Sunday, August 30, 2009

महगाई के दोहे

महगाई ने ऐसा मारा की मिडिल वर्ग मार जाए
हे बनवारी मुरलीधारी मनमोहन लेव बचाय .

गोभी,भिंडी दाल तो अब सपनो मे दिखते हैं
आलू और टमाटर कभी कभी ही मिलते हैं.

शक्कर ने तो मध्यवर्ग का छोड़ दिया है साथ
इतने ऊँचे दम हुए की नही पहुँचता हाथ .

अभी तलाक़ मंदी ने मारा अब मार रही महगाई है
ये कैसा मौसम आया है ये कैसी शामत आई है .

मंदी ने नौकरी चीन ली अब महगाई लेगी जान
कुछ जतन करो हे दीनदयाला संसद के भगवान.

Monday, August 24, 2009





ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो ...
ऑफिस में खुश रहो, घर में खुश रहो ...

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आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो ...
आज जिम जाने का समय नहीं , दो कदम चल के ही खुश रहो ...

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आज दोस्तों का साथ नहीं, टीवी देख के ही खुश रहो ...
घर जा नहीं सकते तो फ़ोन कर के ही खुश रहो ...

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आज कोई नाराज़ है, उसके इस अंदाज़ में भी खुश रहो ...
जिसे देख नहीं सकते उसकी आवाज़ में ही खुश रहो ...

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जिसे पा नहीं सकते उसकी याद में ही खुश रहो
Laptop न मिला तो क्या , Desktop में ही खुश रहो ...

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बिता हुआ कल जा चूका है , उसकी मीठी यादों में ही खुश रहो ...
आने वाले पल का पता नहीं ... सपनो में ही खुश रहो ...

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हँसते हँसते ये पल बिताएँगे, आज में ही खुश रहो
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो
अनदेखी अनजानी सी
मधुर कल्पनाओं की सरिता में
तब बहते जाना
कितना अच्छा लगता था
कोलाहल से दूर कहीं
सूनी सड़कों पर उस धुंधली सी संध्या में
वो साथ तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
उन कम्पित अधरों को
मै जब छूने की कोशिश करता था
तब प्रतिवाद तुम्हारा
कितना अच्छा लगता था
किन्तु अब?........
यथार्थ के तिमिर कूप में
उन मधुर छनो की
केवल अनुजूंग ही शेष है
हाँ, बस स्मृति शेष है
१९९० से पहले लिखी रचनाओं में से एक...............
मौत नहीं है हल सपनो का,
माना टूटा बल अपनों का.
फिर भी हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलायें कैसे?

सपनो के टूटे पंखों से,
अपनों के विरह मनको से.
नीड़ भला सजायें कैसे,
सोते न जग जाएँ कैसे?

फिर भी उसकी किसी छवि को,
उसके नयनो के अमित रवि को,
खुद में हम झुठलायें कैसे?
कैसे ना जी जाएँ ऐसे?

नीड़ का अपने तिनका टूटा,
सबसे प्रियतम साथी छूटा.
राह पलट पर जाएँ कैसे,
उसके सपने झुठलायें कैसे?
आखिर हम मर जाएँ कैसे,
खुद की लाश जलाएं कैसे?