रकारिता हमें जीवंत बनाएं रखेंगी और एक नयी सोच को बनाएगें... जब मैं दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर ऊतरा तो ऊफ की आवाजा जैसे मन से निकली कि मैं कहां आ गया...खैर मन में एक उत्साह था कि कुछ करना है। जब मैं नोएडा की धरती पर कदम रखा और चैनलों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा तो मालूम चला कि जीवन का मतलब क्या है कि कितनी मुश्किल से लोग संघर्ष करके अपना स्थान बनाते है। घर से दूर था लेकिन मित्रों से संपर्क इतना अच्छा था कि समय कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता था। लल्ला चुंगी तो दूर था लेकिन मन में एक आस थी कि लड़ाई जीतनी है... इसीलिए हम सभी मित्र एक जुट थे। सभी मित्रों की अपनी-अपनी महत्वकांक्षा थी लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा किसी पर भारी नहीं पड़ती थी... हम सभी मित्रों का दिमाग एक नहीं कई था और सभी मिलकर सोच को अंजाम देते थे और इसी का परिणाम निकला कि हम मित्रों के बीच से कोई डैडी बनकर निकला तो कोई ददू... लेकिन सभी का मकसद एक था... कुछ करना है। इलाहाबाद की मिट्टी को बदनाम नहीं होने देना है... शायद इसी का परिणाम है कि आज सभी मित्र अच्छी से अच्छी जगह काम कर रहे है... और समय आने पर इलाहाबाद का नाम रोशन भी करेंगे....जय हिंद

Wednesday, April 9, 2008

sunil bhai ki photo ka mamla

sunil bhai ke photo dalne ke chakkar me main main aadhe ghante se baitha hoon . woh phone per bakiti kar rahe hai. photo bahut badhiya hai lekin sunil bhai daal de to sukr nmaniye .net bahut dhime chal raha bilkul allahabad ki jindgi ki tarah. aadhe ghante main aab jakar khula .aab photo load karne ka option nahi mil raha hai.khair umeed rakhiye sunil bhai ki photo ek aadh din me aapko dekh ne ko mil jayengee. bas main office ke kaam se phursat pa jaoon aur sunil bhai phone se

देश में लोकतंत्र की सबसे मजबूत पाठशाला है इलाहाबाद विश्वविद्यालय

( इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पहला अंतराष्ट्रीय पुरातन छात्र सम्मेलन 16-17-18 फरवरी को हुआ। किसी वजह से इसमें मैं जा नहीं पाया। इस पुरातन छात्र सम्मेलन की पत्रिका के लिए मुझसे भी विश्वविद्यालय में मेरे विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों के बारे में लेख मांगा गया था। जो, विश्वविद्यालय की पत्रिका में छपा है। मैं यहां वो लेख वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं। ये लेख इस बात पर भी मेरे विचार हैं कि पढ़ाई के साथ छात्र राजनीति कितनी सही है। मुझे लगता है कि इलाहाबादी चाय बैठकी के लिए ये प्रासंगिक हो सकता है और बैठकी में बहस भी इस पर हो सकती है।)

पढ़ाई हमेशा अच्छे भविष्य और मजबूत व्यक्तित्व की बुनियाद होती है। और, मैंने जो, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई के दौरान पाया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों का गजब का व्यक्तित्व विकास होता है। मैं आज जो कुछ भी हूं उसका बड़ा योगदान इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे पढ़ाई के 7 साल रहे हैं।

मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कोई भी चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन, पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ चुनावों में सक्रिय हिस्सेदारी की वजह से मैं उन्हीं दिनों देश की संसदीय परंपरा से भली-भांति वाकिफ हो गया था। 1993-2000, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस संक्रमण काल के आखिरी दौर में गिना जा सकता है जिसकी एक दशक पहले शुरुआत हुई थी। उस समय तक सत्र देरी से चल रहे थे। विश्वविद्यालय में पढ़ाई का सत्र तो देरी से चल ही रहा था। छात्रसंघ के चुनाव भी समय पर नहीं हो रहे थे। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPCS) के भी 3-3 पुराने सत्रों के परिणाम एक के बाद एक आ रहे थे। यानी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर आगे की योजना बनाने वाले छात्र-छात्राएं, चुनाव लड़कर-जीतकर आगे संसद-विधानसभा का रुख करने की चाहत रखने वाले छात्रनेता और IAS-PCS बनकर किसी जिले में अपनी काबिलियत दिखाने की हसरत रखने वाले छात्र सभी के लिए ये संक्रमण काल था। उस समय ये बात ज्यादा समझ में नहीं आती थी।

खैर, 1996 के बाद से सत्र धीरे-धीरे फिर पटरी पर आने लगे थे। 1998 में शायद ही कोई सत्र लेट रहा हो। 6 महीने के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर वी डी गुप्ता और उसके बाद आए कुलपति प्रोफेसर चुन्नीलाल क्षेत्रपाल ने विश्वविद्यालय को पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले लिए। बीस-बीस सालों से छात्रावस के कमरे में कब्जा जमाए बैठे बूढ़े छात्रों को कमरों से बाहर निकालकर नए छात्रों को मेरिट के आधार पर कमरे मिलने लगे।

एक वाकया जो मुझे याद आ रहा है। विश्वविद्यालय में सत्र की देरी से परेशान छात्रों और छात्रनेताओं का एक वर्ग इस बात के लिए पूरी तरह से मन बना चुका था कि अब किसी भी कीमत पर परीक्षा में देरी नहीं होने दी जाएगी। प्रोफेसर चुन्नी लाल क्षेत्रपाल भी इस फैसले पर मजबूत बना चुके थे कि परीक्षा नहीं टाली जाएगी चाहे जो, हो। लेकिन, सस्ती लोकप्रियता के लिए छात्रनेता, छात्रों के एक वर्ग ने कुलपति पर विधि की परीक्षाएं फिर से टालने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद परीक्षा विरोधी और परीक्षा समर्थक खेमों ने विश्वविद्यालय परिसर में रजिस्ट्रार ऑफिस के सामने अगल-बगल ही मंच लगाकर भाषण करना शुरू कर दिया। भाषण का दुखद अंत मारपीट के साथ हुआ लेकिन, परिणाम सुखद ये रहा कि परीक्षा नियत समय पर ही हुई।

खैर, लोक सेवा आयोग चौराहा और यूनिवर्सिटी के सामने से साइंस फैकल्टी तक जाने वाली सड़क पर आए दिन धरना प्रदर्शन आम बात थी। लेकिन, एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा अपील करती थी कि कहीं भी किसी धरना प्रदर्शन में मुझे ये याद नहीं आ रहा है कि कहीं भी छात्रों ने आंदोलन के दौरान आम लोगों को परेशान किया हो। यही वजह है कि इलाहाबाद अकेला शहर होगा जहां, परिवारों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलनों को मदद मिलती रही है।

बूढ़े-बुजुर्ग (कहलाते सब छात्रनेता ही थे) नेता परिसर में छात्रों के हितों का बीड़ा उठाए घूमते थे। लेकिन, मुझे अपने समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेताओं की एक अच्छी बात ये थी कि दुर्गुणों (शराब, सिगरेट, अपराध) का आरोप शायद ही किसी छात्रनेता पर लगा हो। परिसर में एक साथ अगर 10-12 नौजवानों के बीच में कोई एक खद्दरधारी घूम रहा है तो, आसानी से समझ में आ जाता था कि कोई छात्रनेता चल रहा है। और, अगर एक ही उम्र के ढेर सारे लड़के चुहल करते घूम रहे हैं और किसी एक लड़के के लिए बीच-बीच में नारे भी लगा रहे हैं तो, मतलब साफ है अगले चुनाव के लिए एक नया छात्रनेता तैयार हो रहा है।

चुनाव और परीक्षा के सत्र में देरी की वजह से 1995 के चुनाव तक ज्यादा बुजुर्ग हो चुके छात्रनेताओं (35-45 साल) के बीच नए छात्रनेताओं (20-28 साल) की भी पूरी जमात तैयार हो चुकी थी। उस समय ये भी चर्चा शुरू हो गई थी कि छात्रसंघ चुनाव लड़ने की उम्रसीमा अधिकतम 28 साल होनी चाहिए। मुझे याद है गोरखपुर में 25 साल की उम्रसीमा लागू की गई तो, वहां के छात्रसंघ के महामंत्री जो, अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहते थे, उम्रसीमा में थोड़ी छूट के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय में याचिका दाखिल करने आए थे। उनकी उम्र 26 साल हो चुकी थी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यालय के नीचे खड़े होकर वो पान खा रहे थे कि तभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष का चुनाव लड़ने वाले 2 (40 साल के ऊपर के) बुजुर्ग छात्रनेता वहां आ गए। उनको देखने के बाद गोरखपुर से उम्रसीमा में छूट के लिए आए छात्रनेता ने चुनाव लड़ने का इरादा त्याग दिया और बिना याचिका दाखिल किए ही लौट गए।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में किसी के छात्रनेता बनने की भी शुरुआत बड़े रोचक तरीके से होती थी। पिछले चुनाव मे किसी छात्रनेता के पीछे की सबसे सक्रिय मंडली में से किसी एक को अगला चुनाव लड़ाने की तैयारी हो जाती थी। तर्क ये कि जब हम पुराने छात्रनेता के लिए 100 वोट जुटा सकते हैं तो, अपने साथी के लिए तो, 500 वोट जुटा ही लेंगे। कुछ इसी तरह से हम लोगों की 40-50 लोगों की एक जबरदस्त छात्रों की मंडली (इसमें मेरे जैसे इलाहाबाद में अपने घर में रहने वाले और बाहर के जिले, प्रदेश से आकर छात्रावास या डेलीगेसी में रहने वाले छात्र थे।) ने भी अपने साथ के मनीष शुक्ला को चुनाव लड़ा दिया। मनीष बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर से चुनाव लड़े और फिर बहुत ही कम समय में भारतीय जनता युवा मोर्चा के रास्ते जौनपुर की खुटहन विधानसभा का चुनाव लड़ा। कुछ यही तरीका होता है इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रनेता के चुने जाने का। यानी एकदम लोकतांत्रिक तरीका।

इलाहाबाद को लोकतंत्र की मैं सबसे मजबूत पाठशाला कह रहा हूं तो, इसके पीछे वहां के छात्रों के चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने और अपना नेता चुनकर उसे जिताने तक की बात कर रहा हूं। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अलावा इलाहाबाद विश्वविद्यालय देश का अकेला विश्वविद्यालय होगा जहां, आमने-सामने छात्र नेताओं के मंच लगते हैं। स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहस होती है।

विश्वविद्यालय मार्ग पर चुनाव के एक दिन पहले लगने वाले ये मंच नेता की जीत-हार का पैमाना तय करते हैं। छात्रनेता के समर्थन में पुराने-नए छात्रनेता, पूर्व पदाधिकारी आकर भाषण देते हैं और माना जाता था कि जिसका मंच सबसे बाद तक टिका रहता उसका चुनाव जीतना लगभग तय हो जाता था। जैसे किसी लोकसभा चुनाव में नेता के पक्ष में राष्ट्रीय, राज्य के नेताओं की मीटिंग होती है ठीक वैसे इलाहाबाद में दिल्ली, जेएनयू, बीएचयू या प्रदेश के दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ पदाधिकारी भी अपने प्रत्याशियों के प्रचार में आते थे।

इलाहाबाद की लोकतंत्र की पाठशाला की एक और अद्भुत बात जो, मैं जोड़ रहा हूं वो, हैं यहां के छात्रसंघ चुनाव में निकलने वाला मशाल जुलूस। मशाल जुलूस विश्वविद्यालय मार्ग पर लगे मंचों से नेताओं का भाषण खत्म होने के बाद शुरू होता था। फिर समर्थ प्रत्याशी अपने चुनाव कार्यालय से बांस की खपची, जला तेल, कपड़ा और मिट्टी से बनी कुप्पी जैसी मशाल लेकर निकलते थे। हर प्रत्याशी के जुलूस के बीच में दो ट्रॉली पर अतिरिक्त जला तेल होता था जो, बुझती मशाल को आखिर तक जलाए रखने में मदद करता था। ये मशाल जुलूस अगली सुबह होने वाली चुनाव की दिशा तो तय करता ही थी। लड़कों के लिए ये महिला छात्रावास में बिना रोक घुसने का एक लाइसेंस भी था। लड़कियों के छात्रावास के दरवाजे खुले होते थे। अपने से तय नियम के मुताबिक, एक-एक जुलूस अंदर जाते थे और लड़कियों की ओर से फेंकी गई फूल-मालाओं के साथ थोड़ा और उत्साह से भरकर वापस आ जाते थे। वैसे, ये परंपरा इलाहाबाद में जसबीर सिंह के एसपी सिटी रहने के समय पहले आरएएफ के घेरे में बंधी फिर टूट गई। वैसे, मैंने उद्दंड से उद्दंड छात्रों को भी कभी इस दौरान लड़कियों के छात्रावास में कोई बद्तमीजी करते नहीं देखा था। लोकतंत्र की एक और बेहतर मिसाल।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में चुनाव लड़ने वाले छात्रनेता का चुनाव क्षेत्र एक संसदीय क्षेत्र से भी बड़ा होता है। मेरा घर इलाहाबाद में है। लेकिन, मैंने इलाहाबाद की गलियों को, मोहल्लों को नजदीक से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चुनावों के दौरान ही देखा। परिसर के मुद्दों के अलावा जाति, क्षेत्र, छात्रावास, डेलीगेसी इन सभी मुद्दों पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं को बैलेंस करके चुनाव जीतना होता था। इलाहाबाद में मेरे समय में दक्षिणपंथी छात्र संगठन और वामपंथी छात्र संगठन दोनों ही काफी सक्रिय रहते थे। वामपंथी छात्र संगठनों की वोटों की मामले स्थिति काफी पतली रहती थी जबकि, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मेरे समय में बहुत ही मजबूत स्थिति में था। लेकिन, सेमिनार, धरना-प्रदर्शन पर हर तरह के छात्र संगठनों की मौजूदगी परिसर और परिसर के बाहर निरंतर बनी रहती थी। इस सबके बावजूद आज संसदीय चुनावों को बेहतर करने के लिए जिस बात की सबसे ज्यादा वकालत की जा रही है वो, मेरे समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में खुद ही चल रही व्यवस्था का हिस्सा बन गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बैनर कभी चुनाव नहीं जिता पाता था। मजबूत व्यक्तित्व चुनाव जीतने की पहली शर्त होता था।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मिलने अनुभवों के आधार पर ही मेरा ये मजबूत विश्वास है कि पढ़ाई के दौरान हर लड़के-लड़की को किसी न किसी छात्र संगठन से जरूर जुड़ना चाहिए। भले ही वो राइटिस्ट हो, लेफ्टिस्ट हो या फिर सोशलिस्ट हो। क्योंकि, किसी छात्र संगठन में काम करने से सोचने और किसी बात पर प्रतिक्रिया देने की जो आदत बनती है वो, ताउम्र जि&#