बहुत सहेज कर रखी हैं
तुम्हारी यादें
अब भी वैसी ही हैं
जैसे तुमने दिया था
लेकिन इसमें अंकित शब्द
अतीत के हाथों, कुछ तुम्हारे हाथों,
स्वयं मेरे ही हाथों
मारे जा चुके हैं
इन मृत शब्दों की
अंत्येष्टि में आमंत्रित हो तुम
क्योंकि तुम्हारी श्रद्धांजलि ही
उन्हें मोक्ष दिला सकती है
उन्हें स्वर्गिक बना सकती है
अविनाश गौतम...
Saturday, January 29, 2011
Friday, January 21, 2011
विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन
विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन
धरती पे भूंचाल आया था उस दिन
मुझे देख सूरज को गश आ गया था
मेरे रूप पर चाँद चकरा गया था
मैं तारीफ़ अपनी करूँ या खुदा की
तकदीर के लेख लिखने थे बाकी
लिखा उसने ये कोई लीडर बनेगा
वकालत करेगा पीडर बनेगा
ये बिगड़ेगा कम, और अक्षर बनेगा
मिलिटरी या नेवी का अफसर बनेगा
बनेगा प्रतिदिन ये घोड़ों का मालिक
हज़ारों का लाखों का करोड़ों का मालिक
ये दुनिया में हल चल मचाता रहेगा
सदा मुफ्त का माल खाता रहेगा
सभी वार है इसके हक में अक्सर
ब्रहस्पति, को बुधवार, शुक्र शनिश्चर
पढ़ा लेख मैंने विधाता का लिखा
शनिश्चर की नी को गलत उसने लिखा
मैं बोला आपने लिखा नी गलत है
शनिश्चर में लिखना बड़ी ई गलत है
वो बोले तू क्यों तर्क कर रहा है
बड़ी छोटी ई में फर्क कर रहा है
अभी तो तू पैदा भी नहीं हुआ है
तुझे क्या पता ये गलत या सही है
करेगा अनजान तू क्या जन्म पाकर
मेरी पोल खोलेगा दुनिया में जाकर
तेरे भाग्य को मैं तो चमका रहा था
शनिश्चर से ले के इतवार तक आ रहा था
जो तू चाहता है, वही कर रहा हूँ
बड़ी ई की गलती सही कर रहा हूँ
इसे ठीक लिखता हूँ मैं तेरे सर पर
शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर
दिया शाप उसने यूं गुस्से में आकर
नहीं चैन पायेगा धरती पे जाकर
जन्म ले के यूं ही विचरता रहेगा
सदा जिंदगी में गलतियाँ ठीक करता रहेगा
फटे हाल होगा, फटीचर रहेगा
उम्र भर तो हिंदी का टीचर रहेगा
--अज्ञात
धरती पे भूंचाल आया था उस दिन
मुझे देख सूरज को गश आ गया था
मेरे रूप पर चाँद चकरा गया था
मैं तारीफ़ अपनी करूँ या खुदा की
तकदीर के लेख लिखने थे बाकी
लिखा उसने ये कोई लीडर बनेगा
वकालत करेगा पीडर बनेगा
ये बिगड़ेगा कम, और अक्षर बनेगा
मिलिटरी या नेवी का अफसर बनेगा
बनेगा प्रतिदिन ये घोड़ों का मालिक
हज़ारों का लाखों का करोड़ों का मालिक
ये दुनिया में हल चल मचाता रहेगा
सदा मुफ्त का माल खाता रहेगा
सभी वार है इसके हक में अक्सर
ब्रहस्पति, को बुधवार, शुक्र शनिश्चर
पढ़ा लेख मैंने विधाता का लिखा
शनिश्चर की नी को गलत उसने लिखा
मैं बोला आपने लिखा नी गलत है
शनिश्चर में लिखना बड़ी ई गलत है
वो बोले तू क्यों तर्क कर रहा है
बड़ी छोटी ई में फर्क कर रहा है
अभी तो तू पैदा भी नहीं हुआ है
तुझे क्या पता ये गलत या सही है
करेगा अनजान तू क्या जन्म पाकर
मेरी पोल खोलेगा दुनिया में जाकर
तेरे भाग्य को मैं तो चमका रहा था
शनिश्चर से ले के इतवार तक आ रहा था
जो तू चाहता है, वही कर रहा हूँ
बड़ी ई की गलती सही कर रहा हूँ
इसे ठीक लिखता हूँ मैं तेरे सर पर
शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर
दिया शाप उसने यूं गुस्से में आकर
नहीं चैन पायेगा धरती पे जाकर
जन्म ले के यूं ही विचरता रहेगा
सदा जिंदगी में गलतियाँ ठीक करता रहेगा
फटे हाल होगा, फटीचर रहेगा
उम्र भर तो हिंदी का टीचर रहेगा
--अज्ञात
Friday, December 31, 2010
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
------------------------------------------------------------- अदम गोंडवी
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
------------------------------------------------------------- अदम गोंडवी
Saturday, November 13, 2010
Monday, November 8, 2010
बदलाव...
कहते हैं लोग शादी के बाद बदल जाते हैं,
मेरे भी कुछ जानने वाले बदल गए,
मैं बहुत तरीके से घर चलाना जानता हूं
तकिया की खोल,चद्दर,और बेड शीट
खुद ही धुल लेता हूं
किचेन का सारा काम जानता हूं
और
खाना भी बहुत अच्छा बना लेता हूं
मेरे दोस्त कहते हैं
मेरी बीवी बहुत खुश रहेगी
अब कौन बताए इन बेवकूफ दोस्तों को
कि
शादी के बाद
लोग बदल जाते हैं...
मेरे भी कुछ जानने वाले बदल गए,
मैं बहुत तरीके से घर चलाना जानता हूं
तकिया की खोल,चद्दर,और बेड शीट
खुद ही धुल लेता हूं
किचेन का सारा काम जानता हूं
और
खाना भी बहुत अच्छा बना लेता हूं
मेरे दोस्त कहते हैं
मेरी बीवी बहुत खुश रहेगी
अब कौन बताए इन बेवकूफ दोस्तों को
कि
शादी के बाद
लोग बदल जाते हैं...
Saturday, November 6, 2010
Wednesday, October 6, 2010
लोकल के लोग....

30 सितम्बर 2010,
आज के दिन आने वाला था अयोध्या के विवादित स्थल का ऐतिहासिक फैसला । सुबह सुबह गांव से पिता जी का और मेरे ससुराल से मेरी सासू मां का फोन आ गया। दोनों लोगों का मुझसे फोन पर पहला यही सवाल था कि आज ऑफिस जाओगें। मैं बिस्तर पर नींद में ही बोला, हां जरूर जाऊंगा। क्यों ? सासू मां ने कहां, यहां इलाहाबाद में बहुत तनाव है। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही है । मुंबई तो और भी खतरा होगा। हो सके तो ऑफिस न जाओं। मैंने नींद में ही उनको सांत्वना देने के लिये बोल दिया ठीक है देखता हूं । इसके बाद मुझे लगा की वाकई में आज हर घर के लोग ऐसे ही डरे होगें। मैं बिस्तर छोड़ चुका था । नीतू ( मेरी वाइफ ) से बोला, खाना आज जल्दी बना दो मुझे जल्दी ऑफिस पहुंचना है । पिता जी से और सासू मां से फोन पर हुई बात मेरी बीवी भी सुन रही थी । उसने भी मेरी तरफ उदास मन से देखा और सवाल किया सचमुच ऑफिस जाओगे। मेरे जुबान से अजानक निकला पागल हो क्या ? तुम भी सब की तरह सवाल करती हो। जानती हो जब सबकी छुट्टियां होती तब हमें ऑफिस जाना जरूरी होता है और ऐसे बवाल के वक्त तो हम लोगों का ऑफिस जाना........। मैं बिस्तर से उठ चुका था। जल्दी जल्दी तैयार होने लगा । सोचा आज ट्रेन में हो सकता है भीड़ कम हो । लोग हो सकता है अयोध्या के मसले के चलते घर से न निकले हो । लेकिन घर से निकला तो बाहर का माहौल रोज की ही तरह था । स्टेशन पहुंचा तो लोकल में लोगों की भीड़ रोज की तरह थी । ट्रेन में चढ़ा तो वहां भी रोज की तरह खड़े ही रहना पड़ा । अचानक ट्रेन के अंदर अयोध्या के फैसले पर यात्रियों में चर्चा होने लगी । ट्रेन में सभी कौम के लोग बैठे थे । साढ़े तीन बजे आयोध्या मामले पर फैसला आने वाला था । कुछ गुजराती बंधु इस मुद्दे पर बात कर रहे थे । एक शख्स बोला ये सब नेताओं की वजह से हो रहा है । आम आदमी को इससे अब क्या मतलब है । सारी आग यही नेता लोग लगाते हैं । कभी किसी नेता को मरते हुए देखा है। हम तो कहते हैं अयोध्या में विवादित स्थान पर एक तरफ मंदिर बना दो एक तरफ मस्जिद। जिसको आना हो वो आकर वहां पूजा करे या नमाज पढ़े। तभी एक शख्स की आवाज आयी, विदेश में भी ऐसा ही कोई मामला था। वहां म्युजियम बना दिया गया। मामला ही खत्म । तभी किसी ने बेसुरे राग में गाना शुरू किया, विषय विकार मिटाओं पाप हरो देवा । मेरी लोकल ट्रेन अंधेरी पहुंच चुकी थी । एक बूढ़ा शख्स चढ़ता है । तमाम गुजराती भाई उन्हें दद्दू कह कर बुलाते हैं । ( तमे आवो दादा जी, बेसो ) कुछ लोग लोकल ट्रेन में दादा जी को बैठने की जगह भी देने की गुजारिश करते हैं । लेकिन दद्दू खड़े रहते हैं । एक शख्स बोलता बताइये दद्दू करोड़ पति हैं । पास में मंहगी मंहगी गाड़ियां भी हैं। लेकिन रोज लोकल ट्रेन में खड़े होकर चलते हैं। तभी एक शख्स की आवाज आती है ये मुंबई है भाई, यहां अच्छे अच्छे लोगों को ट्रेन से चलना पड़ता है। गाड़ी से चलेगे तो अपने ऑफिस और दुकान तक समय से पहुंच ही नही सकते। लोकल की भीड़ में अयोध्या का मामला दबता जा रहा था । लोग अपने धंदे की बात पर उतर आये थे । चांदी का भाव आज 20 हजार पहुंच गया है । दिवाली में कहा जा रहे हैं। कोई बोला मैं जयपुर जा रहा हूं । गाड़ी मुंबई सेंट्र्ल पहुंच चुकी थी । मैं उतर गया वहां भी भीड़ थी । हां रोज की अपेक्षा पुलिस वाले आज ज्यादा दिखे।
अयोध्या विवाद मामले पर फैसला आ चुका था । रात को ऑफिस से जल्दी छूट गया था । लोकल से घर जा रहा था । विरार की लोकल में आज रोज की तरह थोड़ी कम भीड़ थी । खड़े होने की जगह मिल गयी । 45 मिनट का सफर तय करके अपने स्टेशन पहुंचने वाला था । लोग चुपचाप अपनी जगह पर बैठे थे या फिर खड़े थे । लेकिन जैसे स्टेशन नजदीक आया एक लड़के ने पूछा, अरे हैदर भाई कल छुट्टी है क्या। दूसरे ने जवाब दिया क्यों। अरे हमने सोचा फैसला आने के बाद कल हो सकता है कर्फ्यू वर्फ्यू लग जाये। तो घर पर आराम करे । अयोध्या फैसले से बस यही तो अपना एक फायदा हो सकता है। कम से कम छुट्टी तो मिल जायेगी। तभी स्टेशन आ गया। हैदर नामक उस लड़के ने लोकल से उतरने की पोजीशन ली और बोला चल सुरेश, गुड नाइट । कल फिर दफ्तर में मिलते हैं।
Saturday, October 2, 2010
सियासत...
सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है।
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है।।
कल बुखारी साहब का साक्षात्कार किया,उनके एक एक अल्फाज़ ज़हर से बुझे हुए थे,ऐसा लग रहा था इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने साठ साल पुराने जख्मों पर बेदर्दी से नमक रगड़ दिया हो,मुझे रत्ती भर आश्चर्य नहीं हुआ क्यों कि बुखारी साहब तो आग उगलने के महारथी ही हैं..आश्चर्य तो इस बात पर था कि 2 लाख से ज्यादा नमाज़ अदा करने आए मुस्लिम युवा भी बुखारी की भाषा बोल रहे थे...गुफरान इरफान नूर मोहम्मद,असलम,जाकिर जाहिद और बहुत सारे,ये वो लोग थे जो पढ़े लिखे हैं,आई.आई टी,पी.एम.टी,बी.काम,एम काम करने वाले युवा और फिर आफिस आकर मुलायम का बयान सुना...मन सिहर उठा कुछ सोचकर।
मगर जब गुफ्तगू करता है चिंगारी निकलती है।।
कल बुखारी साहब का साक्षात्कार किया,उनके एक एक अल्फाज़ ज़हर से बुझे हुए थे,ऐसा लग रहा था इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने साठ साल पुराने जख्मों पर बेदर्दी से नमक रगड़ दिया हो,मुझे रत्ती भर आश्चर्य नहीं हुआ क्यों कि बुखारी साहब तो आग उगलने के महारथी ही हैं..आश्चर्य तो इस बात पर था कि 2 लाख से ज्यादा नमाज़ अदा करने आए मुस्लिम युवा भी बुखारी की भाषा बोल रहे थे...गुफरान इरफान नूर मोहम्मद,असलम,जाकिर जाहिद और बहुत सारे,ये वो लोग थे जो पढ़े लिखे हैं,आई.आई टी,पी.एम.टी,बी.काम,एम काम करने वाले युवा और फिर आफिस आकर मुलायम का बयान सुना...मन सिहर उठा कुछ सोचकर।
Thursday, September 30, 2010
ना हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
अच्छा है अभी तक तेरा कोई नाम नहीं है
तुझ को किसी मजहब से कोई काम नहीं है
जिस इल्म ने इंसान को तकसीम किया है
जिस इल्म ने इंसान को तकसीम किया है
उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं है
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा
इंसान की औलाद है इन्सान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हम ने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो मोड़ दे हर बांध वो तूफ़ान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
नफरत जो सिखाये वोह धरम तेरा नहीं है
इन्साफ जो रौंदे वोह कदम तेरा नहीं है
तू अमन का और सुलह का अरमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
ये दीन के ताजर ये वतन बेचने वाले
इंसानों की लाशों के कफ़न बेचने वाले
ये महल में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे
काँटों के मद रूह-ऐ-चमन बेचने वाले
तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
Thursday, September 16, 2010
Thursday, August 26, 2010
Wednesday, August 18, 2010
Saturday, August 14, 2010
Saturday, August 7, 2010
मंहगाई...
चावल दाल रोटी
टांग दिए गए आसमान पर
दिन भर टूंगों
निहारो उसे
और महसूस करो
कि
भरा है पेट
क्यों कि दाल रोटी तक
पहुंच सकती है
सिर्फ
रसूखदारों की सीढी
तुम अमीर थोड़े हो...।
टांग दिए गए आसमान पर
दिन भर टूंगों
निहारो उसे
और महसूस करो
कि
भरा है पेट
क्यों कि दाल रोटी तक
पहुंच सकती है
सिर्फ
रसूखदारों की सीढी
तुम अमीर थोड़े हो...।
Tuesday, August 3, 2010
उनकी और हमारी हमारी महफिल।
रोज़ शाम को सजती है महफिल
रोड के उस पार उनकी
रोड के इस पार हमारी
छलकते हैं पैमाने
रोड के उस पार उनके
रोड के इस पार हमारे
हर घूंट के साथ नशीली होती है शाम
रोड के उस पार उनकी
रोड के इस पास हमारी
वो हर घूंट के साथ लेते हैं सुट्टा
हम हर घूंट के साथ लेते हैं भुट्टा
उनके और हमारे बीच
एक सड़क की दूरी
फिर भी नाम अलग अलग
लोग उन्हें कहते हैं शराबी और नशेड़ी
और हम!हम ठहरे चयेड़ी
भई वाह!पीता और पिलाता है
काशी भी गजब आदमी है
मधुशाला के सामने
चाय की दुकान चलाता है।
नोट:
सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन मैं और मेरे दोस्त रोज़ शराब की दुकान के सामने बैठकर चाय पीते हैं। दरअसल यह दुकान मधुशाला के ठीक सामने है और काशी नाम का यह लड़का इस दुकान को चलाता है।
रोड के उस पार उनकी
रोड के इस पार हमारी
छलकते हैं पैमाने
रोड के उस पार उनके
रोड के इस पार हमारे
हर घूंट के साथ नशीली होती है शाम
रोड के उस पार उनकी
रोड के इस पास हमारी
वो हर घूंट के साथ लेते हैं सुट्टा
हम हर घूंट के साथ लेते हैं भुट्टा
उनके और हमारे बीच
एक सड़क की दूरी
फिर भी नाम अलग अलग
लोग उन्हें कहते हैं शराबी और नशेड़ी
और हम!हम ठहरे चयेड़ी
भई वाह!पीता और पिलाता है
काशी भी गजब आदमी है
मधुशाला के सामने
चाय की दुकान चलाता है।
नोट:
सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन मैं और मेरे दोस्त रोज़ शराब की दुकान के सामने बैठकर चाय पीते हैं। दरअसल यह दुकान मधुशाला के ठीक सामने है और काशी नाम का यह लड़का इस दुकान को चलाता है।
Saturday, July 31, 2010
जियो हाजी भाई...।
फिल्मकारों को गैंगस्टर, अंडरवर्ल्ड, माफिया, डॉन और तस्कर हमेशा से भाते रहे हैं। ऐसा स्वाभाविक भी है। 50 के दशक में, एक दिन सपनों में जीने वाली बम्बई दहल गई थी। वजह थी दिन-दहाड़े एक बैंक में हुई डकैती। मुम्बई की यह पहली बैंक डकैती फोर्ट इलाके के द लॉयड बैंक में हुई थी। इसी दौरान दिल्ली से बम्बई गए अनोखे लाल नामक व्यक्ति ने 16 लाख की यह डकैती डाली थी। अनोखे लाल को इस डकैती का आइडिया बैंक डकैती पर बनी अमेरिकी फिल्म ‘हाईवे 301’ से मिला था। डकैती के बाद से फिल्म ‘हाईवे 301’ को बम्बई में बैन कर दिया गया था। गैंगस्टर से बम्बई और बॉलीवुड का यह पहला परिचय था …….
“सुल्तान मिर्जा़”…. जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह,जिसे खाकीधारियों की नज़र में स्मगलर कहा जाता है और गरीबों की ज़ुबान में मसीहा...। वो एक को लूटता है और फिर दस में बांट देता है...सब कुछ फिल्मी....बिल्कुल फिल्मी..
जी हां मैं वही बात कर रहा हूं जो आप समझ रहें हैं फिल्म वंस अपान द टाइम इन मुंबई की,फिल्म की रिलीज होने के पहले बहुत सारे कयास सामने आए किसी ने कहा कि मुंबई के पहले डॉन हाजी मस्तान की निजी जिंदगी में दखलांदाजी कर रही है मिलन लुथारिया की यह फिल्म, तो वहीं हाजी मस्तान के घर वालों को यह आशंका सता रही थी कि पता नहीं फिल्म में क्या क्या दिखाया होगा..।
आखिरकार फिल्म रिलीज हुई,..मद्रास में भीषण बाढ़ आई और एक परिवार पानी की लहरों पर शांत हो गया,परिवार का एक बच्चा बच गया जो पता नहीं कैसे जादू की नगरी यानि मुंबई पहुंच गया...बावा भी कुछ ऐसे ही मुंबई पहुंचा था,लेकिन लहरों से बचकर नहीं अपने पिता हैदर मिर्जा़ के साथ.. बावा यानि हाजी मस्तान,हाजी मस्तान का बचपन का नाम बावा था... हैदर मिर्जा ने मुंबई पहुंचकर साईकिल और टु व्हीलर रिपेयरिग की एक दुकान खोली..अपने पिता के साथ बावा भी दुकान में हाथ बंटाता था..लेकिन दुकान पर उसका मन नहीं लगा,किस्मत ने साथ दिया और उसे एक नौकरी मिल गई,कुली की नौकरी,बावा बंदरगाह में कुली बन गया और अदेव और हांग कांग से आने वाले मुसाफिरों का सामान उठाने लगा..बंदरगाह और मुसाफिरों से याराना कुछ इस कदर बढ़ा कि समंदर की लहरों ने सीढि़यां बनायीं और और उस पर चढकर बावा जुर्म की उस मीनार पर जा बैठा जहां सिर्फ एक ही सरताज था खुद बावा...। बावा 1 मार्च 1926 को तमिलनाडु के पनैकुलम में पैदा हुए था बावा के बारें में किसी ने सोचा भी नही होगा कि एक अदद जूते पहनने को तरसने वाला यह शख्श पूरे मुंबई को अपने पैर की जूती बना लेगा...।
खैर...मैने अभी अभी वंस अपान द टाइम इन मुंबई देखी है, मुझे फिल्म बहुत अच्छी लगी उसके बाद मैने हाजी मस्तान की जीवनी अपने गूगल गुरु से निकाली और चाट ली...मुझे फिल्म भी अच्छी लगी और हाजी भाई की जीवनी भी...एकदम लल्लनटॉप। दिल्ली में अपने यूएनआई आफिस में बैठा हूं..बाहर जोरदार बारिश हो रही है कहीं शूट पर नहीं निकलना था और मेरे पास कोई काम भी नहीं था तो सोचा क्यों न कुछ बतकही ही हो जाए...।
वैसे फिल्म अच्छी है साथ ही मेरे दिमाग में अभी भी ये सवाल भी है कि क्या वास्तव में हाजी मस्तान ऐसा ही था...?
“सुल्तान मिर्जा़”…. जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह,जिसे खाकीधारियों की नज़र में स्मगलर कहा जाता है और गरीबों की ज़ुबान में मसीहा...। वो एक को लूटता है और फिर दस में बांट देता है...सब कुछ फिल्मी....बिल्कुल फिल्मी..
जी हां मैं वही बात कर रहा हूं जो आप समझ रहें हैं फिल्म वंस अपान द टाइम इन मुंबई की,फिल्म की रिलीज होने के पहले बहुत सारे कयास सामने आए किसी ने कहा कि मुंबई के पहले डॉन हाजी मस्तान की निजी जिंदगी में दखलांदाजी कर रही है मिलन लुथारिया की यह फिल्म, तो वहीं हाजी मस्तान के घर वालों को यह आशंका सता रही थी कि पता नहीं फिल्म में क्या क्या दिखाया होगा..।
आखिरकार फिल्म रिलीज हुई,..मद्रास में भीषण बाढ़ आई और एक परिवार पानी की लहरों पर शांत हो गया,परिवार का एक बच्चा बच गया जो पता नहीं कैसे जादू की नगरी यानि मुंबई पहुंच गया...बावा भी कुछ ऐसे ही मुंबई पहुंचा था,लेकिन लहरों से बचकर नहीं अपने पिता हैदर मिर्जा़ के साथ.. बावा यानि हाजी मस्तान,हाजी मस्तान का बचपन का नाम बावा था... हैदर मिर्जा ने मुंबई पहुंचकर साईकिल और टु व्हीलर रिपेयरिग की एक दुकान खोली..अपने पिता के साथ बावा भी दुकान में हाथ बंटाता था..लेकिन दुकान पर उसका मन नहीं लगा,किस्मत ने साथ दिया और उसे एक नौकरी मिल गई,कुली की नौकरी,बावा बंदरगाह में कुली बन गया और अदेव और हांग कांग से आने वाले मुसाफिरों का सामान उठाने लगा..बंदरगाह और मुसाफिरों से याराना कुछ इस कदर बढ़ा कि समंदर की लहरों ने सीढि़यां बनायीं और और उस पर चढकर बावा जुर्म की उस मीनार पर जा बैठा जहां सिर्फ एक ही सरताज था खुद बावा...। बावा 1 मार्च 1926 को तमिलनाडु के पनैकुलम में पैदा हुए था बावा के बारें में किसी ने सोचा भी नही होगा कि एक अदद जूते पहनने को तरसने वाला यह शख्श पूरे मुंबई को अपने पैर की जूती बना लेगा...।
खैर...मैने अभी अभी वंस अपान द टाइम इन मुंबई देखी है, मुझे फिल्म बहुत अच्छी लगी उसके बाद मैने हाजी मस्तान की जीवनी अपने गूगल गुरु से निकाली और चाट ली...मुझे फिल्म भी अच्छी लगी और हाजी भाई की जीवनी भी...एकदम लल्लनटॉप। दिल्ली में अपने यूएनआई आफिस में बैठा हूं..बाहर जोरदार बारिश हो रही है कहीं शूट पर नहीं निकलना था और मेरे पास कोई काम भी नहीं था तो सोचा क्यों न कुछ बतकही ही हो जाए...।
वैसे फिल्म अच्छी है साथ ही मेरे दिमाग में अभी भी ये सवाल भी है कि क्या वास्तव में हाजी मस्तान ऐसा ही था...?
Saturday, July 24, 2010
Friday, July 23, 2010
Friday, July 16, 2010
Wednesday, July 14, 2010
Friday, July 9, 2010
Sunday, July 4, 2010
लो आया बरसात का मौसम
लो आया बरसात का मौसम
रूमानी जज़्बात का मौसम।
दिलवालों के साथ का मौसम
अंगड़ाई की रात का मौसम।।
मद्धम मद्धम बूंदा बांदी
प्रेम रंग में भीगी वादी
दो दिल नजदीक आ रहें
ये शीरी फ़रहाद का मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
दूर हुई सबकी नासाज़ी
शुरु दिलों की सौदेबाज़ी
उसका ले लो अपना दे दो
फिर देखो क्या ख़ास है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
तन भीगा है मन भी भीगा
संग संग सारा यौवन भीगा
और अगर मनमीत साथ हो
फिर तो लल्लनटाप है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
लो आया बरसात का मौसम।।
रूमानी जज़्बात का मौसम।
दिलवालों के साथ का मौसम
अंगड़ाई की रात का मौसम।।
मद्धम मद्धम बूंदा बांदी
प्रेम रंग में भीगी वादी
दो दिल नजदीक आ रहें
ये शीरी फ़रहाद का मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
दूर हुई सबकी नासाज़ी
शुरु दिलों की सौदेबाज़ी
उसका ले लो अपना दे दो
फिर देखो क्या ख़ास है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
तन भीगा है मन भी भीगा
संग संग सारा यौवन भीगा
और अगर मनमीत साथ हो
फिर तो लल्लनटाप है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
लो आया बरसात का मौसम।।
Friday, June 11, 2010
Sunday, May 30, 2010
Monday, May 24, 2010
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