Friday, June 11, 2010

दुनिया में अगर आए हैं तो जीना ही पड़ेगा .....

दुनिया में अगर आए हैं... तो जीना ही पड़ेगा
है जिंदगी अगर गम... तो उसे पीना ही पड़ेगा

Sunday, May 30, 2010

ईशीईईईई बहुत तीखा है......

मस्त चटपटा कचालू खालो भाई

मुह जल जाये तो पैसे देना.... नहीं तो मत देना



Friday, May 14, 2010

जिंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मुकाम ....

जिंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मुकाम ....
वो फिर नहीं आते ...... फिर नहीं आते

Saturday, May 8, 2010

न्यूड नेचर....



ये तस्वीर मैंने महाबलेश्वर की वादियों में खींची है।

Thursday, April 29, 2010

बूढ़ा घर.....



गर्मी की तपन से निजात दिलाते थे ये मकान,
तर हो जाता था कलेजा......
लेकिन समय के साथ लोग बदलते गये
छोड़ते गये अपने गांव को
भूलते गये गीली मिट्टी की खुशबू
शहर में फ्लैट के अंदर कैद हो गये वो लोग
जिनके गांवों के घरों कच्ची मिट्टी वाले आंगन थे
और आंगन के बीच तुलसी की बिरवा
सब बदल गया , ढह गया मिट्टी का वो मकान
किसी जिम्मेदार बुजुर्ग की तरह.
गांव गया था , कुछ ऐसे ही मकान गिरे मिले
और कुछ पक्की ईंटो में कैद।
गांव से मैं भी शहरवाला बन गया था
हाथ में डिजिटल कैमरा था और
कैद कर ली ये तस्वीर।

Saturday, April 24, 2010

रेत वाला जंगल



ये तस्वीर मुंबई के पास एक बीच से उतारी है

Saturday, April 17, 2010

खुजलीबाज और उंगलीबाज



खुजलीबाज और उंगलीबाज
कई दिनों से कुछ लिखने की फिराक में हूं,लेकिन मेरी लिखने की अभिलाषाओं पर दो तरह के लोग मिलकर ऐसा तुषारापात करते हैं कि भावनाओं की फसल का अंकुर कागज़ पर उतरने के पहले ही मटियामेट हो जाता है...ये दोनो सुकून और शांति के दुश्मन हैं... दोनों की नज़र हमेशा ऐसे महानुभावों पर रहती है जो जिंदगी की भागमभाग से अलग होकर कुछ पल चैन से रहना चाहते हैं...इनमें से एक का नाम है खुजलीबाज...। खुजलीबाज एक ऐसा प्राणी है जो हर दफ्तर कार्यालय में पाया जाता है..इतना ही नहीं, राह चलते सड़क पर, स्टेशन पर , या फिर पिक्चर हॉल में भी ऐसे प्राणियों की प्रजाति बड़ी आसानी से मिल जाती है...। खुजलीबाज जब कभी भी फ्री होता है, न जाने क्यों प्राकृतिक रुप से उसकी तशरीफ में खुजली होने लगती है...खुजली भी ऐसी जिसका कोई जोड़ नहीं, कोई तोड़ नहीं..इनकी खुजलाहट के आगे बीटेक्स, और इचगार्ड जैसी दवाइयों को भी पसीना आ जाता है...इस खुजलाहट को वो अपने परम मित्र, बड़े विचित्र माननीय उंगलीबाज से शेयर करता है, उंगलीबाज की पहचान उसकी उंगली है,उसकी उंगली में सलमान के “दस के दम” से कहीं ज़्यादा दम होता है...इन दोनो ने मिलकर इतना चरस किया है कि मेरे साथ साथ पूरा देश त्राहिमाम कर रहा है...इन दोनों के सामने कोई इंसान अपने मन मुताबिक काम नहीं कर सकता...उसके खुद के काम में अड़ंगा लगाकर ये ऐसा कार्यभार दिलाते हैं मानों देश की धरती से सारा सोना एक ही दिन में निकलवा लेंगे..।
सिर्फ देश ही नहीं विदेश की राजनीति में भी इन दोनो का अच्छा खासा दखल है...और इन दोनों ने अपने अपने गुरु भी बना रखे हैं..जितने भी खुजलीबाज हैं उनके गुरु आदरणीय शशी थरुर जी हैं,जिनकी खुजली ने देश के सारे राजनीतिज्ञों की खाज में चार चांद लगा रखा है...वहीं उंगलीबाजों को मैदान में डटे रहने की हिदायत उंगलीमास्टर अमरसिंह से मिलती है...दुनिया के समस्त उंगलीबाज इन्हें पिता तुल्य मानते हैं...अपनी उंगली की ताकत ये समय समय पर दिखाते रहते हैं...।
खैर...कई दिनों की मशक्कत के बाद आखिरकार मैं कुछ लिखने में सफल हो गया,हालांकि आज भी ये खुजलीबाज और उंगलीबाज राह में रोड़े अटका रहे थे लेकिन इन दोनों के प्रकोप से अंतत: मैं बच गया....।
भले ही मैं बच गया लेकिन आप लोगों को हिदायत दे रहा हूं ज़रा बच के रहना इन दोंनों से...।

Sunday, April 11, 2010

ये जहाँ है कहाँ !


क्या सच में- कभी कैथवास जी की फोटोग्राफ में गरीब लड़की को देखती बच्ची की आँखों में झलकती मासूमियत बरक़रार रह पाएगी, क्या सच में कभी गरीब-अमीर की दूरी कम हो पाएगी ,क्या सच में कभी गरीब आदिवासियों को उनकी जमीन वापस मिल पाएगी और वो नक्सल नही एक आम भारतीय कहलायेंगे , क्या सच में कभी कोई ऐसी पिच बन पाएगी जिसकी लम्बाई ११ गज हिंद में तो ११ गज पाक में होगी , क्या सच में कभी सफेदपोशों की सफेदी सूरज की रौशनी में तो नकाबपोशों की कालिख अमावस्या की कालिमा में गुम हो पाएगी, क्या सच में कभी लालफीताशाही मिट जाएगी, क्या सच में कभी हर बेरोजगार के हाथ में मेहनत की कमाई आ पाएगी, क्या सच में कभी चोरी हत्या बलात्कार जैसी घटनाएँ रुक जायेगी.
क्या सच में कभी कोई ऐसी दुनिया बस पाएगी???????????
शायद बस पाएगी............................ तभी तो ये परिंदा हमसे कह रहा है ...................




Sunday, February 28, 2010

बुरा न मानो होली है...

होली आई यार
पड़ेगी पिचकारी की मार
कि गोरिया हो जा तू तैयार
जोगीरा सारारारा...
नशीली सी है फगुन बयार
जोबन पे पड़ेगी रंग की धार
मगन हैं भौजी आज हमार
जोगीरा सारारारा...
लाल लाल टेसु से गाल
गाल पे गहरा लाल गुलाल
मत मलना मेरे लाल
जोगीरा सारारारा...
ई तो एकदम कट्टा माल
उसपे हिरनी जैसी चाल
हो न जाए बवाल
जोगीरा सारारारा...
एक तो ई गोरिया का जोबन दूजी चढ़ गई भंग!
आज तो बौराया है जोगीरा देख देख सब दंग!!
बुरा न मानो होली है...
होली की ढेर सारी शुभकामनाएं

Friday, January 15, 2010

Tuesday, January 5, 2010

पुरकैफ जी नहीं रहे

साथियों बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि अब पुरकैफ जी हमारे बीच नहीं रहे ! हालांकि राजेश त्रिपाठी 'पुरकैफ' के राजेश त्रिपाठी अभी मौजूद हैं और स्टार न्यूज़ मुंबई में मजे कि नौकरी कर रहे हैं लेकिन पुरकैफ जी कि बात ही कुछ और थी ! पुरकैफ यानी कि खिलंदड़ मिज़ाज का वोह शख्स जो एक नंबर का शातिर गेमबाज है , लाखैरों (लाला, लोमड़ी, देबू , विक्की) का लाखैरा है , खटिकाना टोला की शायरी गाने वाला शायर है, सड़क छाप लौंडों का सरगना है , अजीबों-गरीब कपड़े पहेनने का मास्टर है, नयी-नयी पत्र-पत्रिकाओं को चीथड़ा कर ख़ुशी महसूस करने वाला कोलाज़र है !
लेकिन शायद पुरकैफ जी इन सारी उपाधियों का बोझ एक साथ ज्यादा दिन तक उठा न सके या कह लें शहर की चकाचौंध और दिखावटी दुनिया के फेर में पड़ कर राजेश ने अल्लढ़ 'पुरकैफ' को मरने पर मजबूर कर दिया!हाय रे! पुरकैफ जी नहीं रहे!खैर जैसे हर आत्मा नया शरीर धारण कर लेती है वैसे ही राजेश त्रिपाठी का शरीर छोड़ने के बाद पुरकैफ की आत्मा भी नया शरीर धारण कर ही लेगी ! बस गम इस बात का है की राजेश ने पुरकैफ को वोह शरीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जहाँ वो पैदा हुआ ,पला-बढ़ा और पुरकैफ बनने तक का सफ़र तय किया !हाल ही में पुरकैफ जी के अवसान पर पुराने मित्रों ने एक शोक सभा का आयोजन किया जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं.............................
अरे पुरकैफ भाई नहीं रहे यार ..................................बढ़िया आदमी थे यार !रेत पर नाम लिखने से क्या............. वाह-वाह, वाह -वाह .......क्या बात है गुरु .........................लगे रहो पांडे.............................. क्या तुरंता दागा है !
पांडे-- ओए ओए ओए ओए ओए............. अरे रेत पर....................रेत पर नाम(पुरकैफ) लिखने से क्या फायदा..............एक लहर आएगी कुछ बचेगा नहीं ...........रेत पर ............नाम लिखने से क्या फायदा !
लाला-- अबे पांडे चिंता मत करो बे ......................एक पुरकैफ चला गया तो क्या हुआ .................साला मैं पुरकैफ की फक्ट्री लगवा दूंगा ...............................रोज एक करोड़ पुरकैफ पैदा करूँगा ................चिंता मत करो बे पांडे , तुम बस तुरंत सुनते रहो बस !
पांडे-- रेत पर .............................
लाला-- अबे साले कभी कापी -कलम भी पकड़बो कि रेते पे जिंदगी भर नाम लिखबो !
लोमड़ी -- हा-हा-हा-हा-हा-हे हे हे हे हे --हुहुहुहुहुहू ...............
देबू-- अब मैं सुनाता हूँ .........अर्ज है, मुलाहिजा फरमाइयेगा ........मेरी रजब कि बरकत न चली जाय ........दो रोज से घर में कोई मेहमान नहीं है .....हर दर पे झुके सर ये मेरी शान नहीं है !
सभी लोग -- क्या बात है --क्या बात है
दादा-- अबे यार इसीलिए तो पुरकैफ भाई नहीं चल बसे ! अब राजेशवा के घर में बैठकबाजी तो होती नहीं होगी तो मेहमान (हम लोगों जैसे ) कहाँ से आयें ! वैसे पुरकैफ भाई लिखते साही थे गुरु .........
दद्दू-- क्या ख़ाक अच्छा लिखते थे !.....दुई-दुई लाईन चुरा के अपनी कविता बना लिए ससुर , खुद एक्को लाईन लिखे होंगे आज तक !
शोक सभा धीरे -धीरे दारु पार्टी में तब्दील होती जा रही थी ! पुरकैफ भाई नहीं रहे का स्वर मद्धम पड़ता जा रहा था , शायद इसलिए कि पुरकैफ की आत्मा आज भी यहाँ जिन्दा है !
पांडे चालू हैं -------रेत पर.......ओहो ...रेत पर
वाह पांडे वाह ....लगे रहो......लगे रहो गुरु

Sunday, December 20, 2009

और रिश्ता ख़त्म..

कुछ तुमने कहा
कुछ मैंने कहा
और जल उठी आग
सुलगने लगे ज़ज्बात
तुमने बुझाने की कोशिश नहीं की,
और संयोग से
मुझे भी पसंद है गरम चाय !

Wednesday, November 4, 2009

कौन है सच्चा राष्ट्र भक्त ?

१- क्या आप सच्चे राष्ट्रभक्त हैं ?
२- हाँ मै हूं ।
१- सुबूत ?
२- मतलब ?
१- इसका सुबूत क्या है ?
२- जी ..... जी मुझे अपने देश से प्यार है ।
१- और ?
२- और ............................................................................... कुछ नहीं ।
वास्तव में किसी का भी यह कहना की वो सच्चा देशभक्त है, बेमानी है । इसकी वजह मैं बाद में बताऊंगा। पर दिल्ली आने के बाद मुझे मालूम हुआ कि असली देशप्रेमी कोई और हो या न हो मगर विजय राष्ट्रभक्त शिरोमणि निसंदेह हैं।
याद कीजिये बीते मार्च का तमाशा। जब पूरा देश और सरकार रास्ट्रपिता महात्मा गाँधी की कुछ व्यक्तिगत निशानियों की नीलामी होते देख रहीं थी । विश्व भर का मीडिया इस बात पर नज़रें गडाये था कि देखें बापू का देश क्या करता है। देश की नाक खतरे में थी । ऐसे में विजय माल्या ने ही २७ मार्च २००९ को नीलामी में राष्ट्र का गौरव बचाया था।
इस घटना को राष्ट्र भक्ति के नज़रिए से देखने की दृष्टि मुझे दिल्ली के अपने कुछ मीडिया मित्रों के साथ बैठकी के दौरान मिली। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि महफिल में सिर्फ विजय माल्या ब्रांड उत्पाद ही है। अपने ब्रांड की तड़प ने मुझे उकसाया तो पहले लिखे जा चुके सवालों से मेरा सामना हुआ। और मैं उनसे पराजित हो गया । क्योंकि सार्वजनिक नियमो की धज्जियाँ उड़ना, जैसे-यातायात पुलिस से बचने के लिए ५०-१०० की रिश्वत देना, सड़क किनारे लघु शंका का निवारण कर लेना, धूम्रपान करना, सार्वजनिक सम्पतियों को नष्ट होते देखते रहना और सबसे बड़े देशद्रोह कि बात यह कि किसी नागनाथ या सांपनाथ को वोट देना ( मजबूरी में ) ताकि वो हजारों करोड़ रूपये का घोटाला कर देश को खोखला करते रहें, आदि किसी सच्चे राष्ट्रभक्त के गुन नही हो सकते।
पर मुझे इस शर्मिंदगी से उबारते हुए मित्रों ने मुझे एक माल्या ब्रांड पटियाला दिया और कहा इसे पीते ही मैं एक राष्ट्रभक्त की भक्ति मे शामिल हो जाऊंगा। इस तरह मेरी देशभक्ति साबित हो जायेगी । मेरे पिए हर पैग के ज़रिये माल्या तक पहुचने वाला हर रुपया माल्या के हाथों को मजबूत करेगा। इस समय विजय माल्या से बढ़कर देशहित के बारे मे सोचने वाला और कोई नहीं लिहाजा पीते रहिये ( सिर्फ़ माल्या उत्पाद ) और देश के गौरव की रक्षा करने वाले हाथो को मजबूती प्रदान कीजिये।
उनके इस तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उस दिन गुरु पर्व का ड्राई डे था । फिर भी देशभक्ति के नाम पर घंटों जाम टकराते रहे ।
धीरे धीरे राष्ट्रभक्ति प्रगाढ़ हो रही थी .....

सन्दर्भ के लिए लिंक
http://www.thaindian.com/newsportal/tag/york-auction


Sunday, August 30, 2009

महगाई के दोहे

महगाई ने ऐसा मारा की मिडिल वर्ग मार जाए
हे बनवारी मुरलीधारी मनमोहन लेव बचाय .

गोभी,भिंडी दाल तो अब सपनो मे दिखते हैं
आलू और टमाटर कभी कभी ही मिलते हैं.

शक्कर ने तो मध्यवर्ग का छोड़ दिया है साथ
इतने ऊँचे दम हुए की नही पहुँचता हाथ .

अभी तलाक़ मंदी ने मारा अब मार रही महगाई है
ये कैसा मौसम आया है ये कैसी शामत आई है .

मंदी ने नौकरी चीन ली अब महगाई लेगी जान
कुछ जतन करो हे दीनदयाला संसद के भगवान.

Monday, August 24, 2009





ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो ...
ऑफिस में खुश रहो, घर में खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो ...
आज जिम जाने का समय नहीं , दो कदम चल के ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

आज दोस्तों का साथ नहीं, टीवी देख के ही खुश रहो ...
घर जा नहीं सकते तो फ़ोन कर के ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ


आज कोई नाराज़ है, उसके इस अंदाज़ में भी खुश रहो ...
जिसे देख नहीं सकते उसकी आवाज़ में ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

जिसे पा नहीं सकते उसकी याद में ही खुश रहो
Laptop न मिला तो क्या , Desktop में ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ


बिता हुआ कल जा चूका है , उसकी मीठी यादों में ही खुश रहो ...
आने वाले पल का पता नहीं ... सपनो में ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ


हँसते हँसते ये पल बिताएँगे, आज में ही खुश रहो
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो