दिन पूरा बीत गया,
जीवन की आपाधापी में,
हमने रिश्तों की शाखों को,
झाझोरा भी,
कुछ बातें थीं,
सूखे पत्ते बनकर टूट गयी,
कुछ यादें थीं,
आंसूं बनकर टपक गयी,
हमने साड़ी रात,
उन पत्तो की आग को तापा भी,
कुछ बूंदे थीं,
खारे पानी की,
जो उस आग में जलकर धुंआ हुई,
अभी कुछ पत्ते बचे हैं,
शाखों पर,
इस उम्मीद से की,
अभी कुछ हरियाली की तासीर बची है उन पर....
2 comments:
सुंदर !
उम्मीद ही तो इंसान को जिन्दा रखता है....
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