Saturday, September 24, 2016

डायरी के पुराने पन्नों से  ..... एक बार फिर

बंद पलकों से उसे
अपनी बांहों में महसूस करता रहा
सागर की उठती लहरें
दिल के तारों को झनझना रही थीं
मन में एक अजीब सी कसमसाहट थी
उसे अपने अंदर समा लेने की
हाथ मचल रहे थे

अचानक पीछे से किसी ने आवाज़ दी
आंख खुली तो देखा
दूर तक सन्नाटा फैला था
और
समंदर शांत था !
"इस शहर में संभल कर रहियेगा,
यहां की आबो- हवा ठीक नहीं है,
लोग बुलाकर यहां गले मिलते हैं,
और पीठ में खंजर उतार देते हैं।"  

Monday, August 17, 2015

कच्चा मकान

बहुत चुभता है जिगर में किसी खंजर की तरह
ये जो मौसम है मेरे सर पे समंदर की तरह
ये जो बादल हैं गरजते हुए चिल्लाते हुए
देखकर लगता है डर बिजली तड़प जाते हुए
कोई तो रोक ले ये टूटकर गिरती बूंदे
शहर के बीच खड़ा नौजवान कहता है

मेरे सीने में इक कच्चा मकान रहता है

Saturday, December 27, 2014

कल संगम पे दो देवियाँ मिलीं

कल संगम पे दो देवियाँ मिलीं . मैं जैसे ही उनकी फोटो उतारने लगा दोनों ने अपना चेहरा घुमा लिया . मैंने पूंछा कि चेहरा क्यूँ घुमाया तो कहने लगीं कि दस-दस रूपया दोगे तो फोटो खिचायेंगे . मुझे उनसे बात करने का मन था, तो मैंने पैसा देने से मना कर दिया और आगे बढ़ने का नाटक किया. दोनों भाग कर पास आयीं और कहने लगीं पाँच-पाँच रूपये दे देना . फिर बिना मेरी बात सुने दोनों वहीं पड़े बालू के ढेर पर चढ़ गयीं और आशीर्वाद देने की मुद्रा में आ गयीं. मैं मुस्कुराता रहा और उनकी कई तस्वीरें लीं . फिर मैं जानबूझकर जाने लगा तो दोनों लपककर मेरे पैरों में लिपट गयीं और अपने पाँच-पाँच रूपये मांगने लगीं . मैंने पूंछा कुछ खाओगी, दोनों ने एक-दूसरे को मुस्कुराकर देखा और कहा फुल्की खायेंगे . मैंने देखा तो थोड़ी दूर एकदम संगम नोज पर एक फुल्की (गोलगप्पे) वाला दिखा . दोनों ने वहाँ चलने का इशारा किया और मेरे चढने से पहले ही मेरी बाईक की पिछली शीट पे कब्ज़ा जमा लिया. मैं फिर मुस्कुराता रह गया . फुलकी वाले ने पूंछा कितने का खिला दें भईया, मैंने कहा इनको जितना खाना हो खिला दो . दोनों ने पाँच-पाँच रूपये की फुल्की खायी और एक ने शरमाते हुए पूंछा और खा लें, मैंने सिर हिला कर इशारा किया तो दोनों ने मन-भर फुल्की खाई. फिर मैंने पूंछा कुछ और खाओगी, तो एक ने उंगली से पास खड़े लाई-चने वाले की ओर इशारा किया. दोनों के साथ मैं लाई-चने वाले के ठेले पर पहुंचा, तो दोनों ने मेरे बोलने से पहले ही लाई-चने वाले को सब समझा दिया . मेरी तरफ देख कर लाई-चने वाला मुस्कुराया, मैं तो पहले से ही मुस्कुरा रहा था. दोनों को खिला-पिलाकर मैं चलने लगा तो छोटकी बोली मेरे पाँच रूपये तो दे दो. मैं फिर मुस्कुराता रह गया और मेरे हाँथ जेब में अपने आप पहुँच गए. उनको दस रूपये देने के बाद अपने दोनों हाँथ जोड़कर..झुककर मैंने कहा – “ देवियों प्रणाम..अब चलूँ ”..... दोनों मासूमियत के साथ शरमाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगीं . मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और वापस लौटने लगा....बहुत दूर तक उनकी हंसी गूंजती रही. संगम पे तो अक्सर ही जाता हूँ, लेकिन इन देवियों के साथ बीती कल शाम शानदार रही .

Friday, October 3, 2014

इस घाट पर, उस घाट पर
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रेत की सतह से उठता चांद
रश्मियां फेंकता है हर घाट पर
पानी पर तैरती किरणों का सोना
लुटता है हर एक घाट पर
 
नाविक जानते हैं नहीं टिकतीं
चांद की सोना किरणें पानी पर
किसी घाट पर नहीं लुटाता रश्मियां
चांद की किरणें की यह अदा है झूठ
झूठ है होना‌ रश्मियों का हर घाट पर
 
बुजुर्गों ने मोक्ष नगरी के निवासियों से
कहा था कभी कि सब कुछ है मिथ्या
चांद, नदी, घाट, रश्मियां, उत्सव और हम
माया नगरी है, लुट जाएगी
मोनू माझी को है इस बात पर भरोसा
फिर भी उसे खेनी पड़ती है नाव
इस घाट पर, उस घाट पर, हर घाट पर
 
-अजय राय
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Tuesday, September 10, 2013

महापुरुष नहीं बनाते इतिहास

हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया,
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।

यह शेर साहिर लुधियानवी का है। यहां नया खुदा शब्द गौरतलब है। सच तो है कि पुराने खुदाओं से किसी नए दौर में काम नहीं चलता। इतिहास अपने कालखंड का महापुरुष या नायक खुद तैयार करता है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि कोई महापुरुष आया हो और उसने इतिहास को बदला हो। भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना से उसके समापन तक लगातार आमजन उनसे लड़ते रहे। इनमें से कुछ तारीख के सफे पर दर्ज हो गईं और कुछ को इतिहास की कार्यवाही से बाहर ही रखा गया। इतिहास और इतिहासकारों के इस दृष्टि दोष तारीख के बाहर खड़े लोगों के नजरिए पर कुछ भी फर्क पड़ा हो लेकिन समस्या से जूझने वालों की प्रतिक्रिया नहीं बदली।
उत्तर प्रदेश के सुदूर पूर्व के जिले गाजीपुर की मुहम्मदाबाद तहसील पर 18 अगस्त 1942 को तिरंगा लहराने के प्रयास में आठ लोग शहीद हुए। सभी शहीद एक गांव शेरपुर के रहने वाले थे। शहीदों में शेरपुर के ही डा. शिवपूजन राय भी शामिल थे। वह इस आंदोलन के नेता थे। उनका जन्म एक मार्च 1913 में हुआ था। उनके घर के लोग यह तारीख 1910 मानते हैं। यहीं तिथि शहीद स्मारक मुहम्मदाबाद के शिलालेख पर दर्ज है। एक मार्च 1913 की तारीख शेरपुर गांव के पश्चिमी प्राथमिक पाठशाला के रिकार्ड में दर्ज है। उसमें यह भी दर्ज है कि उनको साल में दो कक्षाओं में प्रोन्नति दी गई थी। उनके भाई विश्वनाथ राय, जो सन 1942 में जेल गए थे, उन्होंने बताया था कि उनकी अपनी पैदाइश 1917 की है। इस लिहाज से विद्यालय के रिकार्ड में दर्ज तिथि कुछ ज्यादा गलत नहीं लगती है। इस तिथि का सटीक पता जन्मकुंडली से हो सकता था लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं है। दरअसल मुहम्मदाबाद के आंदोलन के बाद गाजीपुर और बलिया जिले आजाद हो गए थे। वहां दोबारा अपनी सत्ता कायम करने के लिए सभ्य अंग्रेजों ने जो बर्बरता दिखाई, उससे जन्मकुंडली तक अछूती नहीं रही। उन्होंने शेरपुर गांव में 80 घरों को जलाकर राख कर डाला और 400 घरों में लूटपाट की। कैसा आतंक रहा होगा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव राधिकारानी उनसे बचने के लिए गड्ढे में कूदना पड़ा और उनकी जान चली गई। यह तो सच का वह हिस्सा जो कहीं दर्ज हो गया है। पर यह बात कहां दर्ज है कि आततायी अंग्रेजों से बचने के लिए गांव के हजारों लोग पलायन कर गए थे। आंदोलन के नायक डा. शिवपूजन राय का घर जब अंग्रेज जला रहे तो उनका परिवार शेरपुर से गहमर की ओर पैदल ही भाग रहा था, जिसमें तीन बच्चे, कुछ महिलाएं थीं। तब जबरदस्त बारिश हो रही थी, जिसमें भींगने के कारण आंखें उलट गई थीं। तब उन्हें भोजपुर जिले के सेमरी गांव में शरण मिली थी। यह परिवार घर की जमापूंजी (चांदी के रुपये और गहने) जमीन में गाड़कर जौ छींट गया था ताकि लौटने पर जौ के सहारे जमीन खोदी जाए और जिंदगी को पटरी पर लाया जा सके। जब जान आफत में हो तो जन्मकुंडली की किसको परवाह थी। घर जला तो उसमें अनाज भी जला और जन्मकुंडलियां भी राख हो गईं।
इतिहास की दृष्टि से इन बातों को ज्यादा मायने लगता है लेकिन तत्कालीन पीड़ा की झलक इनमें जरूर है। इतिहासकार की दृष्टि दूर तलक देखती है, कई बार उनको नजदीक की चीजें दिखाई नहीं देतीं। इसीलिए प्राचीन भारतीय इतिहास पर जितना काम हुआ, उसका चौथाई काम भी 1942 के भारत छोड़ो के जन आंदोलन पर नहीं हुआ। शायद इसलिए भी कि इतिहासकारों ने इसे ज्यादा पुराना नहीें समझा और उसमें ज्यादा कुछ पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझीं। इतिहास की नई धारा सब आर्ल्टन स्टडीज में इतिहास की जड़ों की तलाश करने की कोशिश की गई। यह काम भी बाढ़ से उफनाई नदी के बीच की लहरें गिनने के प्रयास की तरह ही साबित हुआ। टुकड़ों में चीजों को खोजने की यह कोशिश भी किसी बड़े नतीजे पर ले जाती प्रतीत नहीं होती। सबने यह बात तो कहा कि जनता के आंदोलन की बदौलत 19 अगस्त 1942 को बलिया आजाद हो गया। किसी ने यह सवाल कहां पूछा कि इससे एक दिन पहले 18 अगस्त को गाजीपुर के मुहम्मदाबाद तहसील झंडा लहराते समय जो शहादत हुई, उसका क्या प्रभाव हुआ?
करो या मरो आंदोलन के बाद नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन बंद हो गया था। वर्ष 1945 में जब अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ तो उसमें बलिया और गाजीपुर में अंग्रेजों के उत्पीड़न की दास्तान प्रकाशित की। गाजीपुर की नादिरशाही शीर्षक से लिखा-
पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के अन्य जिलों की तरह गाजीपुर को भी 1942 और उसके बाद क्रूर दमन का शिकार बनना पड़ा। शेरपुर गांव, जहां शेर दिल लोग रहते हैं। इन लोगों ने कांग्रेस राज की स्थापना कर दी। उनका संगठन बेहतरीन था और उन्होेंने गांवों में कुछ दिनों तक शांतिपूर्ण तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था संभाली। मगर कुछ ही दिनों बाद हार्डी और उसकी सेना ने मार्च करना शुरू कर दिया और इस प्रशासनिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर डाला। अखबर के मुताबिक 24 अगस्त को गाजीपुर का जिला मजिस्ट्रेट मुनरो 400 बलूची सैनिकों के साथ शेरपुर गांव पहुंचा। निहत्थे ग्रामीण हथियारबंद सेना का सामना नहीं कर पाए। सेना ने गांव में लूटमार शुरू कर दी। महिलाओं के गहने तक छीने गए। लोग घर-बार और संपत्ति फेंक कर भागे। इसमें गांव को दो लाख रुपये से अधिक की क्षति हुई।
अखबार ने आगे लिखा है कि मुनरो का कत्लेआम मुहम्मदाबाद तहसील की गोलीबारी के बाद ही पर्याप्त नहीं हुआ था उसने छह दिन बाद गांव में लूट और हत्या का नंगा नाच किया। अंग्रेजों के भय से राधिकारानी गड्ढे में कूद गई और मारी गई। (गौरतलब है कि उस समय गांव में बाढ़ आई हुई थी।) गांव में 80 घर जलाएग और 400 घरों को लूटा गया। अखबार में सिर्फ छह बहादुर लोगों की शहादत का जिक्र है। हालांकि यहां डा. शिवपूजन राय, ऋषेश्वर राय, वंश नारायण राय पुत्र ललिता राय, वंश नारायण राय पुत्र जोगेंद्र राय, नारायण राय, राज नारायण राय, राम बदन उपाध्याय, वशिष्ठ नारायण राय आदि आठ लोग शहीद हुए थे। सीताराम राय, श्याम नारायण राय, हृदय नारायण राय पाठक जी अंग्रेजों की गोली से घायल हुए और गिरफ्तारी भी झेली। मुनरों और उसके सैनिकों की लूटपाट में जान बचाने के चक्कर में राधिकारानी नहीं बल्कि रमाशंकर लाल और खेदन यादव भी मारे गए थे। समाचारों को तत्कालीन इतिहास माना जाता है लेकिन यहां उसमें भी चूक दिख रही है। यहां दो वंश नारायण हैं, जिसके चलते पत्रकार को चूक का मौका मिला। हालांकि अखबारे में लिखे नामों में भी कई तरह की चूक है।
खबरों को त्वरित इतिहास माना जाता है लेकिन यहां भी कम चूक नहीं होती। चूक के पीछे कई बार वह मध्यवर्गी दृष्टि है जो आम आदमी की वास्तविक गाथा तक आसानी से जाने नहीं देती। तमाम तर्कों और प्रमाणों की दुहाई देते हुए भी इतिहासकार कई बार ऐसी चूक करते हैं। लंदन में रहने वाले एक इतिहासकार, जिनके लेखन पर तमाम इतिहासकारों को भरोसा था, उन्होंने गांवों में अंग्रेजी राज के दौरान रुपये में मजदूरी के भुगतान और अनाज की कीमत का चार्ट प्रस्तुत किया है। कई बार इस तरह के आभाषी चिंतन हमें तंग करते हैं। जनसंघर्ष और मामूली आदमी की गैरमामूली दास्तान को समझने के लिए ऐसे दृष्टिदोष से उबरना उचित जान पड़ता है। खतरा सूचनाओं की कमी ही नहीं बल्कि उनके अतिरेक से भी होता है। किसी शायर ने ठीक कहा है कि -सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं। मुहम्मदाबाद शहीद स्मारक समिति के दस्तावेज में कृपाशंकर राय, रामाधार राय, जमुना राय, जगदीश शास्त्री, रामनरेश यादव, रामबदन को घायल बताया गया है। उनके साथ 25 लोगों की गिरफ्तारी बाद में हुई थी। शहीद स्मारक समिति के दस्तावेज में शहीदों की शैक्षणिक योग्यता बढ़ाचढ़ा कर दिखाई गई है। शहीद स्मारक समिति ने तो एक झंडे को भी सहेज कर रखा है, जिसे अगस्त क्रांति में तहसील पर फहराया गया तिरंगा बताया जाता है। इतिहास में इस तरह के अतीतमोही कथातत्वों से परहेज भी जरूरी है। गौर करने वाली बात है कि जहां शहीदों की जन्मकुंडलियां सुरक्षित नहीं बची थीं, वहां ध्वज कैसे बचा रह गया था।
मुहम्मदाबाद तहसील की घटना न तो सहसा हुई और न ही उसे इतिहास के कालखंड काटकर किसी अनूठी घटना के रूप में रेखांकित करने की जरूरत है। मुंबई में 9 अगस्त 1942 को करो या मरो आंदोलन के ऐलान के बाद उसकी अलग-अलग जगहों पर जुदा-जुदा तरीके से प्रतिक्रियाएं हुईं। हर जगह की प्रतिक्रिया में वहां के स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया और वे अपनी संस्कृति और समस्याओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया करने के तौर-तरीके छोड़ कर नहीं आए थे, लिहाजा उन्होंने अपने तरीके से चीजों को समझा उसे अभिव्यक्त किया। उनका लक्ष्य अंग्रेजों को खदेड़ना था। इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे। लगातार जारी आंदोलनों से देश तैयार हो चुका था और नौजवानों की एक टीम इस आंदोलन को अंजाम देने में सक्षम हो गई थी। यह टीम वैचारिक तौर पर सक्षम भी हो चुकी थी।
गरुआ मकसूदपुर के रहने वाले बेणी माधव राय को पर्चा बंटते समय पुलिस ने पकड़ा था। उन्होंने 1930 में शिवपूजन राय को अपना नेता बताया था। राव साहब के नाम से वह पत्रवाहक का काम करते थे। गाजीपुर से बलिया के बीच गुप्त पत्र पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी थी। वर्ष 1935-36 में वह महानंद मिश्रा के संपर्क में आए थे। गुप्त पर्चे लगातार छपते और बंटते थे। वाराणसी उनका केंद्र था। डा. शिवपूजन राय 1932 में गाजीपुर जिला कांग्रेस के महामंत्री थे। गाजीपुर के मिशन स्कूल से उनको एक आंदोलन की अगुआई करने पर उनको, धर्मराज सिंह, नारायण दत्त और इंद्रदेव सिंंह को निष्कासित किया गया था। उनको आगे की पढ़ाई के लिए वाराणसी आना पड़ा। यहां जयनारायण कालेज और हिंदू स्कूल में पढ़ाई के दौरान शचिंद्रनाथ सान्याल से उनका संपर्क हुआ। गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी हुआ तो कोलकाता चले गए और होम्योपैथिक चिकित्सा हासिल की। हालांकि वह विज्ञान में स्नातक के छात्र थे लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। कोलकाता से लौटने के बाद उन्होंने गांव में रहकर लोगों को दवाएं देनी शुरू की और अंग्रेजों के प्रति गोलबंद करना शुरू किया। वह अनुशीलन समिति और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से भी जुड़े रहे। चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों से उनका गहरा रिश्ता था।
आठ अगस्त को मुंबई में भारत छोड़ो ऐलान होने के बाद गाजीपुर जिले में आंदोलन की आग भड़क गई। नंदगंज, सादात, बनारस, सैदपुर हर जगह अंग्रेजों का विरोध शुरू हो गया। अगस्त क्रांति की आग अचानक शेरपुर या मुहम्मदाबाद से नहीं भड़की। यमुना गिरी के नेतृत्व में गौसपुर हवाई अड्डे पर पहले ही तोड़फोड़ हो चुकी थी। बीज गोदाम, पोस्टाआफिस, रेलवे स्टेशनों आदि में लूटपाट की घटनाएं गाजीपुर जिले में हफ्ते भर चलती रहीं। मुहम्मदाबाद में जो हुआ उसकी परिणति था। 18 अगस्त 1942 को बाढ़ आई थी। शेरपुर गांव चारों तरफ से पानी से घिरा था। इसके बावजूद गांव के लोग एकत्रित होने लगे। मंगलवार का दिन था, लिहाजा बजरंग बली का दर्शन-पूजन के बाद लोग नावों पर सवार होकर सड़क पर पहुंचे। वहां निर्णायक हमले की रणनीति बनाई गई। तय किया गया कि मजबूत नौजवान तहसील में पीछे से दाखिल होंगे और नेता आगे से आएंगे। सूचना मिली थी कि तहसील में 35 सशस्त्र जवान तैनात हैं। तय किया गया कि 70 पहलवान किस्म के युवक पीछे से जाकर उन पर काबू पा लेंगे। इस तरह गांधी जी की अहिंसा की लाज रह जाएगी और झंडा भी फहरा दिया जाएगा। मगर तहसील परिसर में दाखिल होते ही नौजवानों की टोली ने जय बजरंग बली का नारा लगाकर सिपाहियों पर झपट्टा मारा ही था कि गोलियां चलने लगीं। एक के बाद एक तीन लोग वहीं मार दिए गए। श्यामू दादा ने बंदूक की नाल में उंगली डाल दी और उनकी उंगली उड़ गई। उसके बाद दो बंदूकें छीन ली गईं। मुख्य गेट की ओर से डा. शिवपूजन राय के नेतृत्व में आए लोगों पर भी गोलियां चलने लगीं। घायलों और मृतकों को वाहनों पर लाद कर अंग्रेज साथ लेते गए। मारे गए लोगों को उन्होंने कठवापुल के पास नदी में प्रवाहित कर दिया। डा. शिवपूजन राय का शव प्राप्त नहीं हुआ।
गाजीपुर और बलिया के क्रांतिकारियों के बीच लगातार संपर्क बना था। लिहाजा इस घटना के अगले दिन बाद ही आंदोलन की चिनगारी बैरिया, बलिया में फैल गई। इसके नेता महानंद मिश्र थे। उनका सीधा रिश्ता गाजीपुर के आंदोलनकारियों से था। इस संपर्क को निरंतर बनाए रखने का काम वेणीमाधव राय करते है, जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। बलिया आजाद हो गया। आजादी के बाद बलिया का गुणगान खूब हुआ लेकिन गाजीपुर को भुला दिया गया। हालांकि 1945 में सूबे में अंतरिम सरकार बनने के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू और फीरोज गांधी बलिया गए और शेरदिल जवानों का गांव देखने शेरपुर भी आए। शेरपुर के नौजवानों की शहादत भले ही भारत में अख्यात रही हो लेकिन लंदन में जब भारत के भविष्य पर चर्चा चल रही थी तब गाजीपुर के कलक्टर के उस डिस्पैच को उद्धृत किया गया, जिसमें उसने कहा था कि पढ़े-लिखे नौजवान सीने पर गोली मारने का आग्रह कर रहे हैं। अब हिंदुस्तान को गुलाम नहीं रखा जा सकता।
बात डा. शिवपूजन राय की जन्मतिथि से शुरू हुई थी। उसका हमारे पास कोई रिकार्ड नहीं है, सिवाय शेरपुर के बेसिक प्राइमरी पाठशाला के रिकार्ड के। वहां दी गई जन्मतिथि हेडमास्टर की कल्पना का हिस्सा है। भारतीय इतिहास की परंपरा लेखन की कम और श्रुति की ज्यादा रही है। यह बात सुनने को मिली थी। जब डाक्टर शिवपूजन राय होम्योपैथी की पढ़ाई करके गांव आए तो उन्होंने लोगों को मुफ्त दवाएं देनी शुरू की। उनके पिता वीरनायक राय कंजूस माने जाते थे। पिता से छुपा कर वह लोगों को दवाएं देते थे। उनकी क्लीनिक भी गांव के ही किसी अन्य व्यक्ति के दरवाजे पर थी। एक दिन उनके पिता ने पूछा कि दवा देने के बाद वह मरीजों के कुछ पैसा लेते हैं या नहीं। झिझकते हुए उन्होंने कहा कि ले लेता हूं। उनके पिता ने कहा कि साल में सौ रुपया हमसे दवा का ले लेना, किसी उसके पैसे मत लेना। जब लोग ठीक होकर मुस्कुराते हैं तो अच्छा लगता है। यह एक पहलू है लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि गांव में क्रांतिकारी गतिविधियों का विरोध करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी। इन्हीं दो ध्रुवों के बीच दो हजार से ज्यादा लोग एक ही गांव से तहसील पर झंडा फहराने के लिए चल पड़े थे क्योंकि जब तूफान आता है तो तिनकों का पता नहीं चलता। चंद्रशेखर आजाद की मौत के बाद क्रांतिकारी आंदोलन में बिखराव आ गया था लेकिन 1942 में जो कुछ हुआ उसकी अगुवाई भी सर्वथा नई ताकतों ने की थी क्योंकि कांग्रेस के स्थापित नेता तो जेल जा चुके थे।
मुहम्मदाबाद का आंदोलन किसी अन्य क्षेत्रों में अंग्रेजी राज के प्रति भड़के जनाक्रोश की प्रतिकृति ही दिखाई देता है लेकिन यह कुछ मायनों में अलग भी है। पूरे देश में ऐसा कोई आंदोलन नहीं हुआ होगा, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए हों। शेरपुर से शुरू जुलूस में मुहम्मदाबाद तक पहुंचते-पहुंचते आसपास के कई गांवों के लोग शामिल हो गए थे। इसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, जिन्हें तहसील से पहले ही लौटना पड़ा था। यह निरबंसी आंदोलन भी नहीं था। मुहम्मदाबाद में हुई शहादत के नतीजे निकले। इसकी वजह से देश का यह हिस्सा 18 अगस्त 1942 को आजाद हो गया। इसके बाद बलिया आजाद हुआ। लोगों ने 26 अगस्त तक यानी आठ दिनों अपना प्रशासन कायम किया। वह एकदम शांतिपूर्ण था। गांव में दो बंदूकें आ गई थीं लेकिन दमन के दौरान भी किसी ने उन्हें चलाया नहीं क्योंकि नेता का ऐसा आदेश नहीं था। इस आंदोलन ने अंग्रेजों और कांग्रेस के नेताओं को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया।

अजय राय

Wednesday, August 21, 2013

पुरानी डायरी के पन्नों से………….


दिन पूरा बीत गया,
जीवन की आपाधापी में,
हमने रिश्तों की शाखों को,
झाझोरा भी,
कुछ बातें थीं,
सूखे पत्ते बनकर टूट गयी,
कुछ यादें थीं,
आंसूं बनकर टपक गयी,
हमने साड़ी रात,
उन पत्तो की आग को तापा भी,
कुछ बूंदे थीं,
खारे पानी की,
जो उस आग में जलकर धुंआ हुई,
अभी कुछ पत्ते बचे हैं,
शाखों पर,
इस उम्मीद से की,
अभी कुछ हरियाली की तासीर बची है उन पर....

Tuesday, July 30, 2013

तीस साल का इतिहास

तीन, साढ़े तीन दशक !!!! बहुत लम्बा समय होता है यह..एक पूरी जन्मी पीढी स्वयं जनक बन जाती है इस अंतराल में.चालीस से अस्सी बसंत गुजार चुके किसी से पूछिए कि इस अंतराल में क्या क्या बदला देखा उन्होंने..समय की रफ़्तार की वे बताएँगे..परन्तु कई बार कुछ चीजों को देख प्रवाह और परिवर्तन की यह बात एकदम गलत और झूठी लगने लगती है.लगता है इस क्षेत्र विशेष में तो कुछ भी नहीं बदला.यहाँ आकर घड़ी की सुइयां एकदम स्थिर हो टिक टिक कर चलने ,गुजरने का केवल भ्रम दे रही हैं..
लगभग तीन दशक पहले मूर्धन्य व्यंगकार श्री शरद जोशी जी ने समय के उस टुकड़े को कलमबद्ध किया था अपने आलेख "तीस साल का इतिहास" में जो उनकी पुस्तक " जादू की सरकार" में संकलित है..कईयों ने पढ़ा होगा इसे, पर मैं अस्वस्त हूँ कि इसका पुनर्पाठ किसी को भी अप्रिय न लगेगा ...प्रस्तुत है श्री शरद जोशी जी द्वारा लिखित उनकी पुस्तक "जादू की सरकार" का आलेख " तीस साल का इतिहास " जिसे पढ़कर बस यही लगता है कि राजनीति में कभी कुछ नहीं बदलता,चाहे समय कितना भी बदल जाए..
"तीस साल का इतिहास"

कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए . कुछ कहते हैं , तीन सौ साल बीत गए . गलत है .सिर्फ तीस साल बीते . इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा , कभी कांग्रेस आगे बढ़ी . कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए .फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई. तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है. वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई.

पुरे तीस साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही. पुरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा. पोस्टरों ,किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा. रेडियो ,टीवी डाक्यूमेंट्री , सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी. कांग्रेस हमारी आदत बन गई. कभी न छुटने वाली बुरी आदत. हम सब यहाँ वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे. इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समां गई.
जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है. इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए. अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था. उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था. अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिये भरे गए. और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे. देश में समस्याएँ बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे.समस्याएँ बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी. एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई. दोनों बढ़ने लगे.
पुरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा. जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है.जो बाएँ नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य से बाएँ है वह कांग्रेस है. मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है. कांग्रेस सर्वत्र है. हर कुर्सी पर है. हर कुर्सी के पीछे है. हर कुर्सी के सामने खड़ी है. हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है है. इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही.

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा. जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था. अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से. सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही.पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए. राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए. शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही. हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा. योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी. लागू की तो रोक दिया. रोक दिया तो चालू नहीं की. समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं. कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है. समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया. नारा दिया तो पूरा नहीं किया. प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को. दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई . तीस साल तक खड़ी रही. एक को बढ़ने नहीं दिया.दूसरे को घटने नहीं दिया.आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे. 'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया. जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया. जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए. जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया. वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा.

एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे. जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा. प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए. आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं. जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए. मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे. जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे.शांति की अपील की, भाषण देते रहे. खुद कुछ किया नहीं दुसरे का होने नहीं दिया. संतुलन की इन्तहां यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे. दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए. तीस साल तक पुरे, पुरे तीस साल तक, कांग्रेस एक सरकार नहीं, एक संतुलन का नाम था. संतुलन, तम्बू की तरह तनी रही,गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही बर्फ सी जमी रही पुरे तीस साल तक.
कांग्रेस अमर है. वह मर नहीं सकती. उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएँगे. जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह , ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता. कांग्रेस कायम रहेगी. दाएं, बाएँ, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी. इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है. जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी. जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है. तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएँगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली...
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साभार, व्यंगकार श्री शरद जोशी जी के संकलन "जादू की सरकार" के "तीस साल का इतिहास" से !!!

Friday, July 26, 2013

मज़ाक

भूख से बेबस हुए, लाचार उस मजबूर से
पेट से घुटने सटाकर सो रहे मजदूर से
पूछिए क्यों रो रहे घर के दरों दीवार हैं
क्यों चली जाती हैं खुशियां देखकर ही दूर से
दर्द और तकलीफ की ये आयतें किस्से में हैं
और साहब आप कहते हैं कि हम गुस्से में हैं...

(उस किस्मतवाले के लिए ये लाइनें हैं जो अपनी किस्मत का खा रहा है, अपनी किस्मत का चमका रहा है, हमारी मेहनत पर शहंशाह बनने का सब्ज़बाग सज़ाने वाले उस बेवकूफ आदमी को मालूम नहीं कि गुस्से की पराकाष्ठा क्या हो सकती है...)

Wednesday, July 24, 2013

अजी छोड़िए

अजी छोड़िए
कौन सजाए सपने फिर से
पलके बोझिल कौन करे
कौन लगाए सांस पे पहरे
कौन जले तिल तिल
जागे कौन रात भर फिर से
कौन लगाए दिल
अजी छोड़िए
अब मोहब्बत की बात
आइए जीते हैं यायावर बनकर...

Tuesday, July 23, 2013

राष्ट्रवादी


जन्म हुआ हिंदू के घर में
हिंदू हूं,  हिंदूवादी नहीं हूं।
 
भारत में जन्म हुआ
उसका आकाश, उसकी माटी
उसके पाताल सब मुझमे हैं
भारतीय हूं,  भारतवादी नहीं हूं।
 
गुंजाइश कहां देता है देश
कि हिंदू न रहूं,  भारतीय न रहूं।  
 
जो राष्ट्र है मेरे अंदर-बाहर
दाएं-बाएं, अगल-बगल, नीचे-ऊपर
उसको कैसे अपनाऊं
कोई सिद्धांत बनाकर, कोई वाद समझकर।
कैसे बन जाऊं राष्ट्रवादी, कोई बताए मुझे।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

मकान

 
  लोहा को जमीन के भीतर से निकाला
रेत निकाला नदियों की तलहटी से
पहाड़ों को तोड़ बनाए गिट्टियों के बीज
मिट्टी को कोयले की आंच में पका
बनाया एक नंबर, दो नंबर सूर्ख ईंटे।  
 
 
रेत, सीमेंट, ईंट, कुछ छड़ें, ईंटें  
जमीन में बो आया एक दिन
आस थी कि मकान उग जाएगा किसी रोज
सींचता रहा रोज-रोज आस की खेती
 
पहाड़ बढ़ता रहता है रोजरोज
बालू बहता है नदी के संग-संग
लौह अयस्क बदलता है रूप धरती में
सब जिंदा हैं, जीवंत कायनात में
 
 
फिर भी खेती उगी नहीं कभी
बहुत सींचा, रात-रात भर जाग
जमीन पर नहीं उगी एक झोपड़ी भी
 
 
गिट्टियों ने कहा, पहाड़ के संग बढ़ती थी मैं
बोली रेत, नदीं के प्यार में बहती थी वह
माटी बोली, मुझे तपा बना दिया सूर्ख ईंट
कर दिया उलट-पुलट सब, तोड़ दिए कई घर
 
क्यों किया लोहा को धरती से जुदा
क्यों‌ किया रेत को नदी से अलग
क्यों किया पहाड़ में तोड़फोड़
 
धरती को चीर-फाड़ कर कैसे रहोगे आबाद
कैसा है बेदर्द तुम्हारा घर का यह ख्वाब।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

Monday, July 15, 2013

भूख बड़ी ज़ालिम होती है

1-
भूख बड़ी ज़ालिम होती है
वो...जो कल तक
अच्छा खासा इंसान था
मासिक धर्म में
इस्तेमाल किए गए
कपड़े की तरह
सड़क पर फेंका गया
पेट की अंतड़ियों ने
भीतर भूगोल बना लिया
और
वो अच्छा खासा इंसान
एक दाने के लिए सड़क पर
यूं बैठ गया
जैसे बैठ जाता है
मुर्दा चांद
किसी शोकाकुल छत पर
निरर्थक होकर...


2-

भूख बहुत ज़ालिम होती है
उसमें न कसक होती है
न लचक होती है
मैंने सोचा
देखकर उस पागल इंसान को
जैसे देख रहा हूं
भूख से बिलखते
हिंदुस्तान को....

3

भूख बहुत ज़ालिम होती है
ये जानती है
हमारी सरकार भी
इसलिए
कभी वोट की राजनीति करती है
कभी पेट की
इस बार पेट का पाखंड है
खाना चाहिए तो लगाना होगा
पंजे पर ठप्पा
वरना भूख का दंड है
सड़क पर आओगे
और
कुत्ते की मौत मारे जाओगे....

...........................

Wednesday, June 12, 2013

साबरमती का संत

इस युग के युगपुरुष महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी वास्तव में केवल युगपुरुष ही नहीं बल्कि युग अवतार भी थे, यह बात हाल ही में एक विवादित प्रकाशन से साबित हो गयी, बीती सदी में बापू ही थे जिनके जीवन में सोलहों कलाएं थी, जीवन संघर्ष था, विश्व विजयी विलेन था, लोगों की श्रद्धा थी, अनुगमन था, समकालीन सारी महान विभूतियों का निर्विरोध समर्थन था,  और सबकुछ असामान्य होने के बाद भी दिखने में जन-समान और स्वीकार्य  था। 
जनता लाठी वाले संत को अपने जैसा मानती थी। उनके एक इशारे पर लाखो लोग निर्विकार भाव से अपने प्राणों की आहुति दे देते थे। ऐसे ही हजारों अन्य लक्षण महात्मा के अवतारी होने की पुष्टि करते हैं। 
जहाँ तक मेरी संसारी दृष्टि देख पाती है, उससे तो लगता है कि, बापू श्रीकृष्ण के आधुनिक संस्करण थे, एक कालजयी  फ़िल्मी गीत के अनुसार उन्होंने लीलाएं भी की थीं। भगवान् श्रीकृष्ण के परिवार और शुभचिंतकों  की तरह बापू के परिवार का जीवन भी कष्टप्रद रहा हाँ सुदामा की तरह छुपकर खाने वालों को उन्होने अपना सारा  राजपाट दे दिया। अपुष्ट इतिहास के अनुसार बापू की बा के बाद कई समर्पित  गॊप और गोपियाँ  थी जिन्हें चरखे की मधुर ध्वनी सम्मोहित किये रहती थी, बापू कृष्ण की तरह ही जितेन्द्रिय थे यह बात उनके स्वयं के  ही कई प्रयोगों से प्रमाडित हो चुकी है।
भगवान श्री गाँधी जी के  संपूर्ण जीवन का हर छन मेरी इस बात को बल  देता  है। वासुदेव की ही तरह उनके भी अनेकों नाम भक्तजनों में प्रचलित है। जहाँ उन्होने इस बार गीता के 'संघे शक्ति' को चरित्रार्थ करते हुए अँगरेज़ कंसों से छुटकारा दिलाया वहीँ अफ्रीकी आन्दोलन और बोवर युद्ध में  निर्णायक भूमिका निबाही और भारतीय प्रतिभा को कृष्ण की तरह विश्वपटल पर स्थापित किया। 
कालांतर में भी उनके द्वारा अनुग्रहित किये गए सुदामागण समस्त सुखों को प्राप्त करेंगे ऐसा वर देकर महात्मा गाँधी ने अपने पूर्व अवतार की भांति एक बहेलिये के बहाने अपनी लीला को विराम दे दिया, बोलो भगवान् श्री महात्मा गाँधी की जय. 

Thursday, May 16, 2013

बुनकर की बेटी सबीना




जिंदगी की जंग में हार गई
बुनकर की बेटी सबीना।

पहले अंतडि़यां धंसीं पीठ में
फिर फेफड़ों में सांस
भरने की जगह न रही
डायरिया से मारी गई सबीना।

सुना है डायरिया से ज्यादा
कुत्ती चीज है भूख
सबीना को उसने सताया कई बार।

कहते हैं साहब लोग
बहुत खतरनाक चीज है क्षय रोग
जूझने में नाकामयाब रही सबीना।

लाल राशन कार्ड, आवास
वृद्धा पेंशन, पारिवारिक हित लाभ
कुछ को दी गई नोटिस
इस तरह निभाई चालीसवें की रस्म
जब दुनिया में नहीं रही सबीना।

Friday, May 3, 2013

एक नया ब्लॉग,

एक नया ब्लॉग,
 http://bitiarani.blogspot.in/ 

Wednesday, May 1, 2013

देश का दुर्भाग्य


देश का दुर्भाग्य


देश का दुर्भाग्य है कि, एक तरफ इस बच्ची को उस खतरे से बचाए जाने कि गुहार लगानी पड़ रही हैं जिसकी इसे कल्पना तक नहीं है...तो दूसरी तरफ आयातित सनी लियोने बता रही है कि, बलात्कार का कारण पोर्न फ़िल्में नहीं बल्कि गन्दी मानसिकता के लोग इसके जिम्मेदार हैं, कोई उनसे पूछे कि, ये गन्दी मानसिकता आई कहाँ से?? वहीँ देश कि राजधानी में एक फिल्मकार सार्वजनिक मंच से फिल्मो में स्मोकिंग दृश्य के दौरान चेतावनी दिखने के नियम का विरोध करने के कुतर्क देने और कमीने जैसे शब्द को गाली नहीं साबित करने पर तुले हुए थे, एक युवा के विरोध करने पर अपने संस्कार के अनुसार उन्होने उसको डपटते हुए कहा ""Abey tu Dilli se hai? Dilli mein toh baap bhi apne bete ko yehi kehta hai, 'Abey kameenay, idhar aa'. मै ये नहीं कहता कि, समाज कि इस गिरावट के लिए ये ही जिम्मेदार हैं,  पर ये सच है कि इस तरह के लोग बहाने बना कर अपने गुनाहों पर पर्दा नहीं डाल सकते.
तस्वीर लखनऊ विधानसभा के सामने ३० अप्रैल, शाम की है /

दिल्ली  के इंटरव्यू  का लिंक भी दे रहा हु, रूचि बने तो ज़रूर पढ़ें. 
अभिमन्यु कुमार शर्मा 

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-04-29/news-interviews/38902889_1_vishal-bhardwaj-ramesh-sippy-indian-cinema

Thursday, April 25, 2013


कुछ यूं हुए तक्सीम हम

बड़े भाई ने भरा फार्म
छोटे भाई ने भी भरा फार्म
पिता रह गए अकेले
उन्होंने लिखा माता का नाम
जमा कर आए फार्म
कुछ यूं भरा गया राशन कार्ड
कुछ यू हो गए तक्सीम हम
पहले रसोई गैस के चक्कर में
फिर बांट दिए गए हम
कोटे पर मिलने वाले
गेहूं, चावल, चीनी
केसोसिन तेल के फेर में।
प्रकृति की देन के तिजारत में
तक्सीम होते गए रिश्ते
बंटते गए बाप-बेटे, पति-पत्नी, मां-पिता
बिना जाने समझे होते गए तक्सीम सब।


बिल्लियां, बच्चियां, मोमबत्तियां

दुनिया बनी तब बिल्ली बनी थी
दुनिया बनी तब सड़क नहीं थी
दुनिया बनी तो आदमी बने
पहिया बना, गाडि़यां बनीं, सड़कें बनी
आदमी ने लिखना-पढ़ना सीखा
संविधान रचा गया, जिसमें लिखा
बिल्लियां नहीं काट सकतीं रास्ता
अनपढ़, अनजान, अभागी बिल्लियां
रास्ता काट मारी जाती हैं ट्रकों से कुचल

दिल्ली से दौलताबाद तक कुचलती
अबोध बच्चियों ने भी नहीं पढ़ा संविधान
जिसे बदलने के वास्ते पिघल रही मोमबत्तियां। 

Wednesday, April 24, 2013

शुक्रिया ..


मित्रों ...
बीती  इक्कीस तारीख को हिंदी ब्लोगिंग के सफ़र के दस साल पूरे हो गए ....२ १ अप्रैल २ ० ० ३ को आलोक ने "नौ दो ग्यारह " नाम से पहला हिंदी ब्लॉग शुरू किया था ....२ ० दिसंबर २ ० ० ७ को शुरू हुए आपके ब्लॉग चाय बैठकी ने भी लंबा सफ़र तय कर लिया है ...चाय बैठकी के उन तमाम बैठकबाजों का मैं तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने इस लम्बे सफ़र को रास्ते की तमाम दुश्वारियों के बावजूद जारी रखा या यूँ कहें की चाय ठंडी नहीं होने दी ...
बहुत जल्द चाय बैठकी नए कलेवर और नए तेवर के साथ आपसे रूबरू होगी ... सभी बैठक बाजों से गुजारिश है की कोई भी  पोस्ट पढने के बाद अपने विचार जरूर साझा करें ....एक बार फिर आप सब को शुक्रिया ...|

Monday, April 22, 2013

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.



   हमेशा की तरह आज का अखबार भी अपनी पिछली सुर्ख़ियों से आगे निकलने की होड़ करता मिला, जैसे ध्रितराष्ट्र को हर बीते कल से ज्यादा भयावह खबरें देने को शापित संजय. देश के हर कोने से आती सोच और कल्पना से परे अपराधों के ख़बरें.
बहुत बेबस महसूस करता हूँ अपने-आप को, क्यूंकि जहाँ से मैं देख रहा हूँ, वहां से यह स्थिति सुधरने वाली नहीं दिखती, पिछले साल भर में नौकरी के दौरान मैंने यह निष्कर्ष निकाला है (यहाँ मुझे वर्त्तमान और आने वाली पीढ़ी को देखने और समझने का मौका मिला ).
नेता, नौकरशाह, पुलिस, माफिया, गुंन्डे, मवाली, मुहल्लेवाला, नुक्कड़ वाला, पडोसी, हम-तुम, ये -वो वगैरह-वगैरह ये सब सिर्फ उदहारण मात्र है, हमने पूरे तालाब में ही भंग घोल दी है,
ये सब इंसान ही हैं और समाज के किसी न किसी संभ्रांत परिवार से संबध रखते हैं, आज के दौर में सामाजिक ताने-बाने को बुनने वाली ये परिवार नाम वाली इकाई ही भ्रस्ट हो चुकी हैं, इसकी शुरुआत पिछली पीढ़ी ने कई दशक पहले की थी जिसका परिणाम आज के पतित नागरिकों के रूप में सामने आ रहा है.
हमने अपने बच्चों को स्वस्थ और अच्छे संस्कार देने के बजाय किसी भी तरह धनी बनने का लक्ष्य दिया, पोर्नोग्राफी और अश्लील सामग्री से लबालब, फिल्मों, पत्रिकाओं और इन्टरनेट जैसा सूचना संसार दिया, और इससे पोषित और पल्लवित हुआ आज अब अपना प्रभाव दिखाने लगा है, अभी तो महज़ शुरुआत है, वर्त्तमान परिस्थितियों में भविष्य की कल्पना बहुत डरावनी है, भ्रस्ट परिवारों से भ्रस्ट संस्कारों और लक्ष्यों के साथ आने वाली ये फसल बढती ही जा रही है.
एक परिजन का यह कथन काबिले गौर हैं - मेरा बेटा डाकू बने या आईएस नम्बर एक का बने.....
मतलब साफ़ है- बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.

Friday, January 25, 2013

इश्वर सबको सदबुद्धि दे...

मै पलकें नीची किये बगल से गुजर जाऊंगा जब तुम किसी पार्क में --------------.रही होगी, क्योंकि मेरे बाप का क्या जाता है?, मै देख कर भी अनदेखा करूँगा क्योंकि, मुझसे क्या मतलब होगा?...तुम कुछ भी करो, मै अपने काम से काम रखूँगा, जब किसी दीवार के पीछे या झाडियों की ओट से या किसी तनहा कमरे से तुम्हारी आहट मिलेगी क्योंकि, तुम्हें अपना भला-बुरा अच्छी तरह पता है!!..पर याद रखना मै उस वक्त भी चुप रहूँगा जब तुम किसी के एक फोन पर उससे मिलने जाओगी इंडिया गेट, या किसी पब या बार के बाहर जब तुम्हारे कपडे तार-तार हो रहे होंगे या जब किसी चलती बस में तुम्हारा बालात्कार हो रहा होगा ....मुझे डर होगा कही तुम फिर मुझे अपना रास्ता देखने की नसीहत न पकड़ा दो ..... मुझे हमेशा दुख रहेगा उन माँ-बाप के लिए जो तुमपर भरोसा करते है...इश्वर सबको सदबुद्धि दे.....Abhimanyu.

Tuesday, January 8, 2013


सर्दी का सितम बदस्तूर जारी है...पूस की रात...कहर बनकर बरप रही है...सर्द हवाओं की एक चादर फैल गई है..जिसने जीवन की रफ्तार पर लगाम लगा दी है....गंगा की लहरों पर लिख गई हैं ठिठुरन की दास्तां....और इस दास्तां को पढ़ने और समझने के लिए घाटों से नदारद हो गए हैं...गंगापुत्र....तापमान का स्तर नेतांओं के बयान की तरह दिन ब दिन नीचे होता जा रहा है....दस जनवरी तक वाराणसी के जिलाधिकारी महोदय ने स्कूलों के बंद करने के आदेश दे दिए हैं...लेकिन मौसम विभाग की मानें तो फिलहाल प्रचंड ठंड जारी रहेगी...कहते हैं...हवा का तेज़ खंजर सबसे ज्यादा बुढ़ापे में काटता है...लेकिन हवाएं जब बर्फ की बयार बनकर बहें...तो क्या महिलाएं...क्या पुरुष... क्या नौजवान...क्या बच्चे...क्या बूढ़े...सब त्राहिमाम करते नजर आ रहें हैं....जिस गली पर... जिस चौराहे पर आग की शक्ल भी नजर आती है...चार हाथ उसे सेंक लेना चाहते हैं.....कहते हैं सर्दी से लोग पर गए....माफ कीजिएगा साहब...लेकिन सर्दी जानलेवा नहीं होती...वरना सर्द प्रदेशों में रहने वाले लोग मर गए होते...जानलेवा होती है शासन प्रशासन की बदइंतजामी...यहा भी नगर निगम और जिला प्रशासन द्वारा भीषण ठण्ड से बचने के लिए न कोई व्यवस्था की गई न रैन बसेरा का समुचित इंतजाम...
सूबे की सरकार ने हिदायत दी है कि...शेल्टर होम दिन रात खोले जाएं...कंबल बांटे जाएं.... हर चौराहे और बस अड्डों पर दिन रात अलाव जले...लेकिन हिदायत का क्या है...अक्सर दी जाती है....
ये तेज सर्द हवा ये ठिठुरन भरा मौसम
खुदा कसम ये जनवरी अब जानलेवा है

Wednesday, January 2, 2013

इतिहास


इतिहास की किताब होती हैं स्त्रियां
उन्हें भूगोल मान कर पढ़ने की कोशिश
गलती को न्योता देना है
दिल वालों, दिल्ली वालों।
भूगोल के मर्मज्ञ भी
छोड़ नहीं पाते लोभ
भूगोल का इतिहास जानने का
स्त्रियों के अतीत में झांकने का
मुनियों ने गुना, शास्त्रों में कहा
होता है पाप का कारण लोभ
बेहतर है छोड़ दिया जाए
इतिहास में झांकने का लोभ
अभी वक्त नहीं आया
स्त्रियों के तारीख के खुलने का
कोई सह कहां पाएगा आज
उसकी दहन, उसका ताप
दिल वालों, दिल्ली वालों।

जनतंत्र का तकाजा


तकाजा तो था कि
तुम कहते, हम सुनते
जब हम बोलते
तब तुम चुपचाप सुनते
जब मैं बोलता हूं
तब तुम सुनते नहीं
अपनी ही कहेगे तो
कहां पहुंचेंगे सब
कुछ कहेंगे आप
हम तकाजों का करते रहेंगे तकादा
तो कहां जाएगा देश
क्या जनतंत्र कहलाता रहेगा यूं हीं नाखादा
या कहने, सुनने की नातेदारी से
बनेगी बात कोई अब।

Wednesday, November 14, 2012

A post Of Rickshaw Wala_____The other side of the fence: Why I became a Rickshaw-walla

The other side of the fence: Why I became a Rickshaw-walla: I have realised that, The perspective generally doesn’t change from what you see, hear or read. It changes dramatically - sometimes in ...