Tuesday, January 5, 2010

पुरकैफ जी नहीं रहे

साथियों बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि अब पुरकैफ जी हमारे बीच नहीं रहे ! हालांकि राजेश त्रिपाठी 'पुरकैफ' के राजेश त्रिपाठी अभी मौजूद हैं और स्टार न्यूज़ मुंबई में मजे कि नौकरी कर रहे हैं लेकिन पुरकैफ जी कि बात ही कुछ और थी ! पुरकैफ यानी कि खिलंदड़ मिज़ाज का वोह शख्स जो एक नंबर का शातिर गेमबाज है , लाखैरों (लाला, लोमड़ी, देबू , विक्की) का लाखैरा है , खटिकाना टोला की शायरी गाने वाला शायर है, सड़क छाप लौंडों का सरगना है , अजीबों-गरीब कपड़े पहेनने का मास्टर है, नयी-नयी पत्र-पत्रिकाओं को चीथड़ा कर ख़ुशी महसूस करने वाला कोलाज़र है !
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु