फिल्मकारों को गैंगस्टर, अंडरवर्ल्ड, माफिया, डॉन और तस्कर हमेशा से भाते रहे हैं। ऐसा स्वाभाविक भी है। 50 के दशक में, एक दिन सपनों में जीने वाली बम्बई दहल गई थी। वजह थी दिन-दहाड़े एक बैंक में हुई डकैती। मुम्बई की यह पहली बैंक डकैती फोर्ट इलाके के द लॉयड बैंक में हुई थी। इसी दौरान दिल्ली से बम्बई गए अनोखे लाल नामक व्यक्ति ने 16 लाख की यह डकैती डाली थी। अनोखे लाल को इस डकैती का आइडिया बैंक डकैती पर बनी अमेरिकी फिल्म ‘हाईवे 301’ से मिला था। डकैती के बाद से फिल्म ‘हाईवे 301’ को बम्बई में बैन कर दिया गया था। गैंगस्टर से बम्बई और बॉलीवुड का यह पहला परिचय था …….
“सुल्तान मिर्जा़”…. जुर्म की दुनिया का बेताज बादशाह,जिसे खाकीधारियों की नज़र में स्मगलर कहा जाता है और गरीबों की ज़ुबान में मसीहा...। वो एक को लूटता है और फिर दस में बांट देता है...सब कुछ फिल्मी....बिल्कुल फिल्मी..
जी हां मैं वही बात कर रहा हूं जो आप समझ रहें हैं फिल्म वंस अपान द टाइम इन मुंबई की,फिल्म की रिलीज होने के पहले बहुत सारे कयास सामने आए किसी ने कहा कि मुंबई के पहले डॉन हाजी मस्तान की निजी जिंदगी में दखलांदाजी कर रही है मिलन लुथारिया की यह फिल्म, तो वहीं हाजी मस्तान के घर वालों को यह आशंका सता रही थी कि पता नहीं फिल्म में क्या क्या दिखाया होगा..।
आखिरकार फिल्म रिलीज हुई,..मद्रास में भीषण बाढ़ आई और एक परिवार पानी की लहरों पर शांत हो गया,परिवार का एक बच्चा बच गया जो पता नहीं कैसे जादू की नगरी यानि मुंबई पहुंच गया...बावा भी कुछ ऐसे ही मुंबई पहुंचा था,लेकिन लहरों से बचकर नहीं अपने पिता हैदर मिर्जा़ के साथ.. बावा यानि हाजी मस्तान,हाजी मस्तान का बचपन का नाम बावा था... हैदर मिर्जा ने मुंबई पहुंचकर साईकिल और टु व्हीलर रिपेयरिग की एक दुकान खोली..अपने पिता के साथ बावा भी दुकान में हाथ बंटाता था..लेकिन दुकान पर उसका मन नहीं लगा,किस्मत ने साथ दिया और उसे एक नौकरी मिल गई,कुली की नौकरी,बावा बंदरगाह में कुली बन गया और अदेव और हांग कांग से आने वाले मुसाफिरों का सामान उठाने लगा..बंदरगाह और मुसाफिरों से याराना कुछ इस कदर बढ़ा कि समंदर की लहरों ने सीढि़यां बनायीं और और उस पर चढकर बावा जुर्म की उस मीनार पर जा बैठा जहां सिर्फ एक ही सरताज था खुद बावा...। बावा 1 मार्च 1926 को तमिलनाडु के पनैकुलम में पैदा हुए था बावा के बारें में किसी ने सोचा भी नही होगा कि एक अदद जूते पहनने को तरसने वाला यह शख्श पूरे मुंबई को अपने पैर की जूती बना लेगा...।
खैर...मैने अभी अभी वंस अपान द टाइम इन मुंबई देखी है, मुझे फिल्म बहुत अच्छी लगी उसके बाद मैने हाजी मस्तान की जीवनी अपने गूगल गुरु से निकाली और चाट ली...मुझे फिल्म भी अच्छी लगी और हाजी भाई की जीवनी भी...एकदम लल्लनटॉप। दिल्ली में अपने यूएनआई आफिस में बैठा हूं..बाहर जोरदार बारिश हो रही है कहीं शूट पर नहीं निकलना था और मेरे पास कोई काम भी नहीं था तो सोचा क्यों न कुछ बतकही ही हो जाए...।
वैसे फिल्म अच्छी है साथ ही मेरे दिमाग में अभी भी ये सवाल भी है कि क्या वास्तव में हाजी मस्तान ऐसा ही था...?
Saturday, July 31, 2010
Saturday, July 24, 2010
Friday, July 23, 2010
Friday, July 16, 2010
Wednesday, July 14, 2010
Friday, July 9, 2010
Sunday, July 4, 2010
लो आया बरसात का मौसम
लो आया बरसात का मौसम
रूमानी जज़्बात का मौसम।
दिलवालों के साथ का मौसम
अंगड़ाई की रात का मौसम।।
मद्धम मद्धम बूंदा बांदी
प्रेम रंग में भीगी वादी
दो दिल नजदीक आ रहें
ये शीरी फ़रहाद का मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
दूर हुई सबकी नासाज़ी
शुरु दिलों की सौदेबाज़ी
उसका ले लो अपना दे दो
फिर देखो क्या ख़ास है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
तन भीगा है मन भी भीगा
संग संग सारा यौवन भीगा
और अगर मनमीत साथ हो
फिर तो लल्लनटाप है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
लो आया बरसात का मौसम।।
रूमानी जज़्बात का मौसम।
दिलवालों के साथ का मौसम
अंगड़ाई की रात का मौसम।।
मद्धम मद्धम बूंदा बांदी
प्रेम रंग में भीगी वादी
दो दिल नजदीक आ रहें
ये शीरी फ़रहाद का मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
दूर हुई सबकी नासाज़ी
शुरु दिलों की सौदेबाज़ी
उसका ले लो अपना दे दो
फिर देखो क्या ख़ास है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
तन भीगा है मन भी भीगा
संग संग सारा यौवन भीगा
और अगर मनमीत साथ हो
फिर तो लल्लनटाप है मौसम।
लो आया बरसात का मौसम।।
लो आया बरसात का मौसम।।
Friday, June 11, 2010
Sunday, May 30, 2010
Monday, May 24, 2010
Sunday, May 16, 2010
Friday, May 14, 2010
Saturday, May 8, 2010
Tuesday, May 4, 2010
Thursday, April 29, 2010
बूढ़ा घर.....
गर्मी की तपन से निजात दिलाते थे ये मकान,
तर हो जाता था कलेजा......
लेकिन समय के साथ लोग बदलते गये
छोड़ते गये अपने गांव को
भूलते गये गीली मिट्टी की खुशबू
शहर में फ्लैट के अंदर कैद हो गये वो लोग
जिनके गांवों के घरों कच्ची मिट्टी वाले आंगन थे
और आंगन के बीच तुलसी की बिरवा
सब बदल गया , ढह गया मिट्टी का वो मकान
किसी जिम्मेदार बुजुर्ग की तरह.
गांव गया था , कुछ ऐसे ही मकान गिरे मिले
और कुछ पक्की ईंटो में कैद।
गांव से मैं भी शहरवाला बन गया था
हाथ में डिजिटल कैमरा था और
कैद कर ली ये तस्वीर।
Saturday, April 24, 2010
Saturday, April 17, 2010
खुजलीबाज और उंगलीबाज

खुजलीबाज और उंगलीबाज
कई दिनों से कुछ लिखने की फिराक में हूं,लेकिन मेरी लिखने की अभिलाषाओं पर दो तरह के लोग मिलकर ऐसा तुषारापात करते हैं कि भावनाओं की फसल का अंकुर कागज़ पर उतरने के पहले ही मटियामेट हो जाता है...ये दोनो सुकून और शांति के दुश्मन हैं... दोनों की नज़र हमेशा ऐसे महानुभावों पर रहती है जो जिंदगी की भागमभाग से अलग होकर कुछ पल चैन से रहना चाहते हैं...इनमें से एक का नाम है खुजलीबाज...। खुजलीबाज एक ऐसा प्राणी है जो हर दफ्तर कार्यालय में पाया जाता है..इतना ही नहीं, राह चलते सड़क पर, स्टेशन पर , या फिर पिक्चर हॉल में भी ऐसे प्राणियों की प्रजाति बड़ी आसानी से मिल जाती है...। खुजलीबाज जब कभी भी फ्री होता है, न जाने क्यों प्राकृतिक रुप से उसकी तशरीफ में खुजली होने लगती है...खुजली भी ऐसी जिसका कोई जोड़ नहीं, कोई तोड़ नहीं..इनकी खुजलाहट के आगे बीटेक्स, और इचगार्ड जैसी दवाइयों को भी पसीना आ जाता है...इस खुजलाहट को वो अपने परम मित्र, बड़े विचित्र माननीय उंगलीबाज से शेयर करता है, उंगलीबाज की पहचान उसकी उंगली है,उसकी उंगली में सलमान के “दस के दम” से कहीं ज़्यादा दम होता है...इन दोनो ने मिलकर इतना चरस किया है कि मेरे साथ साथ पूरा देश त्राहिमाम कर रहा है...इन दोनों के सामने कोई इंसान अपने मन मुताबिक काम नहीं कर सकता...उसके खुद के काम में अड़ंगा लगाकर ये ऐसा कार्यभार दिलाते हैं मानों देश की धरती से सारा सोना एक ही दिन में निकलवा लेंगे..।
सिर्फ देश ही नहीं विदेश की राजनीति में भी इन दोनो का अच्छा खासा दखल है...और इन दोनों ने अपने अपने गुरु भी बना रखे हैं..जितने भी खुजलीबाज हैं उनके गुरु आदरणीय शशी थरुर जी हैं,जिनकी खुजली ने देश के सारे राजनीतिज्ञों की खाज में चार चांद लगा रखा है...वहीं उंगलीबाजों को मैदान में डटे रहने की हिदायत उंगलीमास्टर अमरसिंह से मिलती है...दुनिया के समस्त उंगलीबाज इन्हें पिता तुल्य मानते हैं...अपनी उंगली की ताकत ये समय समय पर दिखाते रहते हैं...।
खैर...कई दिनों की मशक्कत के बाद आखिरकार मैं कुछ लिखने में सफल हो गया,हालांकि आज भी ये खुजलीबाज और उंगलीबाज राह में रोड़े अटका रहे थे लेकिन इन दोनों के प्रकोप से अंतत: मैं बच गया....।
भले ही मैं बच गया लेकिन आप लोगों को हिदायत दे रहा हूं ज़रा बच के रहना इन दोंनों से...।
Sunday, April 11, 2010
ये जहाँ है कहाँ !
क्या सच में- कभी कैथवास जी की फोटोग्राफ में गरीब लड़की को देखती बच्ची की आँखों में झलकती मासूमियत बरक़रार रह पाएगी, क्या सच में कभी गरीब-अमीर की दूरी कम हो पाएगी ,क्या सच में कभी गरीब आदिवासियों को उनकी जमीन वापस मिल पाएगी और वो नक्सल नही एक आम भारतीय कहलायेंगे , क्या सच में कभी कोई ऐसी पिच बन पाएगी जिसकी लम्बाई ११ गज हिंद में तो ११ गज पाक में होगी , क्या सच में कभी सफेदपोशों की सफेदी सूरज की रौशनी में तो नकाबपोशों की कालिख अमावस्या की कालिमा में गुम हो पाएगी, क्या सच में कभी लालफीताशाही मिट जाएगी, क्या सच में कभी हर बेरोजगार के हाथ में मेहनत की कमाई आ पाएगी, क्या सच में कभी चोरी हत्या बलात्कार जैसी घटनाएँ रुक जायेगी.
क्या सच में कभी कोई ऐसी दुनिया बस पाएगी???????????
शायद बस पाएगी............................ तभी तो ये परिंदा हमसे कह रहा है ...................
Thursday, March 18, 2010
Sunday, February 28, 2010
बुरा न मानो होली है...
होली आई यार
पड़ेगी पिचकारी की मार
कि गोरिया हो जा तू तैयार
जोगीरा सारारारा...
नशीली सी है फगुन बयार
जोबन पे पड़ेगी रंग की धार
मगन हैं भौजी आज हमार
जोगीरा सारारारा...
लाल लाल टेसु से गाल
गाल पे गहरा लाल गुलाल
मत मलना मेरे लाल
जोगीरा सारारारा...
ई तो एकदम कट्टा माल
उसपे हिरनी जैसी चाल
हो न जाए बवाल
जोगीरा सारारारा...
एक तो ई गोरिया का जोबन दूजी चढ़ गई भंग!
आज तो बौराया है जोगीरा देख देख सब दंग!!
बुरा न मानो होली है...
होली की ढेर सारी शुभकामनाएं
पड़ेगी पिचकारी की मार
कि गोरिया हो जा तू तैयार
जोगीरा सारारारा...
नशीली सी है फगुन बयार
जोबन पे पड़ेगी रंग की धार
मगन हैं भौजी आज हमार
जोगीरा सारारारा...
लाल लाल टेसु से गाल
गाल पे गहरा लाल गुलाल
मत मलना मेरे लाल
जोगीरा सारारारा...
ई तो एकदम कट्टा माल
उसपे हिरनी जैसी चाल
हो न जाए बवाल
जोगीरा सारारारा...
एक तो ई गोरिया का जोबन दूजी चढ़ गई भंग!
आज तो बौराया है जोगीरा देख देख सब दंग!!
बुरा न मानो होली है...
होली की ढेर सारी शुभकामनाएं
Friday, January 15, 2010
Tuesday, January 5, 2010
पुरकैफ जी नहीं रहे
साथियों बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि अब पुरकैफ जी हमारे बीच नहीं रहे ! हालांकि राजेश त्रिपाठी 'पुरकैफ' के राजेश त्रिपाठी अभी मौजूद हैं और स्टार न्यूज़ मुंबई में मजे कि नौकरी कर रहे हैं लेकिन पुरकैफ जी कि बात ही कुछ और थी ! पुरकैफ यानी कि खिलंदड़ मिज़ाज का वोह शख्स जो एक नंबर का शातिर गेमबाज है , लाखैरों (लाला, लोमड़ी, देबू , विक्की) का लाखैरा है , खटिकाना टोला की शायरी गाने वाला शायर है, सड़क छाप लौंडों का सरगना है , अजीबों-गरीब कपड़े पहेनने का मास्टर है, नयी-नयी पत्र-पत्रिकाओं को चीथड़ा कर ख़ुशी महसूस करने वाला कोलाज़र है !
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु
Saturday, January 2, 2010
Sunday, December 20, 2009
और रिश्ता ख़त्म..
कुछ तुमने कहा
कुछ मैंने कहा
और जल उठी आग
सुलगने लगे ज़ज्बात
तुमने बुझाने की कोशिश नहीं की,
और संयोग से
मुझे भी पसंद है गरम चाय !
कुछ मैंने कहा
और जल उठी आग
सुलगने लगे ज़ज्बात
तुमने बुझाने की कोशिश नहीं की,
और संयोग से
मुझे भी पसंद है गरम चाय !
Thursday, December 17, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)






