Wednesday, March 25, 2009
बड़े किसानों को राहत, केद्र सरकार ने तोड़ी आचार संहिता
पांच एकड़ से ज्यादा जोत वाले इन किसानों को बकाया कर्ज की पहली किश्त 30 सितंबर 2008 तक, दूसरी किश्त 31 मार्च 2009 तक और तीसरी किश्त 30 जून 2009 तक चुकानी है। लेकिन रिजर्व बैंक ने दूसरी किश्त की अंतिम तिथि से आठ दिन पहले सोमवार को अधिसूचना जारी कर पहली किश्त को भी अदा करने की तिथि बढ़ाकर 31 मार्च 2009 कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि रिजर्व बैंक के मुताबिक तिथि को आगे बढ़ाने का फैसला भारत सरकार का है। जाहिर है, इससे सीधे-सीधे देश के उन सारे बड़े किसानों को फायदा मिलेगा, जिन्होंने अभी तक पहली किश्त नहीं जमा की है।
2 मार्च को आम चुनावों की तिथि की घोषणा हो जाने के बाद देश में आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसे में रिजर्व बैंक या किसी भी सरकारी संस्था की ऐसी घोषणा को आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा जो आबादी के बड़े हिस्से को नया लाभ पहुंचाती हो। शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं कि साढ़े पांच महीने से केंद्र सरकार सोई हुई थी क्या? चुनावों की तिथि घोषित हो जाने के बाद वित्त मंत्रालय की पहले पर की गई यह घोषणा सरासर आचार संहिता का उल्लंघन है। आदित्य बिड़ला समूह के प्रमुख अर्थशास्त्री अजित रानाडे कहते है कि वैसे तो रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है। लेकिन चूंकि अधिसूचना में भारत सरकार के फैसले का जिक्र किया गया है, इसलिए यकीनन यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है।
असल में केंद्र सरकार की कर्ज माफी योजना के तहत पांच एकड़ से कम जमीन वाले लघु व सीमांत किसानों को 31 मार्च 1997 के बाद 31 मार्च 2007 तक वितरित और 31 दिसंबर 2007 को बकाया व 29 फरवरी 2008 तक न चुकाए गए सारे बैंक कर्ज माफ कर दिए थे। लेकिन पांच एकड़ से ज्यादा जोतवाले किसानों को कर्ज में 25 फीसदी की राहत दी गई थी। इस कर्ज की रकम की व्याख्या ऐसी है कि इसकी सीमा में ऐसे किसानों के सारे कर्ज आ सकते हैं। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक इन किसानों के लिए कर्ज छूट की रकम या 20,000 रुपए में से जो भी ज्यादा होगा, उसका 25 फीसदी हिस्सा माफ कर दिया जाएगा। लेकिन यह माफी तब मिलेगी, जब ये किसान अपने हिस्से का 75 फीसदी कर्ज चुका देंगे। इसकी भरपाई बैंकों को केंद्र सरकार की तरफ से की जाएगी। दूसरे शब्दों में 30 जून 2009 तक बड़े किसानों द्वारा कर्ज की 75 फीसदी रकम दे दिए जाने के बाद उस कर्ज का बाकी 25 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार बैंकों को दे देगी।
रिजर्व बैंक ने सोमवार, 23 मार्च को जारी अधिसूचना में कहा है कि समयसीमा केवल 31 मार्च तक बकाया किश्तों के लिए बढ़ाई गई है और तीसरी व अतिम किश्त के लिए निर्धारित 30 जून 2009 की समयसीमा में कोई तब्दीली नहीं की गई है। तब तक अदायगी न होने पर बैंकों को ऐसे कर्ज को एनपीए में डाल देना होगा और उसके मुताबिक अपने खातों में प्रावधान करना होगा।
Monday, March 23, 2009
पत्थर
पाँच साल बाद ,
अबकी पूरे पाँच साल बाद,
मदारी और मजमे बाज कचहरी (जनता की) में आ गए हैं ।
सबने पिटारी झोली फैला दी है।
एक मदारी कह रहा है .... जमूरे का पेट फाड़ देगा, सर धड अलग कर देगा । उसके हाथ में चाकू है। फ़िर भी हाथ जोड़े खड़ा है। इशारा पेट की और कर रहा है बार -बार। कुछ देने पर दुआ देगा । कुछ नही देने पर ?
दूसरा ............खेल दिखने के बाद ताबीज दे रहा है । मुफ्त देने लगा तो सब मँगाने लगे । फिर सौ रुपये मांगने लगा। कई लोगों ने दिया । सबको दिलदार कहा और रुपये लौटा दिया । फिर बोला सौ नहीं तो दस निकालो, हराम में मिल रहा था तो हजार हाथ बढ़ गए थे । अब क्यों ठंडे हो गए । मौके पर ठंडे पड़ गए तो बीवी चली जायेगी कहीं और । और फ़िर ताबीज की मांग बढ़ गयी।
संपेरा पिछली बार भी आया था । सबको जडी दे गया था । बोल गया था कि सांप, बिच्छू कटाने पर लगना फायदा मिलेगा । जहर तुंरत उतर जाएगा । एक ने शिकायत की । कहा जडी बेकार निकली । उसने पुछा बाएं कटा के दायें। जवाब मिला लघु शंका के समय बीच में काट गया था । सपेरा बोला मैंने कहा था बाएं कटे तो दायें लगना और दायें काटे तो ...... । पर उसको तो बीच में ..... । सपेरा फुफकार उवाच ..... पढ़े लिखे मूर्ख हो बाबू .....मन किया था गुरु ने .....ऐसे लोगों को जडी देने के लिए । माफ़ करना ( ऊपर देखते हुए )। फिर साँप का खेल दिखने लगा । इस बार भी आखिरी पिटारा खोलने से पहले जडी बाटने लगा।
Sunday, March 22, 2009
आख़िर हर बार धर्म के नाम पर ही क्यों...
यह वोह कमेन्ट है जो भेजा गया। इन लाइनों को लिखने से पहले ये तो सोचना चाहिए की अभी तक निशाना कौन बने? आंध्र प्रदेश मैं क्रिशच्यानो को जिन्दा जला दिया जाता है तो कोई बदला नही लिया जाता। गुजरात में मुसलमानों को काट दिया गया तब कोई हाथ नही काटा। तो अब यह धमकी किसके लिए है। जब भी हमले हुए मुसलमानों का नाम आया। लेकिन मालेगाओं के नाम पर खामोश क्यों है..
Wednesday, March 18, 2009
हे राम से...जय श्री राम
चुनावी रंग मैं पटा देश
कहीं राम का नाम
तो कहीं राम से ही परहेज
इन सबकर बीच झूलत
गांधी का देश है
अहिंसा का पाठ पढाने वाले का
यह दूसरा रूप है
गोली खाके भी जिसके मुंह से
हे राम है
उसी की संतान
हाथ काट देने की बात कह
बोलती जय श्री राम है...
Monday, February 16, 2009
मोहिनिश के liye
Tuesday, January 13, 2009
महानायक की दरियादिली
कम खर्ची सोचना अच्छा नहीं लगता । वो सनिकों के लिए खाना माँगा देते हैं । दरियादिली देखिये २५०० रूपये खट खर्च डाले । खर्च तो कर ही डाले ब्लॉग पर लिख भी दिया ताकि दुनिया दरियादिली से वाकिफ हो जाए। प्रयाग कुम्भ या माघ मेले में रोज अन्न क्षेत्र चलते हैं । अमिताभ ने बचपन में देखा होगा । कभी इसमें खाया भी होगा । कभी मन तेजी बच्चन के साथ गुरुद्वारा गए होंगे तो गुरु का प्रसाद जीमा होगा । संतों के भंडारे में तो हर आने वाले को प्रसाद के साथ दक्षिणा भी दी जाती है । कहाँ से आता है सब। यह किसी ब्लॉग पर नहीं मिलेगा ।
पर अमिताभ के पास ब्लॉग है । वह लिख सकते हैं । लोग उसे पढ़ते हैं । वह सदी के महानायक हैं । इसलिए वो हर बात लिखते हैं । छोटी-छोटी बातें लिखते हैं ।
Friday, January 2, 2009
कब आओगे भागीरथी
Friday, October 31, 2008
दिवाली की शुभकामनाये
Thursday, October 2, 2008
चंडीगढ़
Tuesday, September 23, 2008
क्या येही ज़िन्दगी है.......
Tuesday, September 16, 2008
रोटी का धर्म...
Monday, September 8, 2008
भरी जवानी मै तीर्थ यात्रा
कभी ऐसा सोचा नही था कि भरी जवानी में तीर्थ यात्रा करनी पड़ेगी ... भला हो अमर उजाला वालों का देहरादून से हरिद्वार लाकर पटक दिया.....अब शायद येही दिन बचे थे कि धर्म नगरी में कि रातें करवट लेकर, 'शाम गंगा किनारे और दिन सडको कि ख़ाक छानकर बीतेगा .....
पत्थर की मूर्ति
Monday, August 18, 2008
dard
देख रही है
आख्ने!
एक ख्वाब
आजादी का !
आजादी
जहा होगी रोटी
हर थली में
अमीरी नहीं चुसे गई
खून गरीबी का
हमारे रहबर
न खून हमारा यू
बहाए गे
नफरत के चिराग
बुझ जाये गे
जिसके लिए
हमारे पुरखो ने
खून बहाया था
क्या वो आजादी
दिन आ गया
लोग जस्न क्यों ?
आजादी का
मना रहे है
मना रहे है
या
सिर्फ खुद को बहला रहे है
या
सिर्फ हमें जला रहे है
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधईयाँ...शुक्रिया
ऐ सुबह! मैं अब कहाँ रहा हूँ
खवाबों ही में सर्फ़ हो चुका हूँ
क्या है जो बदल गयी है दुनिया
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ
मैं जुर्म का ऐतराफ़ कर के
कुछ और है जो छुपा गया हूँ
मैं और फ़क़त उसी की ख्वाइश
इखलाक़ में झूठ बोलता हूँ
रोया हूँ तो अपने दोस्तों में
पर तुझ से तो हंस कर मिला हूँ
अए शख्स मैं तेरी जुस्तुजू से
बेजार नहीं हूँ, थक गया हूँ
Saturday, July 19, 2008
Rang....
Wednesday, July 9, 2008
Saturday, July 5, 2008
"DHARM PAR RAJNEETI", BUS KARO.......!
Friday, July 4, 2008
Jaalim Media....! ARUSHI'S MURDER..!
Thursday, July 3, 2008
Monday, June 30, 2008
Friday, June 27, 2008
प्यार अंधा होता है, माया भी यही कहती….
समानान्तर चीजों में भी विरोधाभाष होता है...गज़ब का विरोधाभाष। कहने को तो वो एक पुल के दो सिरे हैं। एक सिरा मुंबई के भायखला इलाके में खुलता है तो दूसरा सात रास्ता चौराहा से पहले पड़ने वाले एक और चौराहे से जुड़ जाता है।
एस ब्रिज (S).. जी हां अब इसी नाम से जाना जाता है वो पुल। जिसके दोनों सिरों के अलावा ऊपर से गुजरती सड़क के समानान्तर छोर पर बने फुटपाथ भी हमशक्ल ही नज़र आते हैं....बस अंतर है तो यही कि फुटपाथ के एक सिरे पर थम चुकी हैं प्यार के नाम कुर्बान जिंदगियां।
.......माया, यही नाम बताया फुटपाथ पर उगी दिखने वाली उस स्थूल काया की गौर वर्ण महिला ने।
एस ब्रिज से गुजरते वक्त वैसे तो किसी के भी कदम अकसर दिखने वाले एक दृश्य को देखकर थम जाते हैं....दुधमुहे बच्चों के हाथ में बंधी रस्सी का एक सिरा जब फुटपाथ की रेलिंग में गड़ी किसी बड़ी सी कील से जुड़ा हो तो एकबारगी किसी के भी दिमाग को हथौड़े की चोट तो लगेगी ही। दरअसल माया की माने तो ये बच्चे उसी के ही हैं।
इन बच्चों के पास ही फुटपाथ पड़ी दिख जाती है वो मैली कुचैली लड़की जो अभी कुछ महीनों पहले तक अपने पैरों पर भागती फिरती थी, जाने क्या हुआ उसे मानों दीमकों ने भीतर से खोखला कर डाला। हाथ पांवों की उभरी नसें बिलकुल दीमक की बांबियां नज़र आने लगीं, कुछ दिनों पहले तक वो कूड़ा-कचरा बीनने वाले लोगों के साथ उसी फुटपाथ पर सुट्टा मारते, ताश की पत्तियां फेंटती रहती थी लेकिन अब शरीर हांड़ मांस का पुतला भर रह गया।
भरे पूरे परिवार के साथ उसी फुटपाथ पर बस दो फिट की दूरी पर रहने वाली माया बताती है कि ये पुतला कुछ महीने पहले ममता का बोझ भी ढो चुका है। बाद में आखिर ऐसा कौन सा रोग लगा कि उसकी देह में इतनी भी कूबत नहीं बची कि वो अपने पैरों पर खुद के शरीर का भार ढो सके। माया भी अब उससे पूरी तरह उदासीन है कहती है, ‘जब मरद को ही उसकी फिकर नहीं रही तो और कोई क्या करेगा।’
वैसे भी मुंबई की रफ्तार ही कुछ ऐसी है कि यहां लोगों को खुद की पीर भी जल्द ही जब्त करनी होती है, फिर पीर पराई लोग यहां क्या जाने....।
(समूची खबर पढ़े सांझ सवेरे पर....)






