Saturday, December 27, 2014

कल संगम पे दो देवियाँ मिलीं

कल संगम पे दो देवियाँ मिलीं . मैं जैसे ही उनकी फोटो उतारने लगा दोनों ने अपना चेहरा घुमा लिया . मैंने पूंछा कि चेहरा क्यूँ घुमाया तो कहने लगीं कि दस-दस रूपया दोगे तो फोटो खिचायेंगे . मुझे उनसे बात करने का मन था, तो मैंने पैसा देने से मना कर दिया और आगे बढ़ने का नाटक किया. दोनों भाग कर पास आयीं और कहने लगीं पाँच-पाँच रूपये दे देना . फिर बिना मेरी बात सुने दोनों वहीं पड़े बालू के ढेर पर चढ़ गयीं और आशीर्वाद देने की मुद्रा में आ गयीं. मैं मुस्कुराता रहा और उनकी कई तस्वीरें लीं . फिर मैं जानबूझकर जाने लगा तो दोनों लपककर मेरे पैरों में लिपट गयीं और अपने पाँच-पाँच रूपये मांगने लगीं . मैंने पूंछा कुछ खाओगी, दोनों ने एक-दूसरे को मुस्कुराकर देखा और कहा फुल्की खायेंगे . मैंने देखा तो थोड़ी दूर एकदम संगम नोज पर एक फुल्की (गोलगप्पे) वाला दिखा . दोनों ने वहाँ चलने का इशारा किया और मेरे चढने से पहले ही मेरी बाईक की पिछली शीट पे कब्ज़ा जमा लिया. मैं फिर मुस्कुराता रह गया . फुलकी वाले ने पूंछा कितने का खिला दें भईया, मैंने कहा इनको जितना खाना हो खिला दो . दोनों ने पाँच-पाँच रूपये की फुल्की खायी और एक ने शरमाते हुए पूंछा और खा लें, मैंने सिर हिला कर इशारा किया तो दोनों ने मन-भर फुल्की खाई. फिर मैंने पूंछा कुछ और खाओगी, तो एक ने उंगली से पास खड़े लाई-चने वाले की ओर इशारा किया. दोनों के साथ मैं लाई-चने वाले के ठेले पर पहुंचा, तो दोनों ने मेरे बोलने से पहले ही लाई-चने वाले को सब समझा दिया . मेरी तरफ देख कर लाई-चने वाला मुस्कुराया, मैं तो पहले से ही मुस्कुरा रहा था. दोनों को खिला-पिलाकर मैं चलने लगा तो छोटकी बोली मेरे पाँच रूपये तो दे दो. मैं फिर मुस्कुराता रह गया और मेरे हाँथ जेब में अपने आप पहुँच गए. उनको दस रूपये देने के बाद अपने दोनों हाँथ जोड़कर..झुककर मैंने कहा – “ देवियों प्रणाम..अब चलूँ ”..... दोनों मासूमियत के साथ शरमाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगीं . मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और वापस लौटने लगा....बहुत दूर तक उनकी हंसी गूंजती रही. संगम पे तो अक्सर ही जाता हूँ, लेकिन इन देवियों के साथ बीती कल शाम शानदार रही .

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