Tuesday, September 10, 2013

महापुरुष नहीं बनाते इतिहास

हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया,
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।

यह शेर साहिर लुधियानवी का है। यहां नया खुदा शब्द गौरतलब है। सच तो है कि पुराने खुदाओं से किसी नए दौर में काम नहीं चलता। इतिहास अपने कालखंड का महापुरुष या नायक खुद तैयार करता है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि कोई महापुरुष आया हो और उसने इतिहास को बदला हो। भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना से उसके समापन तक लगातार आमजन उनसे लड़ते रहे। इनमें से कुछ तारीख के सफे पर दर्ज हो गईं और कुछ को इतिहास की कार्यवाही से बाहर ही रखा गया। इतिहास और इतिहासकारों के इस दृष्टि दोष तारीख के बाहर खड़े लोगों के नजरिए पर कुछ भी फर्क पड़ा हो लेकिन समस्या से जूझने वालों की प्रतिक्रिया नहीं बदली।
उत्तर प्रदेश के सुदूर पूर्व के जिले गाजीपुर की मुहम्मदाबाद तहसील पर 18 अगस्त 1942 को तिरंगा लहराने के प्रयास में आठ लोग शहीद हुए। सभी शहीद एक गांव शेरपुर के रहने वाले थे। शहीदों में शेरपुर के ही डा. शिवपूजन राय भी शामिल थे। वह इस आंदोलन के नेता थे। उनका जन्म एक मार्च 1913 में हुआ था। उनके घर के लोग यह तारीख 1910 मानते हैं। यहीं तिथि शहीद स्मारक मुहम्मदाबाद के शिलालेख पर दर्ज है। एक मार्च 1913 की तारीख शेरपुर गांव के पश्चिमी प्राथमिक पाठशाला के रिकार्ड में दर्ज है। उसमें यह भी दर्ज है कि उनको साल में दो कक्षाओं में प्रोन्नति दी गई थी। उनके भाई विश्वनाथ राय, जो सन 1942 में जेल गए थे, उन्होंने बताया था कि उनकी अपनी पैदाइश 1917 की है। इस लिहाज से विद्यालय के रिकार्ड में दर्ज तिथि कुछ ज्यादा गलत नहीं लगती है। इस तिथि का सटीक पता जन्मकुंडली से हो सकता था लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं है। दरअसल मुहम्मदाबाद के आंदोलन के बाद गाजीपुर और बलिया जिले आजाद हो गए थे। वहां दोबारा अपनी सत्ता कायम करने के लिए सभ्य अंग्रेजों ने जो बर्बरता दिखाई, उससे जन्मकुंडली तक अछूती नहीं रही। उन्होंने शेरपुर गांव में 80 घरों को जलाकर राख कर डाला और 400 घरों में लूटपाट की। कैसा आतंक रहा होगा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव राधिकारानी उनसे बचने के लिए गड्ढे में कूदना पड़ा और उनकी जान चली गई। यह तो सच का वह हिस्सा जो कहीं दर्ज हो गया है। पर यह बात कहां दर्ज है कि आततायी अंग्रेजों से बचने के लिए गांव के हजारों लोग पलायन कर गए थे। आंदोलन के नायक डा. शिवपूजन राय का घर जब अंग्रेज जला रहे तो उनका परिवार शेरपुर से गहमर की ओर पैदल ही भाग रहा था, जिसमें तीन बच्चे, कुछ महिलाएं थीं। तब जबरदस्त बारिश हो रही थी, जिसमें भींगने के कारण आंखें उलट गई थीं। तब उन्हें भोजपुर जिले के सेमरी गांव में शरण मिली थी। यह परिवार घर की जमापूंजी (चांदी के रुपये और गहने) जमीन में गाड़कर जौ छींट गया था ताकि लौटने पर जौ के सहारे जमीन खोदी जाए और जिंदगी को पटरी पर लाया जा सके। जब जान आफत में हो तो जन्मकुंडली की किसको परवाह थी। घर जला तो उसमें अनाज भी जला और जन्मकुंडलियां भी राख हो गईं।
इतिहास की दृष्टि से इन बातों को ज्यादा मायने लगता है लेकिन तत्कालीन पीड़ा की झलक इनमें जरूर है। इतिहासकार की दृष्टि दूर तलक देखती है, कई बार उनको नजदीक की चीजें दिखाई नहीं देतीं। इसीलिए प्राचीन भारतीय इतिहास पर जितना काम हुआ, उसका चौथाई काम भी 1942 के भारत छोड़ो के जन आंदोलन पर नहीं हुआ। शायद इसलिए भी कि इतिहासकारों ने इसे ज्यादा पुराना नहीें समझा और उसमें ज्यादा कुछ पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझीं। इतिहास की नई धारा सब आर्ल्टन स्टडीज में इतिहास की जड़ों की तलाश करने की कोशिश की गई। यह काम भी बाढ़ से उफनाई नदी के बीच की लहरें गिनने के प्रयास की तरह ही साबित हुआ। टुकड़ों में चीजों को खोजने की यह कोशिश भी किसी बड़े नतीजे पर ले जाती प्रतीत नहीं होती। सबने यह बात तो कहा कि जनता के आंदोलन की बदौलत 19 अगस्त 1942 को बलिया आजाद हो गया। किसी ने यह सवाल कहां पूछा कि इससे एक दिन पहले 18 अगस्त को गाजीपुर के मुहम्मदाबाद तहसील झंडा लहराते समय जो शहादत हुई, उसका क्या प्रभाव हुआ?
करो या मरो आंदोलन के बाद नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन बंद हो गया था। वर्ष 1945 में जब अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ तो उसमें बलिया और गाजीपुर में अंग्रेजों के उत्पीड़न की दास्तान प्रकाशित की। गाजीपुर की नादिरशाही शीर्षक से लिखा-
पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के अन्य जिलों की तरह गाजीपुर को भी 1942 और उसके बाद क्रूर दमन का शिकार बनना पड़ा। शेरपुर गांव, जहां शेर दिल लोग रहते हैं। इन लोगों ने कांग्रेस राज की स्थापना कर दी। उनका संगठन बेहतरीन था और उन्होेंने गांवों में कुछ दिनों तक शांतिपूर्ण तरीके से प्रशासनिक व्यवस्था संभाली। मगर कुछ ही दिनों बाद हार्डी और उसकी सेना ने मार्च करना शुरू कर दिया और इस प्रशासनिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर डाला। अखबर के मुताबिक 24 अगस्त को गाजीपुर का जिला मजिस्ट्रेट मुनरो 400 बलूची सैनिकों के साथ शेरपुर गांव पहुंचा। निहत्थे ग्रामीण हथियारबंद सेना का सामना नहीं कर पाए। सेना ने गांव में लूटमार शुरू कर दी। महिलाओं के गहने तक छीने गए। लोग घर-बार और संपत्ति फेंक कर भागे। इसमें गांव को दो लाख रुपये से अधिक की क्षति हुई।
अखबार ने आगे लिखा है कि मुनरो का कत्लेआम मुहम्मदाबाद तहसील की गोलीबारी के बाद ही पर्याप्त नहीं हुआ था उसने छह दिन बाद गांव में लूट और हत्या का नंगा नाच किया। अंग्रेजों के भय से राधिकारानी गड्ढे में कूद गई और मारी गई। (गौरतलब है कि उस समय गांव में बाढ़ आई हुई थी।) गांव में 80 घर जलाएग और 400 घरों को लूटा गया। अखबार में सिर्फ छह बहादुर लोगों की शहादत का जिक्र है। हालांकि यहां डा. शिवपूजन राय, ऋषेश्वर राय, वंश नारायण राय पुत्र ललिता राय, वंश नारायण राय पुत्र जोगेंद्र राय, नारायण राय, राज नारायण राय, राम बदन उपाध्याय, वशिष्ठ नारायण राय आदि आठ लोग शहीद हुए थे। सीताराम राय, श्याम नारायण राय, हृदय नारायण राय पाठक जी अंग्रेजों की गोली से घायल हुए और गिरफ्तारी भी झेली। मुनरों और उसके सैनिकों की लूटपाट में जान बचाने के चक्कर में राधिकारानी नहीं बल्कि रमाशंकर लाल और खेदन यादव भी मारे गए थे। समाचारों को तत्कालीन इतिहास माना जाता है लेकिन यहां उसमें भी चूक दिख रही है। यहां दो वंश नारायण हैं, जिसके चलते पत्रकार को चूक का मौका मिला। हालांकि अखबारे में लिखे नामों में भी कई तरह की चूक है।
खबरों को त्वरित इतिहास माना जाता है लेकिन यहां भी कम चूक नहीं होती। चूक के पीछे कई बार वह मध्यवर्गी दृष्टि है जो आम आदमी की वास्तविक गाथा तक आसानी से जाने नहीं देती। तमाम तर्कों और प्रमाणों की दुहाई देते हुए भी इतिहासकार कई बार ऐसी चूक करते हैं। लंदन में रहने वाले एक इतिहासकार, जिनके लेखन पर तमाम इतिहासकारों को भरोसा था, उन्होंने गांवों में अंग्रेजी राज के दौरान रुपये में मजदूरी के भुगतान और अनाज की कीमत का चार्ट प्रस्तुत किया है। कई बार इस तरह के आभाषी चिंतन हमें तंग करते हैं। जनसंघर्ष और मामूली आदमी की गैरमामूली दास्तान को समझने के लिए ऐसे दृष्टिदोष से उबरना उचित जान पड़ता है। खतरा सूचनाओं की कमी ही नहीं बल्कि उनके अतिरेक से भी होता है। किसी शायर ने ठीक कहा है कि -सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं। मुहम्मदाबाद शहीद स्मारक समिति के दस्तावेज में कृपाशंकर राय, रामाधार राय, जमुना राय, जगदीश शास्त्री, रामनरेश यादव, रामबदन को घायल बताया गया है। उनके साथ 25 लोगों की गिरफ्तारी बाद में हुई थी। शहीद स्मारक समिति के दस्तावेज में शहीदों की शैक्षणिक योग्यता बढ़ाचढ़ा कर दिखाई गई है। शहीद स्मारक समिति ने तो एक झंडे को भी सहेज कर रखा है, जिसे अगस्त क्रांति में तहसील पर फहराया गया तिरंगा बताया जाता है। इतिहास में इस तरह के अतीतमोही कथातत्वों से परहेज भी जरूरी है। गौर करने वाली बात है कि जहां शहीदों की जन्मकुंडलियां सुरक्षित नहीं बची थीं, वहां ध्वज कैसे बचा रह गया था।
मुहम्मदाबाद तहसील की घटना न तो सहसा हुई और न ही उसे इतिहास के कालखंड काटकर किसी अनूठी घटना के रूप में रेखांकित करने की जरूरत है। मुंबई में 9 अगस्त 1942 को करो या मरो आंदोलन के ऐलान के बाद उसकी अलग-अलग जगहों पर जुदा-जुदा तरीके से प्रतिक्रियाएं हुईं। हर जगह की प्रतिक्रिया में वहां के स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया और वे अपनी संस्कृति और समस्याओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया करने के तौर-तरीके छोड़ कर नहीं आए थे, लिहाजा उन्होंने अपने तरीके से चीजों को समझा उसे अभिव्यक्त किया। उनका लक्ष्य अंग्रेजों को खदेड़ना था। इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे। लगातार जारी आंदोलनों से देश तैयार हो चुका था और नौजवानों की एक टीम इस आंदोलन को अंजाम देने में सक्षम हो गई थी। यह टीम वैचारिक तौर पर सक्षम भी हो चुकी थी।
गरुआ मकसूदपुर के रहने वाले बेणी माधव राय को पर्चा बंटते समय पुलिस ने पकड़ा था। उन्होंने 1930 में शिवपूजन राय को अपना नेता बताया था। राव साहब के नाम से वह पत्रवाहक का काम करते थे। गाजीपुर से बलिया के बीच गुप्त पत्र पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी थी। वर्ष 1935-36 में वह महानंद मिश्रा के संपर्क में आए थे। गुप्त पर्चे लगातार छपते और बंटते थे। वाराणसी उनका केंद्र था। डा. शिवपूजन राय 1932 में गाजीपुर जिला कांग्रेस के महामंत्री थे। गाजीपुर के मिशन स्कूल से उनको एक आंदोलन की अगुआई करने पर उनको, धर्मराज सिंह, नारायण दत्त और इंद्रदेव सिंंह को निष्कासित किया गया था। उनको आगे की पढ़ाई के लिए वाराणसी आना पड़ा। यहां जयनारायण कालेज और हिंदू स्कूल में पढ़ाई के दौरान शचिंद्रनाथ सान्याल से उनका संपर्क हुआ। गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी हुआ तो कोलकाता चले गए और होम्योपैथिक चिकित्सा हासिल की। हालांकि वह विज्ञान में स्नातक के छात्र थे लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। कोलकाता से लौटने के बाद उन्होंने गांव में रहकर लोगों को दवाएं देनी शुरू की और अंग्रेजों के प्रति गोलबंद करना शुरू किया। वह अनुशीलन समिति और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से भी जुड़े रहे। चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों से उनका गहरा रिश्ता था।
आठ अगस्त को मुंबई में भारत छोड़ो ऐलान होने के बाद गाजीपुर जिले में आंदोलन की आग भड़क गई। नंदगंज, सादात, बनारस, सैदपुर हर जगह अंग्रेजों का विरोध शुरू हो गया। अगस्त क्रांति की आग अचानक शेरपुर या मुहम्मदाबाद से नहीं भड़की। यमुना गिरी के नेतृत्व में गौसपुर हवाई अड्डे पर पहले ही तोड़फोड़ हो चुकी थी। बीज गोदाम, पोस्टाआफिस, रेलवे स्टेशनों आदि में लूटपाट की घटनाएं गाजीपुर जिले में हफ्ते भर चलती रहीं। मुहम्मदाबाद में जो हुआ उसकी परिणति था। 18 अगस्त 1942 को बाढ़ आई थी। शेरपुर गांव चारों तरफ से पानी से घिरा था। इसके बावजूद गांव के लोग एकत्रित होने लगे। मंगलवार का दिन था, लिहाजा बजरंग बली का दर्शन-पूजन के बाद लोग नावों पर सवार होकर सड़क पर पहुंचे। वहां निर्णायक हमले की रणनीति बनाई गई। तय किया गया कि मजबूत नौजवान तहसील में पीछे से दाखिल होंगे और नेता आगे से आएंगे। सूचना मिली थी कि तहसील में 35 सशस्त्र जवान तैनात हैं। तय किया गया कि 70 पहलवान किस्म के युवक पीछे से जाकर उन पर काबू पा लेंगे। इस तरह गांधी जी की अहिंसा की लाज रह जाएगी और झंडा भी फहरा दिया जाएगा। मगर तहसील परिसर में दाखिल होते ही नौजवानों की टोली ने जय बजरंग बली का नारा लगाकर सिपाहियों पर झपट्टा मारा ही था कि गोलियां चलने लगीं। एक के बाद एक तीन लोग वहीं मार दिए गए। श्यामू दादा ने बंदूक की नाल में उंगली डाल दी और उनकी उंगली उड़ गई। उसके बाद दो बंदूकें छीन ली गईं। मुख्य गेट की ओर से डा. शिवपूजन राय के नेतृत्व में आए लोगों पर भी गोलियां चलने लगीं। घायलों और मृतकों को वाहनों पर लाद कर अंग्रेज साथ लेते गए। मारे गए लोगों को उन्होंने कठवापुल के पास नदी में प्रवाहित कर दिया। डा. शिवपूजन राय का शव प्राप्त नहीं हुआ।
गाजीपुर और बलिया के क्रांतिकारियों के बीच लगातार संपर्क बना था। लिहाजा इस घटना के अगले दिन बाद ही आंदोलन की चिनगारी बैरिया, बलिया में फैल गई। इसके नेता महानंद मिश्र थे। उनका सीधा रिश्ता गाजीपुर के आंदोलनकारियों से था। इस संपर्क को निरंतर बनाए रखने का काम वेणीमाधव राय करते है, जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। बलिया आजाद हो गया। आजादी के बाद बलिया का गुणगान खूब हुआ लेकिन गाजीपुर को भुला दिया गया। हालांकि 1945 में सूबे में अंतरिम सरकार बनने के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू और फीरोज गांधी बलिया गए और शेरदिल जवानों का गांव देखने शेरपुर भी आए। शेरपुर के नौजवानों की शहादत भले ही भारत में अख्यात रही हो लेकिन लंदन में जब भारत के भविष्य पर चर्चा चल रही थी तब गाजीपुर के कलक्टर के उस डिस्पैच को उद्धृत किया गया, जिसमें उसने कहा था कि पढ़े-लिखे नौजवान सीने पर गोली मारने का आग्रह कर रहे हैं। अब हिंदुस्तान को गुलाम नहीं रखा जा सकता।
बात डा. शिवपूजन राय की जन्मतिथि से शुरू हुई थी। उसका हमारे पास कोई रिकार्ड नहीं है, सिवाय शेरपुर के बेसिक प्राइमरी पाठशाला के रिकार्ड के। वहां दी गई जन्मतिथि हेडमास्टर की कल्पना का हिस्सा है। भारतीय इतिहास की परंपरा लेखन की कम और श्रुति की ज्यादा रही है। यह बात सुनने को मिली थी। जब डाक्टर शिवपूजन राय होम्योपैथी की पढ़ाई करके गांव आए तो उन्होंने लोगों को मुफ्त दवाएं देनी शुरू की। उनके पिता वीरनायक राय कंजूस माने जाते थे। पिता से छुपा कर वह लोगों को दवाएं देते थे। उनकी क्लीनिक भी गांव के ही किसी अन्य व्यक्ति के दरवाजे पर थी। एक दिन उनके पिता ने पूछा कि दवा देने के बाद वह मरीजों के कुछ पैसा लेते हैं या नहीं। झिझकते हुए उन्होंने कहा कि ले लेता हूं। उनके पिता ने कहा कि साल में सौ रुपया हमसे दवा का ले लेना, किसी उसके पैसे मत लेना। जब लोग ठीक होकर मुस्कुराते हैं तो अच्छा लगता है। यह एक पहलू है लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि गांव में क्रांतिकारी गतिविधियों का विरोध करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी। इन्हीं दो ध्रुवों के बीच दो हजार से ज्यादा लोग एक ही गांव से तहसील पर झंडा फहराने के लिए चल पड़े थे क्योंकि जब तूफान आता है तो तिनकों का पता नहीं चलता। चंद्रशेखर आजाद की मौत के बाद क्रांतिकारी आंदोलन में बिखराव आ गया था लेकिन 1942 में जो कुछ हुआ उसकी अगुवाई भी सर्वथा नई ताकतों ने की थी क्योंकि कांग्रेस के स्थापित नेता तो जेल जा चुके थे।
मुहम्मदाबाद का आंदोलन किसी अन्य क्षेत्रों में अंग्रेजी राज के प्रति भड़के जनाक्रोश की प्रतिकृति ही दिखाई देता है लेकिन यह कुछ मायनों में अलग भी है। पूरे देश में ऐसा कोई आंदोलन नहीं हुआ होगा, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए हों। शेरपुर से शुरू जुलूस में मुहम्मदाबाद तक पहुंचते-पहुंचते आसपास के कई गांवों के लोग शामिल हो गए थे। इसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, जिन्हें तहसील से पहले ही लौटना पड़ा था। यह निरबंसी आंदोलन भी नहीं था। मुहम्मदाबाद में हुई शहादत के नतीजे निकले। इसकी वजह से देश का यह हिस्सा 18 अगस्त 1942 को आजाद हो गया। इसके बाद बलिया आजाद हुआ। लोगों ने 26 अगस्त तक यानी आठ दिनों अपना प्रशासन कायम किया। वह एकदम शांतिपूर्ण था। गांव में दो बंदूकें आ गई थीं लेकिन दमन के दौरान भी किसी ने उन्हें चलाया नहीं क्योंकि नेता का ऐसा आदेश नहीं था। इस आंदोलन ने अंग्रेजों और कांग्रेस के नेताओं को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया।

अजय राय

1 comment:

घनश्याम मौर्य said...

स्‍वतंत्रता संग्राम की ऐसी न जाने कितनी गा‍थाएं इतिहास की परतों में छिपी हुई हैं। जरूरत है उन परतों को उभाड़ने की, फिर ऐसे न जाने कितने देशभक्‍त वीरों और शहीदों से हमारा परिचय होगा।