Tuesday, September 23, 2008

क्या येही ज़िन्दगी है.......

शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है? जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है? पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है? सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है? अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं? 108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं? इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं. मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है, लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं? कब डूबते हुए सुरज को देखा त, याद है? कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है? तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या है....

3 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत ही बढिया जज्बात पेश किए हैं।बहुत सही कहा है-

सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम
पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?

बहुत बढिया!

Swarup said...

bhool gaye ki barish men tahlna kya hai....laajwab..mohnish tumne bahut si bhooli chizen yaad dila dee..Wordsworth ki kavita thi .."The world is too much with us"unhon ne kaha tha ki bhoutikta hum par bahut haavi ho gayi hai ..such in duniyavi jhanjhton ke paar choti -choti khushiyon ki duniyaa kitni sunder hai...bas jaroorat hai udhar najaren ghumane ki..

sunil kaithwas said...

mohnish garmahat bhar di yaar chay baithkee me............bludi good yaar