Friday, December 30, 2011

और लोकपाल लटक गया

लोकपाल संसद में लटक गया। सड़क से लेकर संसद तक लडाई। लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक बहस, या यूं कहें पछ से लेकर विपक्च तक ने बिल गिराने के लिए काम किया। लोकसभा में सरकार बहुमत में नहीं, भाजपा समर्थन में फिर भी बिल से किनारा। कम सी कम छोटे दलों ने सीना चौड़ा कर स्वयं को चोर तो बताया। और अब सरकार के नैतिक पतन की बात कर रहे हैं॥ राजनीति में राजनेताओ और लोकतंत्र में लोक का दुराभाव हुआ॥ जिसका खामियाजा आने वाले समाये में सिर्फ आम लोगों को भुगतना पडेगा। चुनाव नज़दीक है फैसला, लोगों के हाथ में है। अब चुके तो अपने साथ बच्चों का बी भविष्य खो देंगे॥ सोचने और उठाने का समय वर्ना एक बार फिर मुर्दों की तरह कब्र में लेटे होंगे और कोई कुत्ता मूत कर जा रहा होगा.....

Monday, December 26, 2011

तुम्हारी यादें...

भूली बिसरी चंद उम्मीदें, अफ़साने भी याद आये
याद आये तुम और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये

Saturday, December 17, 2011

ग्लोबल जमाने में लोकल की चिंता बढ़ी

प्रयाग धरती की जांघ है।मेले में मूल की खोज की प्यास लेकर आने वालों की कमी नहीं है। इस बात की गवाही बिक्री का चलन दे रहा है, जो दूसरे शहरों से थोड़ा अलग है। धर्मवीर भारती की रचना यह बात पुराण कहते हैं। राजकीय बालिका इंटर कालेज में लगे किताबों का मेले में इस बात की गवाही देने वाली एक किताब आई थी। हिंदुस्तानी एकेडमी से प्रकाशित प्रयाग प्रदीप नामक यह किताब हाथोहाथ बिक गई। यह बानगी भर है। उस ललक की जो ग्लोबल गांव के दौर में अपनी आबोहवा चीन्हना चाहती है। अपनी जड़ की तलाश में लगी है। गुनाहो का देवतासदाबहार रचना है। कंपनी बाग में प्रेम और मैकफरसन लेक पर आध्यात्म की अनुभूति कराने वाले इस उपन्यास की की 32 प्रतियां दो दिनों में बिक गईं। देश और काल की जिज्ञासा का अंत यहीं नहीं है। बुनकरों के दर्द के तानेबाने पर रचा अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया की पृष्ठभूमि बनारस है लेकिन उसके तलबगार यहां भी आ रहे हैं। डा. काशीनाथ सिंह की कुख्तात किताब हरिवंश राय बच्चन की बेस्टसेलमधुशालाकी मांग हमेशा रहती है लेकिन बच्चन की आत्मकथा के दशद्वार से सोपानतक सभी सेट किसी मेले में नहीं बिकते। मुंशी प्रेमचंद हर मेले के सिरमौर होते हैं लेकिन अबकी श्रीलाल शुक्ल केराग दरबारी की धूम है। राजकमल प्रकाशन केप्रशासनिक अधिकारी मुकेश कुमार के मुताबिक दो-तीन महीनों में इसकी हजार से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। मेले में रात्रिकालीन राग दरबारीसुबह से ही बजने लग रहा है। शुक्ल जी की विश्रामपुर का संतइसके साथ ही निकल रही है। निराला का राग-विराग और अमरकांत की किताबें भी बिक रही हैं।काशी का अस्सीऔर रुद्र काशिकेय की बनारसी मस्ती की बहती गंगा’ (जिसे कहानी, उपन्यास जैसे किसी भी खांचे में रखना मुश्किल है) में भी लोग डुबकी लगाने को बेताब हैं। बेचन शर्मा उग्र की तरह अपनी खबरलेना चाहते हैं। गंगोजमुनी संगम की नगरी में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का हिंदी-उर्दू कोष और धर्मशास्त्र का इतिहास के तलबगार भी खूब हैं। वर्तमान पीड़ी की रुचि को पकड़ने वाले चेतन भगत नई किताब रिवोलूशन-2020- लव, करप्शन, एंबीशनमें लोकल हुए हैं। महानगरों से निकलकर खांटी बनारसी माटी में किरदार गढ़े हैं। उन्होंने आज के सबसे चर्चित शब्द करप्शन का इस्तेमाल किया है। पर ऐसा भी नहीं कि सब लोकल ही है। ग्लोबल गांव के किताबों से बतियाने वालों का फोकस लोकल पर है लेकिन उन्होेंने ग्लोबल को छोड़ दिया है, ऐसा भी नहीं। नोबल विजेता मारिया वर्गास लोसा की किस्सागोके तलबगार भी हैं। वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंस की ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइमका गूढ़ ज्ञान किशोर और युवाओं को लुभा रहा है। यूनाइटेड कालेज आफ इंजीनियरिंग की श्रद्धा कामरिकर ने बताया कि डेन ब्राउन उनको पसंद हैं लेकिन वह मिल्स एंड बून की किताबें खरीदेंगी। ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम भी लेना चाहती हैं लेकिन सिर्फ 10 फीसदी छूट मिल रही है। लिहाजा वह इसे यूनिवर्सिटी रोड से खरीदेंगी, जहां मेले से ज्यादा छूट मिलती है। बातचीत के दौरान ही इस किताब को आठवीं के छात्रपार्थ भाटिया ने देखते ही खरीद लिया। 

नोट- िपछले िदनों प्रयाग के जीजीआईसी मैदान में पुस्तक मेला लगा था। यह उसी की रपट है।संयोग से यह कहीं छपी नहीं है। आपके अवलोकन के िलए प्रस्तुत है। 








Sunday, December 11, 2011

पसीने से परिंदे तर-बतर हैं।
फिज़ाएं तल्ख़ से भी तल्ख़-तर हैं॥

ज़माना हो गया सूनामी आए।
मगर कुछ लोग अब तक दर-बदर हैं॥

हवा मत दे तू इस चिंगारी को प्यारे।
तुझे मालूम नहीं पास में तेरा भी घर है॥

तुम्हारा घर जले या लोग जलें।
भला किसको यहां किसकी ख़बर है॥

बड़े कमजोर दरवाजे हैं घर के।
किसी दिन छोड़ दे न साथ ये मुझको भी डर है॥

है उसके हाथ में मीठी कटारी।
मैं जिसको सोचता हूं हमसफर है॥

अजित "अप्पू"

Friday, December 9, 2011

समंदर में अदाकारी न होती।
तो लहरे इस कदर प्यारी न होती॥

जराइम से मेरा घर बच न पाता।
अगर घर में निगहदारी न होती॥

मैं तेरी बात बिलकुल मान लेता।
अगर ये बात सरकारी न होती॥

हमारे गांव के ठाकुर भी नौकरी करते।
अगर उनकी जमींदारी न होती॥

तरक्की कर गयीं होतीं ये बस्ती बांद्रा की।
अगर बस्ती में रंगदारी न होती।

ये मूमकिन था कि लंका बच भी जाती।
विभीषण की जो गद्दारी न होती॥

जराइम-अपराध
निगहदारी-चौकसी

अजित "अप्पू"

Tuesday, November 22, 2011

रेशम का कीट

बुद्ध की मौत हुई
शव अड्डकाशी में लपेटा गया
महीन सूती कपड़ा अड्डकाशी
धूप ताप सीलन से
बचाने वाला महीने कपड़ा
जिसे बुनते थे बुनकर काशी के

बापू ने वस्त्र चुना
तो चुना कपास का बुना
रेशम तो नहीं चुना
जिसे बुनती थी गुलाम
भारत की जनता

स्वामी जी रेशमी वस्त्र पहन
दे रहे हैं अहिंसा पर भाषण‌
उनको सुन हंस रहा है रेशम
सिल्क का कीट दूर
किसी शहतूत के पेड़ पर
किसी अर्जुन की पत्तियां कुरते हुए

रेशम का कीड़ा
पत्तियां खाकर बना
रहा है चमकीला धागा
जिससे  झांकता है ऐश्वर्य
अमीरी और औकात


अपने ही धागे से बनी खोल में
फंसता जाता है रेशम का कीट
एक दिन गिरफ्तार हो जाता है
इससे पहले के वह काकून काटे
उसे उबलना पड़ता है कड़ाह में
खौलते जल के कड़ाह में
ठीक उस कैलेंडर के दृश्य की मानिंद
जिसमें विभिन्न पापों की
यातना का सचित्र वर्णन होता है
जिसमें कम तौलने सजा को
देखते हुए दुकानदार केड़ी मारता है

वह रेशम की चमक ही है
जिसने कीड़े को मारा
वह रेशम की चमक ही है
जिससे चौंधियाकर
काशी के बुनकरों ने
छोड़ दिया कपास को
उस कपास को
जिसके बिना नहींबता पाते
अस्सी के गोस्वामी तुलसीदास
संत के स्वभाव को

अड्डकाशी, मलमल बुनना
करघे पर कपास कसना छोड़ा
अपनाया रेशम के धागे को
उलझते गए अपने तनाबाना में
यमराज की यातना का वही दृश्य
उपस्थित हो गया
दंडपाणि की काशी में
जिसमें हर मरने वाले को
मिलती है सहज मुक्ति

और जिंदा रहने वालों को...
काशी क्या तुम्हारे पास
उनके लिए कुछ है तुम्हारे पास
पंचक्रोशी, अंतरगृही यात्राओं के सिवाय

अजय राय







Saturday, November 19, 2011

जायफल

सर्द हो रहा सब कुछ
हवा, पानी, दरख्त और देह
सब कुछ बर्फ
में ढल जाने को बेकरार
पान लगाते समय
मेडिकल चौराहे के पानवाले की
उंगलियां ठिठुर जाती हैं
सारा शरीर ढंक लीजिए
कान कनटोप में बांध लीजिए
पर पानी पर किसी का क्या असर
दस्ताने कामकाजी उंगलियों की
हिफाजत के लिए नहीं बने
पान और पानी की रिश्तेदारी में
उसकी उंगलियां गल रही हैं
उंगलियों का गलना एहसास है
कि कैसी ठंडक लग रही होगी
दूसरों को
वर्ना रातभर सड़क पर
अलाव के किनारे
काटने वाले कितनी मन्नत से
बुलाते हैं सुबह सूरज को
इसकी खबर लिहाफ में दुबके लोगों को
कहां हो पाती है
कहां पता चलता है कि
हर रात की सुबह
कितनी मन्नतों और
सांसतों के बाद आती है
बहरहाल,
पान वाले की उंगलियों में
सर्दी का थर्मामीटर है
जिसमें चढ़ता-उतरता
रहता है एहसास का पारा
उसने आज सर्दी महसूस की है
ग्राहकों में गर्मी का एहसास
बनाए रखने की उसकी
तरकीब का नाम है जायफल
वह थोड़ा सा जायफल
कसैली के साथ कुतरकर देता है
रत्ती भर जायफल
दिला देता है गर्मी का एहसास
जायफल
जिसने सिसायत की गरमाहट देखी
जायफल जिसके माथे पर हजारों
के कत्ल का कलंक है
जिसके ऊपर जावित्री की
मुलायम पर्त होती है
उसके भीतर गुठली बन
छुपा रहता है जायफल
जिसके फेर में अंग्रेजों ने
वर्षों रखा द्विप को गुलाम
धरती कहीं की बांझ नहीं थी
उस दिन भी और न है आज
पर जो जायफल का बीज ले जाए
उसका मरना तय था
व्यापार के इस एकाधिकार
में कई साल तक तपने के बाद
जायफल ने सीखा जेहन में गर्मी लाना
जायफल तुममें इतनी ताब थी तो
‌फिर क्यों रहे वर्षों गुलाम
बोलो जायफल, बोलो जायफल।

अजय राय

Friday, November 18, 2011

अंखुआ

बुरा वक़्त है
सेहत पर भरी वक़्त
हवा ख़राब है
पानी भी है जानलेवा
सुबह की जिस ताजी हवा का
जिक्र सुनते हैं किस्सों में
गीतों, ग़ज़लों में
वो बयार अब कहाँ उतरती है
शाखों से,
रात भर ओस के दुलार में ठिठके
स्नेह में भीगे दरख्तों के
पंख झटकारने, पत्ते हिलाने
अलसाई शाखों को
झटकारने, झुमाने से
कहाँ पैदा होती है
बाद--नौबहार
सच में बहुत बुरा वक़्त गया है
सेहत के लिए
पेड़ अब वनुकुलित संयंत्र की
हवाएं पीकर हैं जिन्दा
ओस में रहकर भी
भींग कहाँ पाते हैं उसके स्नेह में
इस कठिन वक़्त में
जीने के लिए
लक्जरी कार से जाना पड़ता है दफ्तर
जिम में जाकर गलानी पड़ती है चर्बी
लगनी पड़ती है सुबह मीलों दौड़
करना पड़ता है योग और आसन
गेहूं, अदरक, अलोवेरा, तुलसी
गिलोय, मकोय का
पीना पड़ता है जूस
तब जाकर दिन भर आती-जाती
साँस आराम से,
बहुत जतन करना पड़ता है
सेहत के लिए
संयम बरतना पड़ता है खानपान में
रोज सुबह चबाकर
खाना पड़ता है अंखुआ
मूंग का, चने का
वनस्पतियों के फल से
कहाँ चल पा रहा अब काम
निठारी की शव परीक्षा में
अंखुए ही मिले थे क्षतविक्षत
सुना है ऐसा ही मैंने
सुना है
सुना है कसर लोगों को कहते
बहुत बुरा वक़्त गया है
आपने भी जरूर सुनी होगी
यह बात
-अजय राय

Tuesday, November 8, 2011

अखबारनवीस

सोलह पेज का अखबार
जिसकी आवाज पर खुलती है नींद
जिसका गहरा नाता है दैनिक क्रिया से
सोलह पेज का अखबार
जिसमें जैविक आनंद समाया है
चपोतने पर जो लगता है चौंसठ पेज का
सोलह पेज अखबार जो
दुनिया भर की खबर सुनाता है सुबह
चाय की चुस्की के साथ।
जिसकी पंक्तियों में तमाम
आशाएं, उम्मीदें दफ्न हैं।
जिसके हर्फों में हाजमें की गोली है
जिसकी सुर्खियों से सत्ता
का शेयर उठता गिरता है
जिसमें छपी आपकी तस्वीर
पूरे दिन वजूद का एहसास कर देती है
और गहरा, और गाढ़ा
और गर्वान्वित, और ताकतवर
सोलह पेज का वही अखबार
मेरी उनंदी आंखों में चुभता है
सुबह उसकी खड़ की आवाज
मुझे भर देती है एक भाव से
जिसमें असुरक्षा है, गर्व है,
स्पर्धा है, तर्क है
और भी जाने क्या-क्या है
वही सोलह पन्ने का अखबार
जिसमें खोजता हूं मैं अपना सोलहवा सांल
पचास पार की उम्र में भी
मगर
वही सोलह पन्ने का अखबार
बत्तीस, चौसठ, अस्सी
की गिनतियां पार करते समय
रक्तचाप, मधुमेह बनता है
दिल, गुर्दा, जिगर चाटता चलता है
सोलह पन्ने का अखबार
सब कुछ कहता है
बहुत कुछ बताता है
फिर भी चुप रहता है
उस दरख्त के हाल पर
जिसके लुगदी बनने पर
कागज बना
जिसके जलने से स्याही बनी
और जिसके खप जाने से
वह हर्फ बना जो
तय करता है सच का दायरा
झूठ की पर्देदारी।

Thursday, November 3, 2011

पर उसे मेरा ढेर सारा प्यार... अनन्त...

ज़िन्दगी में कुछ टूट सा गया है,
रिश्तें है जो बरसों से साथ रहे,
लेकिन अचानक पराये हो गए,
पता नहीं कैसे, बहुत समझाया,
अपने, अपनों और प्यार का भी वास्ता दिया,
लेकिन बात नहीं बनी, वोह जो सबकुछ था,
आज छोड़ गया, सोचा भी नहीं
मर तो सकता नहीं, पैर जियूँगा कैसे.....?
छुपा भी नहीं सकता, जता भी नहीं सकता
अजीब सा दर्द दे गया
जाते- जाते वोह मुझे
अच्छी निशानी दे गया...


पर उसे मेरा ढेर सारा प्यार...अनंत

Friday, October 28, 2011

रेट

रेत रीतती है तो
कराती है
समय की पहचान
मुट्ठी से रेत के
रीतने पर कभी सोचा अपने
क़ि कितना वक़्त फिसल गया
यूँही मुट्ठी में रेत, मिटटी
सहेजने में।
उँगलियों के पोरों के फासले से
कितनी रेत फिसल गई
घंटा, मिनट, सेकेण्ड बन।
काश क़ि
सहेजना छोड़
तानना सीख़ जाते इसे
सीख जाते हवा में लहराना
टूटते तब भी
पर एह्स्सास नहीं होता
क़ि रीत गयी उम्र रेत की मानिंद
रेतघड़ी बन
सो क्या जाने पीर पराई
यह पोस्ट दरअसल एक सफाई है। कवि रामाज्ञ शशिधर ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुए काव्य विमर्श की रपट अपने ब्लॉग अस्सीचौराहा पर `कविता से पहले कवियों को दीमक हवाले करें ` शीर्षक से लिखी थी। साहित्य जगत में इसकी खूब हलचल मची थी। उसका जवाब मैंने इस तरह दिया। अच्छा लगा अच्छी बात वर्ना आत्मरति कवियों को ठेस भी लगी, ऐसा बताते हैं।

Friday, October 14, 2011

सावधान !

सावधान !
सावधान हो जाओ भ्रष्टाचार के दुश्मनों
तुम्हारे खिलाफ बुन लिया गया है
मुसीबतों का जाल
बिछा दी गई है चौरस की बिसात
वो आएंगे
मुसलमान बन के
और हमला करेंगे तुम्हारे हौसलों पर
वो फिर आएंगे
इस बार हिंदू का लबादा ओढ़कर
चैंबर में घुसकर पीटेंगे तुम्हें
लेकिन तुम डरना मत
सिर्फ कोशिश करना पहचानने की
ये न हिंदू हैं न मुसलमान हैं
इंसानी शक्ल में ये हैवान हैं शैतान हैं बेइमान हैं....

Thursday, September 29, 2011

सो क्या जाने पीर परी

अगर दीमक की जगह बाल्मीकि लिख दें तो कोई आपत्ति ? संस्कृत में दीमक का पर्याय बाल्मीकि है. आदि कवि का यही नाम है। उनका असली नाम रत्नाकर था। रत्नाकर डाकू था। अपने प्रियजन के लिए राहजनी करता था। ऋषि जा रहे थे। लूटने आया। उन्होंने पूछा इस पाप का भागी कौन होगा? रत्नाकर संशय में पड़ गया। उपनिषदों में कहा गया है- संशयेंन विजानाति, संशयात्मा विनश्यति। आधुनिक पश्चिमी दर्शन भी संदेह की बात करता है। देकार्त का चिंतन इसी पर आधारित है। बाल्मीकि ने संदेह की जाँच की। पाया कोई पाप का सहभागी नहीं होगा। ऋषियों को पेड़ में बांध कर गया था। उनको मुक्त किया। उनसे मारा - मारा मंत्र मिला , जिसका प्रतिफल राम था। पर इतने से संतोष नहीं किया। तपस्या की कसौटी पर कसा। घोर तप किया। दीमक खाते रहे। परवाह नहीं की। बदन दीमकों ने छाप लिया, हिला नहीं। केवल आंखे दिखा रही थीं। तब रत्नाकर बाल्मीकि हुए। क्रोंच पछी का शिकार देख उसका दिल रोया। वियोगी का यह गान अदि कविता है। वियोगी होगा पहला कवि ........जैसे जुमले देने वाले परिजनों से दिल टूटने, घोर तप के कष्ट को क्या जाने। रत्नाकर से बाल्मीकि बनाने का जोखिम और पीड़ा को क्या जानें। जिसने पीड़ा सही नहीं वह पछी का वियोग क्या जाने? बाल्मीकि ने राम को ऋषियों से सीखा नहीं, साधना से जाना तब लिखा। केवल रामायण (राम का वनवास भर) लिखा। जंगल में ऋषि कष्ट में थे। राम ने खुद दुःख सहा, जो साथ थे उन्होंने दुःख सहा। पर तप का माहौल बनाया। विभीषण को सच कहने पर रावण ने लात मारकर घर से निकल दिया। वह राम के पास गया पर द्रोही कहलाया। कोई अपने बेटे का नाम विभीषण नहीं रखता। सुनते हैं जीवन संघर्ष गद्य में होता है। आज के घोर कठिन समय में गद्य की जगह पद्य लिखा जा रहा है? गद्य को बाल्मीकि ने काव्य बनाया। याद रखने के लिए शायद। यह सब बिना दीमक के हवाले हुए सीख़ पते। कालिदास में अपनी ड़ाल काटने की कुव्वत थी। हे कवि तुम जड़ काट कौन सी कविता लिख रहे हो। सोचो जाके पांव ना फटी विवाई....

आज जन्मदिन है मेरा...

ज़िन्दगी के सफ़र के दो पड़ाव तो पहले ही पूरे हो गए थे। आज आधी ज़िन्दगी से महज एक कदम दूर रह गया हूँ। अब वह बचपन की अटखेलियाँ, खेल सब कहीं खो से गए हैं। स्कूल के दिनों की मस्तियाँ, दोस्तों की बातें सब सिर्फ याद करने तक ही सीमित रह गए हैं। या यूँ कहें की अब शायद उन्हें याद करने में भी यादों के लिए समाये निकालना पड़ता है। खैर शायद ज़िन्दगी ऐसे ही चलती है। लोग आतें हैं, रिश्तें बनते हैं और एक दिन सिर्फ हम होते हैं.... सबके बीच रहते हुए भी अकेले और तनहा... फिर भी सबके बीच खुशियाँ ढून्ढ ही लेते हैं...

Sunday, August 14, 2011

हमको भी अरमान है दिल में....

हमको भी अरमान है दिल में
छायें हम दुनिया भर में
नयी ख़ुशी से,नए रंग में
नाम करे हम अपना जग में
हमको भी अरमान है दिल में....
जाने ये दुनिया हमको
अरमान है ये दिल के
छायें हम दुनिया भर में...
एक दिन वो आएगा
लोगों के होठो पैर नाम हमारा भी गुनगुनाएगा
हम भी इस जग के आसमान पर
सितारों की तरह चमकेंगे
अरमान हैं दिल के, छायें हम दुनिया भर में
दौड़ेगी दुनिया अपने पीछे, हमको ये अहसास है
जानेगी दुनिया हमको एक दिन, ये विश्वास है
बनेगें ऐसे दीपक हम, जो न बुझेंगे आँधियों में
अरमान है ये दिल के, छायें हम दुनियां भर में.....

Friday, August 12, 2011

इंतज़ार

एक एहसास सा था, उसके आने का
सुबह उसको देखा था, प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए
लगा की वोह चड़ी होगी
ट्रेन में बैठा, बार- बार खिड़की से झांकता
की शायद वोह आ जाये,
पर अचानक एक झटका सा लगा
सिग्नल हो गया था, ट्रेन पटरी पर तैरने लगी
होती शाम के साथ
उसके आने की उम्मीद, भी डूब चुकी थी
ट्रेन की बदती रफ़्तार के साथ
मन में भी कई विचार भाग रहे थे
की पता नहीं, वोह चड़ी भी होगी या नहीं
पर अचानक, एक शोर के साथ ध्यान टूटा
ट्रेन रुकी हुई थी, और लोग कह रहे थे
इलाहाबाद आ गया
वोह कहीं नहीं थी.......

........

इस ज़िन्दगी की दौड़ में दौड़कर करना क्या है,
जब येही जीना है, तो घुट- घुट कर मरना क्या है.......

Tuesday, July 12, 2011

पांडे जी.....

पांडे जी पत्रकार बनने वाले हैं
शादी की उम्र भी हो चुकी है
पांडे जी को शादी के लिये चाहिए
एक सुंदर, सुशील कमाऊं लड़की
पांडे जी सिंद्धात के पक्के हैं
वो दहेज नही मांगेगे
लेकिन लड़की वालों से सर्त होगी
की शादी में उनके बाप का
एक रूपया न खर्च हो।
हां जिस लड़की से शादी हो
उसका चरित्र एक दम ठीक होना चाहिए
साथ में वो पैसा भी कमाये
टीचर लड़की
सबसे ऊंचे पायदान पर होगी
पांडे जी के साथ हमारी शुभकामनाएं।।

Saturday, June 25, 2011

गाँधी जी मुस्कुरा रहे हैं....

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
ग्राम प्रधान, बीडीओ, तहसीलदार से लेकर
डीएम, सचिव और मंत्री जी
सभी रिश्वत खा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और दलाल बन बैठे वकील, जज साहिबान
अदालतों मे हत्यारों-अपराधियों को बेझिझक छुड़ा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और आईजी, डीआईजी से लेकर
एसपी, एसएसपी और थानेदार तक
चोर-उचक्कों, डाकुओं को निर्दोष,
तो मासूम भोले-भाले लोगों को शातिर अपराधी बता
एनकाउंटर का खेल चला रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और बड.ी-बड.ी अटटालिकाओं में बैठे
सेठ-साहूकार पब्लिक को चूतिया बना रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और धरती के भगवान बन बैठे डाक्टर साहब
सरकारी अस्पताल छोड., नर्सिंग होम में
सौ का हजार दस हजार बना रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और तीस परसेंट ओवरडोज के चक्कर में इंजीनियर साहब
रददी माल को एकदम परफेक्ट बता
कान्ट्रेक्ट पर कान्ट्रैक्ट पास किए जा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और उनकोे मुस्कुराता देख, हम भी जम के मुस्कुरा रहे हैं
धोती कुर्ता स्वदेशी कौन कहे
विदेशी ब्रांड, सुपर-ब्रांड के चक्कर में, सब पगलाए जा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
नेता जी घोटालों की रिटेल चेन चला रहे हैं
और देश निकाला देकर गांधी जी को ही स्विस बैंक भेजवा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
धर्म जाति के नाम पर बंटे देश में
स्वार्थवश गुलाब के फूल के साथ मिठाई के डिब्बे
तो निःस्वार्थ भाव से चाकू तलवार गोली के गिफ्ट
खुद-ब-खुद पहुंचाए जा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और लगातार मुस्कुरा रहे हैं
मैने सोचा क्या वाकई मुस्कुरा रहे हैं
नोट को अलट-पलट कर देखा तो मुस्कुराते दिखे
ध्यान से झांक कर देखा तो भी मुस्कुराते दिखे

मैने सोचा राजघाट जाकर सीधे बापू से पूंछा जाए
आखिर क्यों मुस्कुरा रहे हैं,
जबकि देश और देशवासी सीधे गर्त की तरफ जा रहे हैं

राजघाट पहुंचा
देखा कि बापू की समाधि के चारों तरफ पानी ही पानी जमा है
सोचा बरसात का पानी होगा
पूंछा तो पता चला पानी गिरा ही नहीं, और नल वगैरह भी ठीक है
फिर ये पानी आया कैसे

ध्यान से देखा तो चौंक गया
बापू रो रहे थे
समाधि पर लिखे ’हे राम’ के नीचे से आंसू टपक रहे थे

मैने बापू से पूंछा
यहां आप रो रहे हैं
लेकिन बाकी जगह तो मुस्कुरा रहे हैं
क्यों

बापू ने कहा - बेटा क्या करूं
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है
न चाहते हुए भी पहले राष्ट्रपिता बना दिया
फिर हर जगह हंसते हुए दिखा दिया
मैं तो 47 से ही रो रहा हूं
जब
देश बंटा, देश के लोग बंटे
आचार विचार व्यवहार बंटे
आजाद देश में
जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन में
जनता पर ही अत्याचार बढे.
फिरंगियों ने नहीं
अपनों ने ही ’अपनों के लिए’ अपनों का खून लिया चूस
फिर सब कुछ ठीक दिखे, इसलिए मुझे हर जगह दिया ठूंस

मुझे जहां जितना हंसाया
मैं वाकई में वहां उतना ज्यादा रोया

आज मैं तेरा शुक्रगुजार हूं ’नाथू’
तूने मुझे पल-पल मरने से बचाया
बस मैं उस दिन को कोसता हूं
जब मैनें कहा था कि -
’मेरी आत्मा इस देश के कण-कण में बसती है’
कहते-कहते
¬’हे राम’ के नीचे से आंसुओं का सैलाब सा बहने लगा

मैं बैठा रहा, सोचता रहा

शायद
अब महात्मा की आत्मा
देश के कण-कण में नहीं
केवल राजघाट पर ही बसती है

Wednesday, May 18, 2011

यात्रा

जीवन और पथ में, बहुत समानता है,
दोनों एक दूसरे के समानांतर, सम्कक्च,
निरंतर गति से चलने वाले, अनन्त काल तक,
जिस तरह पथ में, कई मोड़, वैसे ही जीवन में,
दोनों का अपना स्थान, मृत्यु और मंजिल,
इसलिए किसी के लिए, नित्य प्रति कुछ करना,
सार्थक है... जीवन और पथ, दोनों के लिए,
तो, लगातार बड़ते चलो, सफ़र पर,
यात्रा...........अनन्त यात्रा......

Monday, May 16, 2011

हम में से ना खुदा, ना देवता है कोई,
छूकर मत देखो, हर रंग बिखर जाता है,
मिलने- जुलने का सलीका ज़रूरी है वरना,
इंसान चंद मुलाकातों में भर जाता है..

Sunday, May 15, 2011

तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं,


आकाश भी नीला था, बहारें भी आयीं थी,


सूरज भी निकला था, चाँद भी है,


पर एक तन्हाई है, और तो कुछ बदला नहीं,


तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं.....


पलकें भी झपकती हैं, आंसू भी टपकते हैं,


होटों पर मुस्कराहट भी है, झूठी ही सही,


तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं...


घटाएं भी हैं, फिजायें भी हैं, बहती हुई हवाएं भी हैं,


नदियों का कलरव है, पक्षियों का शोर भी है,


अगर नहीं तो तुम नहीं, तुम नहीं, तुम नहीं


और तो कुछ बदला नहीं, तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं....

Thursday, May 12, 2011


एक दिन आएगा, जब तुम मेरे प्यार को समझोगी,


जब तुम मेरी भावनाओं से होकर गुजरोगी,


जब तुम्हे किसी मोड़ पर मेरी ज़रुरत होगी,


जब तुम पलकें बंद कर मुझे महसूस करोगी,


लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकेगी,


और wo एक दिन बीत चुका होगा, kyonki


jo kal kaa sunhera bhawishya tha,


wo aaj ka itihaas hogaa.