Sunday, August 14, 2011
हमको भी अरमान है दिल में....
हमको भी अरमान है दिल में
छायें हम दुनिया भर में
नयी ख़ुशी से,नए रंग में
नाम करे हम अपना जग में
हमको भी अरमान है दिल में....
जाने ये दुनिया हमको
अरमान है ये दिल के
छायें हम दुनिया भर में...
एक दिन वो आएगा
लोगों के होठो पैर नाम हमारा भी गुनगुनाएगा
हम भी इस जग के आसमान पर
सितारों की तरह चमकेंगे
अरमान हैं दिल के, छायें हम दुनिया भर में
दौड़ेगी दुनिया अपने पीछे, हमको ये अहसास है
जानेगी दुनिया हमको एक दिन, ये विश्वास है
बनेगें ऐसे दीपक हम, जो न बुझेंगे आँधियों में
अरमान है ये दिल के, छायें हम दुनियां भर में.....
छायें हम दुनिया भर में
नयी ख़ुशी से,नए रंग में
नाम करे हम अपना जग में
हमको भी अरमान है दिल में....
जाने ये दुनिया हमको
अरमान है ये दिल के
छायें हम दुनिया भर में...
एक दिन वो आएगा
लोगों के होठो पैर नाम हमारा भी गुनगुनाएगा
हम भी इस जग के आसमान पर
सितारों की तरह चमकेंगे
अरमान हैं दिल के, छायें हम दुनिया भर में
दौड़ेगी दुनिया अपने पीछे, हमको ये अहसास है
जानेगी दुनिया हमको एक दिन, ये विश्वास है
बनेगें ऐसे दीपक हम, जो न बुझेंगे आँधियों में
अरमान है ये दिल के, छायें हम दुनियां भर में.....
Friday, August 12, 2011
इंतज़ार
एक एहसास सा था, उसके आने का
सुबह उसको देखा था, प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए
लगा की वोह चड़ी होगी
ट्रेन में बैठा, बार- बार खिड़की से झांकता
की शायद वोह आ जाये,
पर अचानक एक झटका सा लगा
सिग्नल हो गया था, ट्रेन पटरी पर तैरने लगी
होती शाम के साथ
उसके आने की उम्मीद, भी डूब चुकी थी
ट्रेन की बदती रफ़्तार के साथ
मन में भी कई विचार भाग रहे थे
की पता नहीं, वोह चड़ी भी होगी या नहीं
पर अचानक, एक शोर के साथ ध्यान टूटा
ट्रेन रुकी हुई थी, और लोग कह रहे थे
इलाहाबाद आ गया
वोह कहीं नहीं थी.......
सुबह उसको देखा था, प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए
लगा की वोह चड़ी होगी
ट्रेन में बैठा, बार- बार खिड़की से झांकता
की शायद वोह आ जाये,
पर अचानक एक झटका सा लगा
सिग्नल हो गया था, ट्रेन पटरी पर तैरने लगी
होती शाम के साथ
उसके आने की उम्मीद, भी डूब चुकी थी
ट्रेन की बदती रफ़्तार के साथ
मन में भी कई विचार भाग रहे थे
की पता नहीं, वोह चड़ी भी होगी या नहीं
पर अचानक, एक शोर के साथ ध्यान टूटा
ट्रेन रुकी हुई थी, और लोग कह रहे थे
इलाहाबाद आ गया
वोह कहीं नहीं थी.......
........
इस ज़िन्दगी की दौड़ में दौड़कर करना क्या है,
जब येही जीना है, तो घुट- घुट कर मरना क्या है.......
जब येही जीना है, तो घुट- घुट कर मरना क्या है.......
Friday, July 22, 2011
Tuesday, July 12, 2011
पांडे जी.....
पांडे जी पत्रकार बनने वाले हैं
शादी की उम्र भी हो चुकी है
पांडे जी को शादी के लिये चाहिए
एक सुंदर, सुशील कमाऊं लड़की
पांडे जी सिंद्धात के पक्के हैं
वो दहेज नही मांगेगे
लेकिन लड़की वालों से सर्त होगी
की शादी में उनके बाप का
एक रूपया न खर्च हो।
हां जिस लड़की से शादी हो
उसका चरित्र एक दम ठीक होना चाहिए
साथ में वो पैसा भी कमाये
टीचर लड़की
सबसे ऊंचे पायदान पर होगी
पांडे जी के साथ हमारी शुभकामनाएं।।
शादी की उम्र भी हो चुकी है
पांडे जी को शादी के लिये चाहिए
एक सुंदर, सुशील कमाऊं लड़की
पांडे जी सिंद्धात के पक्के हैं
वो दहेज नही मांगेगे
लेकिन लड़की वालों से सर्त होगी
की शादी में उनके बाप का
एक रूपया न खर्च हो।
हां जिस लड़की से शादी हो
उसका चरित्र एक दम ठीक होना चाहिए
साथ में वो पैसा भी कमाये
टीचर लड़की
सबसे ऊंचे पायदान पर होगी
पांडे जी के साथ हमारी शुभकामनाएं।।
Saturday, June 25, 2011
गाँधी जी मुस्कुरा रहे हैं....
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
ग्राम प्रधान, बीडीओ, तहसीलदार से लेकर
डीएम, सचिव और मंत्री जी
सभी रिश्वत खा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और दलाल बन बैठे वकील, जज साहिबान
अदालतों मे हत्यारों-अपराधियों को बेझिझक छुड़ा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और आईजी, डीआईजी से लेकर
एसपी, एसएसपी और थानेदार तक
चोर-उचक्कों, डाकुओं को निर्दोष,
तो मासूम भोले-भाले लोगों को शातिर अपराधी बता
एनकाउंटर का खेल चला रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और बड.ी-बड.ी अटटालिकाओं में बैठे
सेठ-साहूकार पब्लिक को चूतिया बना रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और धरती के भगवान बन बैठे डाक्टर साहब
सरकारी अस्पताल छोड., नर्सिंग होम में
सौ का हजार दस हजार बना रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और तीस परसेंट ओवरडोज के चक्कर में इंजीनियर साहब
रददी माल को एकदम परफेक्ट बता
कान्ट्रेक्ट पर कान्ट्रैक्ट पास किए जा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और उनकोे मुस्कुराता देख, हम भी जम के मुस्कुरा रहे हैं
धोती कुर्ता स्वदेशी कौन कहे
विदेशी ब्रांड, सुपर-ब्रांड के चक्कर में, सब पगलाए जा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
नेता जी घोटालों की रिटेल चेन चला रहे हैं
और देश निकाला देकर गांधी जी को ही स्विस बैंक भेजवा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
धर्म जाति के नाम पर बंटे देश में
स्वार्थवश गुलाब के फूल के साथ मिठाई के डिब्बे
तो निःस्वार्थ भाव से चाकू तलवार गोली के गिफ्ट
खुद-ब-खुद पहुंचाए जा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और लगातार मुस्कुरा रहे हैं
मैने सोचा क्या वाकई मुस्कुरा रहे हैं
नोट को अलट-पलट कर देखा तो मुस्कुराते दिखे
ध्यान से झांक कर देखा तो भी मुस्कुराते दिखे
मैने सोचा राजघाट जाकर सीधे बापू से पूंछा जाए
आखिर क्यों मुस्कुरा रहे हैं,
जबकि देश और देशवासी सीधे गर्त की तरफ जा रहे हैं
राजघाट पहुंचा
देखा कि बापू की समाधि के चारों तरफ पानी ही पानी जमा है
सोचा बरसात का पानी होगा
पूंछा तो पता चला पानी गिरा ही नहीं, और नल वगैरह भी ठीक है
फिर ये पानी आया कैसे
ध्यान से देखा तो चौंक गया
बापू रो रहे थे
समाधि पर लिखे ’हे राम’ के नीचे से आंसू टपक रहे थे
मैने बापू से पूंछा
यहां आप रो रहे हैं
लेकिन बाकी जगह तो मुस्कुरा रहे हैं
क्यों
बापू ने कहा - बेटा क्या करूं
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है
न चाहते हुए भी पहले राष्ट्रपिता बना दिया
फिर हर जगह हंसते हुए दिखा दिया
मैं तो 47 से ही रो रहा हूं
जब
देश बंटा, देश के लोग बंटे
आचार विचार व्यवहार बंटे
आजाद देश में
जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन में
जनता पर ही अत्याचार बढे.
फिरंगियों ने नहीं
अपनों ने ही ’अपनों के लिए’ अपनों का खून लिया चूस
फिर सब कुछ ठीक दिखे, इसलिए मुझे हर जगह दिया ठूंस
मुझे जहां जितना हंसाया
मैं वाकई में वहां उतना ज्यादा रोया
आज मैं तेरा शुक्रगुजार हूं ’नाथू’
तूने मुझे पल-पल मरने से बचाया
बस मैं उस दिन को कोसता हूं
जब मैनें कहा था कि -
’मेरी आत्मा इस देश के कण-कण में बसती है’
कहते-कहते
¬’हे राम’ के नीचे से आंसुओं का सैलाब सा बहने लगा
मैं बैठा रहा, सोचता रहा
शायद
अब महात्मा की आत्मा
देश के कण-कण में नहीं
केवल राजघाट पर ही बसती है
ग्राम प्रधान, बीडीओ, तहसीलदार से लेकर
डीएम, सचिव और मंत्री जी
सभी रिश्वत खा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और दलाल बन बैठे वकील, जज साहिबान
अदालतों मे हत्यारों-अपराधियों को बेझिझक छुड़ा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और आईजी, डीआईजी से लेकर
एसपी, एसएसपी और थानेदार तक
चोर-उचक्कों, डाकुओं को निर्दोष,
तो मासूम भोले-भाले लोगों को शातिर अपराधी बता
एनकाउंटर का खेल चला रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और बड.ी-बड.ी अटटालिकाओं में बैठे
सेठ-साहूकार पब्लिक को चूतिया बना रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और धरती के भगवान बन बैठे डाक्टर साहब
सरकारी अस्पताल छोड., नर्सिंग होम में
सौ का हजार दस हजार बना रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और तीस परसेंट ओवरडोज के चक्कर में इंजीनियर साहब
रददी माल को एकदम परफेक्ट बता
कान्ट्रेक्ट पर कान्ट्रैक्ट पास किए जा रहे हैं।
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और उनकोे मुस्कुराता देख, हम भी जम के मुस्कुरा रहे हैं
धोती कुर्ता स्वदेशी कौन कहे
विदेशी ब्रांड, सुपर-ब्रांड के चक्कर में, सब पगलाए जा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
नेता जी घोटालों की रिटेल चेन चला रहे हैं
और देश निकाला देकर गांधी जी को ही स्विस बैंक भेजवा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
धर्म जाति के नाम पर बंटे देश में
स्वार्थवश गुलाब के फूल के साथ मिठाई के डिब्बे
तो निःस्वार्थ भाव से चाकू तलवार गोली के गिफ्ट
खुद-ब-खुद पहुंचाए जा रहे हैं
नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और लगातार मुस्कुरा रहे हैं
मैने सोचा क्या वाकई मुस्कुरा रहे हैं
नोट को अलट-पलट कर देखा तो मुस्कुराते दिखे
ध्यान से झांक कर देखा तो भी मुस्कुराते दिखे
मैने सोचा राजघाट जाकर सीधे बापू से पूंछा जाए
आखिर क्यों मुस्कुरा रहे हैं,
जबकि देश और देशवासी सीधे गर्त की तरफ जा रहे हैं
राजघाट पहुंचा
देखा कि बापू की समाधि के चारों तरफ पानी ही पानी जमा है
सोचा बरसात का पानी होगा
पूंछा तो पता चला पानी गिरा ही नहीं, और नल वगैरह भी ठीक है
फिर ये पानी आया कैसे
ध्यान से देखा तो चौंक गया
बापू रो रहे थे
समाधि पर लिखे ’हे राम’ के नीचे से आंसू टपक रहे थे
मैने बापू से पूंछा
यहां आप रो रहे हैं
लेकिन बाकी जगह तो मुस्कुरा रहे हैं
क्यों
बापू ने कहा - बेटा क्या करूं
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है
न चाहते हुए भी पहले राष्ट्रपिता बना दिया
फिर हर जगह हंसते हुए दिखा दिया
मैं तो 47 से ही रो रहा हूं
जब
देश बंटा, देश के लोग बंटे
आचार विचार व्यवहार बंटे
आजाद देश में
जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन में
जनता पर ही अत्याचार बढे.
फिरंगियों ने नहीं
अपनों ने ही ’अपनों के लिए’ अपनों का खून लिया चूस
फिर सब कुछ ठीक दिखे, इसलिए मुझे हर जगह दिया ठूंस
मुझे जहां जितना हंसाया
मैं वाकई में वहां उतना ज्यादा रोया
आज मैं तेरा शुक्रगुजार हूं ’नाथू’
तूने मुझे पल-पल मरने से बचाया
बस मैं उस दिन को कोसता हूं
जब मैनें कहा था कि -
’मेरी आत्मा इस देश के कण-कण में बसती है’
कहते-कहते
¬’हे राम’ के नीचे से आंसुओं का सैलाब सा बहने लगा
मैं बैठा रहा, सोचता रहा
शायद
अब महात्मा की आत्मा
देश के कण-कण में नहीं
केवल राजघाट पर ही बसती है
Wednesday, May 18, 2011
यात्रा
जीवन और पथ में, बहुत समानता है,
दोनों एक दूसरे के समानांतर, सम्कक्च,
निरंतर गति से चलने वाले, अनन्त काल तक,
जिस तरह पथ में, कई मोड़, वैसे ही जीवन में,
दोनों का अपना स्थान, मृत्यु और मंजिल,
इसलिए किसी के लिए, नित्य प्रति कुछ करना,
सार्थक है... जीवन और पथ, दोनों के लिए,
तो, लगातार बड़ते चलो, सफ़र पर,
यात्रा...........अनन्त यात्रा......
दोनों एक दूसरे के समानांतर, सम्कक्च,
निरंतर गति से चलने वाले, अनन्त काल तक,
जिस तरह पथ में, कई मोड़, वैसे ही जीवन में,
दोनों का अपना स्थान, मृत्यु और मंजिल,
इसलिए किसी के लिए, नित्य प्रति कुछ करना,
सार्थक है... जीवन और पथ, दोनों के लिए,
तो, लगातार बड़ते चलो, सफ़र पर,
यात्रा...........अनन्त यात्रा......
Monday, May 16, 2011
Sunday, May 15, 2011
तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं,
आकाश भी नीला था, बहारें भी आयीं थी,
सूरज भी निकला था, चाँद भी है,
पर एक तन्हाई है, और तो कुछ बदला नहीं,
तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं.....
पलकें भी झपकती हैं, आंसू भी टपकते हैं,
होटों पर मुस्कराहट भी है, झूठी ही सही,
तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं...
घटाएं भी हैं, फिजायें भी हैं, बहती हुई हवाएं भी हैं,
नदियों का कलरव है, पक्षियों का शोर भी है,
अगर नहीं तो तुम नहीं, तुम नहीं, तुम नहीं
और तो कुछ बदला नहीं, तुम्हारे जाने से तो कुछ बदला नहीं....
Thursday, May 12, 2011
Wednesday, May 11, 2011
Monday, May 9, 2011
रिश्ते...
रिश्ते...रिश्ते...रिश्ते...
ये कैसे हैं,
जो जन्म देते हैं, प्यार देते हैं,
काबिल बनातें हैं, और बदले में,
मांगते हैं, जान नहीं
ज़िन्दगी!
यह कैसे रिश्तें हैं....?
ये कैसे हैं,
जो जन्म देते हैं, प्यार देते हैं,
काबिल बनातें हैं, और बदले में,
मांगते हैं, जान नहीं
ज़िन्दगी!
यह कैसे रिश्तें हैं....?
Sunday, May 8, 2011
माँ की लिए...
माँ के आँचल से दूर, आज ज़िन्दगी को देखा,
घनी धूपऔर ठहरी हुई छाँव को देखा,
जब पास था तो कितना दूर था,
बात- बात पर उनका हाथ छूटता था,
आज हर डगमगाते क़दमों पर, उनका संभालना आँखों ने देखा,
गर्मी की तपती दोपहर और ठण्ड की सर्द रातों में,
आँचल की ठंडी छाँव और गर्म एहसास को देखा,
अब जब भी कभी भगवान् को देखता हूँ,
तो लगता है की आज फिर, मैंने अपनी माँ को देखा..
घनी धूपऔर ठहरी हुई छाँव को देखा,
जब पास था तो कितना दूर था,
बात- बात पर उनका हाथ छूटता था,
आज हर डगमगाते क़दमों पर, उनका संभालना आँखों ने देखा,
गर्मी की तपती दोपहर और ठण्ड की सर्द रातों में,
आँचल की ठंडी छाँव और गर्म एहसास को देखा,
अब जब भी कभी भगवान् को देखता हूँ,
तो लगता है की आज फिर, मैंने अपनी माँ को देखा..
Saturday, May 7, 2011
दिन पूरा बीत गया, जीवन की आपा- धापी में,
हमने रिश्तों की शाखों को झकझोरा भी,
कुछ बातें थी, सूखे पत्ते बनकर टूट गयीं,
कुछ यादें थी, आंसू बनकर टपक गयीं,
हमने सारी रात उन पत्तों की आग को तापा भी,
कुछ बूँदें थी, खारे पानी की,
जो उस आग में जलकर धुंआ हुई,
अभी कुछ पत्ते बचे हैं शाखों पर,
इस उम्मीद से की,
अभी कुछ हरियाली की तासीर, बचीं है उन पर।
हमने रिश्तों की शाखों को झकझोरा भी,
कुछ बातें थी, सूखे पत्ते बनकर टूट गयीं,
कुछ यादें थी, आंसू बनकर टपक गयीं,
हमने सारी रात उन पत्तों की आग को तापा भी,
कुछ बूँदें थी, खारे पानी की,
जो उस आग में जलकर धुंआ हुई,
अभी कुछ पत्ते बचे हैं शाखों पर,
इस उम्मीद से की,
अभी कुछ हरियाली की तासीर, बचीं है उन पर।
Friday, May 6, 2011
कभी किसी के लिए कुछ नहीं किया...
किसी के लिए कभी कुछ नहीं किया,
किसी के आंसू नहीं पोछे, किसी का दुःख नहीं बांटा,
केवल दौड़ता रहा, अपनी चाहतों, अपने सपनो को पूरा करने के लिए,
भागते- भागते पता ही नहीं चला, की कब माथे पर बल पड़ गए,
और शरीर कांपने लगा, लकीरें खिंच आयी थी चेहरे पर,
आँखें गहरी हो गयीं, और एक शून्य सा पसर गया,
तब लगा एक जीवन व्यर्थ ही बीत गया...
किसी के आंसू नहीं पोछे, किसी का दुःख नहीं बांटा,
केवल दौड़ता रहा, अपनी चाहतों, अपने सपनो को पूरा करने के लिए,
भागते- भागते पता ही नहीं चला, की कब माथे पर बल पड़ गए,
और शरीर कांपने लगा, लकीरें खिंच आयी थी चेहरे पर,
आँखें गहरी हो गयीं, और एक शून्य सा पसर गया,
तब लगा एक जीवन व्यर्थ ही बीत गया...
Monday, May 2, 2011
यह मै हूँ.... सिर्फ मै....
मेरे साथ ऐसा क्यों होता आया,
वही दूर हो गए जिन्हें अपना कहता आया,
चलो छितिज के उस पार चलें जायें,
शायद सबंधों की कोई राह निकल आये,
इधर वालों के साथ तो पल भर के थे,
उधर वाले शायद जीवन भर साथ निभाएं...
जिन्हें आजीवन मै अपना कहता रहा,
वही न कभी मेरे हो सके,
जिन्हें चाहता रहा उम्र भर,
वही भुला कर चल दिए
फिर भी प्यार की तलाश में भटक रहा हूँ मै,
कहीं राह में कोई हाथ पसारे मिल जाये...
कहीं टूट कर भिकार न जाऊं ये डर है मुझे,
जीवन भर मुझे आंसुओं ने पिघलाया,
जिन आंसुओं को मै पोचता आया,
जीवन भर शायद उन्हीं ने रुलाया,
फिर भी मै प्यार पाना चाहता हूँ,
क्योंकि यह मै हूँ....
सिर्फ मै...
मेरे साथ ऐसा क्यों होता आया,
वही दूर हो गए जिन्हें अपना कहता आया,
चलो छितिज के उस पार चलें जायें,
शायद सबंधों की कोई राह निकल आये,
इधर वालों के साथ तो पल भर के थे,
उधर वाले शायद जीवन भर साथ निभाएं...
जिन्हें आजीवन मै अपना कहता रहा,
वही न कभी मेरे हो सके,
जिन्हें चाहता रहा उम्र भर,
वही भुला कर चल दिए
फिर भी प्यार की तलाश में भटक रहा हूँ मै,
कहीं राह में कोई हाथ पसारे मिल जाये...
कहीं टूट कर भिकार न जाऊं ये डर है मुझे,
जीवन भर मुझे आंसुओं ने पिघलाया,
जिन आंसुओं को मै पोचता आया,
जीवन भर शायद उन्हीं ने रुलाया,
फिर भी मै प्यार पाना चाहता हूँ,
क्योंकि यह मै हूँ....
सिर्फ मै...
Tuesday, April 26, 2011
Monday, April 18, 2011
वो कहती है सुनो जाना/ मोहब्बत मोम का घर है / तपिश बदगुमानी की / कहीं पिघला न दे इसको. मै कहता हूँ की जिस दिल में / ज़रा सी बदगुमानी हो/ वहां कुछ और हो तो हो / मोहब्बत हो नहीं सकती . वो कहती है की तुम मुझको /सदा ऐसे ही चाहोगे / की मै इसमें कोई कमी/ गवारां कर नहीं सकती. मै कहता हूँ की मोहब्बत क्या है/ ये तुमने सिखाया है / मुझे तुमसे मोहब्बत के / सिवा कुछ और नहीं आता. वो कहती है जुदाई से बहुत डरता है मेरा दिल / की तुमसे हटकर खुद को देखना / मुमकिन नहीं है अब . मै कहता हूँ / येही कुछ है / जो मुझको सताते हैं / मगर मोहब्बत में / जुदाई साथ चलती है . वो कहती है / क्या मेरे बिन जी सकोगे तुम / मेरी यादें मेरी बातें / भुला सकोगे तुम. मै कहता हूँ /की कभी इस बात को / सोचा नहीं मैंने / अगर पल भर को भी सोचूं / तो सांसे रुकने लगाती है. वो कहती है / की तुम्हे मोहब्बत इस कदर क्यों है मुझसे /की एक आम सी लड़की / तुम्हे क्यूँ ख़ास लगती है . मै कहता हूँ / की मेरी आँखों से खुद को देखो / ये दीवानगी क्यों है / ये खुद ही जान जाओगे. वो कहती है / की मुझे इस बारिताफ्गी से देखते क्यों हो / की मै खुद को बहुत कीमती/ महसूस करती हूँ. मै कहता हूँ / मदये जान बहुत अनमोल होती है / तुम्हे जब देखता हूँ ज़िन्दगी/ महसूस होती है. वो कहती है / मुझे अलफ़ाज़ के जुगनू नहीं मिलते / बता सकूं की दिल में मेरे कितनी मोहब्बत है . मै कहता हूँ / मोहब्बत तो निगाहों से झलकती है / तुम्हारी ख़ामोशी तुम्हारी बात करती है . वो कहती है / बताओ न किसे खोने से डरते हो / वो कौन है बताओ / जिसे मौसम बुलाते हैं . मै कहता हूँ / की ये शायरी है / आइना मरे दिल का / बताओ इसमें तुमको क्या नज़र आता है . वो कहती है / “मान” बातें तुम खूब बनाते हो / मगर ये सच है ये बातें / शान रखती है. मै कहता हूँ / ये बातें फ़साने एक बहाना है / की पल कुछ जिंदगानी के तुम्हारे साथ कट जायें / फिर उसके ख़ामोशी का दिलकश रब्ज होता है / निगाहें घूरती हैं बस / और लफ्ज़ खामोश होते हैं ।
Sunday, April 10, 2011
अन्ना के जन आन्दोलन से निराश लोगो का वार

अन्ना के जन आन्दोलन से निराश लोगो का वार
इलाहबाद में डॉक्टर बनवारी लाल शर्मा के नेतृत्व में एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन संचालित होता है, उस आन्दोलन का अभी क्या हश्र है मुझे पता नहीं पर सन १९९९ तक तो वह राष्ट्रीय मंचो पर रेखांकित किया जाता था. उस दौरान आन्दोलन का सक्रिय भागीदार होने के नाते मै आन्दोलन के भीतरी पेंचोखम से वाकिफ रहता था. आन्दोलन के जरिये देश के तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी जुडाव रहा करता था, जिसमे श्री सुन्दर लाल बहुगुणा, मेधा पाटेकर, पद्मश्री आर अस गहलौत जी जैसे दिग्गजों के अलावा बाबा रामदेव की भी गतिविधियों से हम लगातार वाकिफ रहते थे. बाद में आन्दोलन में हमारे वरिस्थ साथी स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी, आन्दोलन से किन्ही वैचारिक कारणों से अलग हो बाबा रामदेव से जुड़ गए. उस समय तक बाबा स्वदेशी राग की शुरुआत कर रहे थे. स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी एक अद्भुत वक्कता थे जो अपनी शोधपरक ओजस्वी वाणी से श्रोताओ में जूनून भर देते थे. इलाहबाद से चल रहे आन्दोलन के वो स्टार हुआ करते थे.
इतनी बातों के बाद अब मै मुद्दे पर आता हु, श्री अन्ना हजारे जी के देशव्यापी आन्दोलन और उसको मिली अपार सफलता से बहुत सारे सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिज्ञों को अपनी लेट लतीफी से भरी निराशा हुई है, चूकि भ्रस्ताचार इस सारे ही लोगो का अहम् मुद्दा रहा है जिसपर बाते करके इनका आन्दोलन चमका करता था. परन्तु अन्ना जी ने जो किया उसके बाद इनके हाथ से यह मुद्दा पूरी तरह से सरक गया. अब मजबूर होकर इन्हें अन्ना हजारे के पीछे चलना पद रहा है. परन्तु इस तरह के लोग मौका देखकर अपनी भड़ास और निराशा निकालने से नहीं चूक रहे, आज भी इनको देश से ज्यादा अपनी व्यक्तिगत महत्वाकान्षा बड़ी लग रही है, जिसकी परिणति में वंशवाद और आपसी फूट जैसे वक्तव्य दिए जा रहे है,
जहाँ तक सवाल बाबा रामदेव का है तो मूलतः वो योग गुरु ही है जो स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी और स्वदेसी आंदोलनों के प्रभाव में आकर स्वदेसी हो गए, और ये अच्छी बात है, परन्तु १२- १३ सालों के दौरान भी अभी तक बाबा जी के पास इस सम्बन्ध में अपने निजी तर्कों का आभाव ही रहा है, हाल ही में हुई राजीव दीक्षित जी के असामयिक निधन के बाद यह चीज़ कई बार मुखर होकर सामने आई है. ऐसा इसलिए क्यूंकि स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी स्वदेशी विचारों का चलता फिरता इन्सैक्लोपीदिया थे, स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के बाद शायद बाबा के पास अब कोई अच्चा सलाहकार नहीं रहा इसीलिए अब बाबा इस तरह के गैर जिम्मेदाराना ढंग से बयानबाजी कर रहे है.
योग गुरु चाहें तो इस आन्दोलन को समर्थन देकर भी विश्व के सामने नजीर पेश कर सकते हैं, उनके पूरे मन से देश की जनता का साथ देने से वास्तव में भारत विश्व शकक्ति बन जायेगा, और यही तो बाबा का भी सपना है, बल्कि इससे उनकी साख को चार चाँद ही लगने वाले हैं,
अगर इस तरह के समाजसेवी और राजनीतिज्ञ वास्तव मै देशहित को सर्वोपरि मानते है तो उन्हे अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को काबू में कर एक मंच पर आना ही होगा. और जनांदोलन को कमज़ोर करने वाले वक्तव्यों को छोड़ भ्रस्ताचार के खात्मे की इस मुहीम को इसके अंतिम लक्ष्य तक पहुचाना होगा.
Thursday, April 7, 2011
ख़बरदार...
76 साल के उस बुजुर्ग की हिम्मत तो देखिए किस कदर न्योछावर करने पर तुला है अपने आपको..., “दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए” को चरितार्थ कर रहे उस एक सिपाही का विश्वास तो देखिए जिसने साफ कर दिया कि जान जाए तो जाए लेकिन करप्शन से बूढ़ी हड्डियां टकराती रहेंगी...सच में इतिहास बनने जा रहें हैं अन्ना...और मैं बना रहा हूं अपने आपको उस इतिहास का हिस्सा...करप्शन के खिलाफ इस मुहिम में शामिल है मेरा तन मन धन..और ये चंद पंक्तियां...इंकलाब ज़िंदाबाद...
सच्चाई की हुंकार है सरकार ख़बरदार
सरकार ख़बरदार और सरदार ख़बरदार।
अन्ना की ये हुंकार लील जाएगी तुमको
आ कर मुकाबला तू भ्रष्टाचार ख़बरदार..।
काहिरा जला तबाह लीबिया हुआ
दरकार सबक की है मेरे यार ख़बरदार।
तुमने बहुत लिखे हैं मुहब्बत के गीत अब
कुछ क्रांति लिखो ऐ कलमगार ख़बरदार।
सच्चाई की हुंकार है सरकार ख़बरदार
सरकार ख़बरदार और सरदार ख़बरदार।
अन्ना की ये हुंकार लील जाएगी तुमको
आ कर मुकाबला तू भ्रष्टाचार ख़बरदार..।
काहिरा जला तबाह लीबिया हुआ
दरकार सबक की है मेरे यार ख़बरदार।
तुमने बहुत लिखे हैं मुहब्बत के गीत अब
कुछ क्रांति लिखो ऐ कलमगार ख़बरदार।
Friday, March 18, 2011
बेहतरीन पारी
....और इस तरह चाय बैठकी ने पूरे कर लिए है पचास फोलोवेर्स ........चाय बैठकी ने बहुत ही बेहतरीन पारी खेली है ......मैदान के चारों कोनों से फोलोवेर बटोरते हुये उसने पूरे किये हैं ये पचास फोलोवेर्स ....हालांकि ये फोलोवेर्स बटोरने में बैठकी ने काफी समय का सामना किया .....लेकिन उसके बनाये गए ये पचास फलोवेर टीम के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं .... अब देखना ये होगा कि टीम के बाकी सदस्य फलोवेर्स का लम्बा स्कोर खड़ा करने में चाय बैठकी का कितना साथ निभा पाते हैं .......फ़िलहाल ब्लोगिंग की पिच पे बैठकी का भरपूर साथ निभा रहे हैं उनके साथी और धुरंधर बैठक-बाज "सुमीत दिवेदी ".............
Saturday, January 29, 2011
तुम्हारी यादें...
बहुत सहेज कर रखी हैं
तुम्हारी यादें
अब भी वैसी ही हैं
जैसे तुमने दिया था
लेकिन इसमें अंकित शब्द
अतीत के हाथों, कुछ तुम्हारे हाथों,
स्वयं मेरे ही हाथों
मारे जा चुके हैं
इन मृत शब्दों की
अंत्येष्टि में आमंत्रित हो तुम
क्योंकि तुम्हारी श्रद्धांजलि ही
उन्हें मोक्ष दिला सकती है
उन्हें स्वर्गिक बना सकती है
अविनाश गौतम...
तुम्हारी यादें
अब भी वैसी ही हैं
जैसे तुमने दिया था
लेकिन इसमें अंकित शब्द
अतीत के हाथों, कुछ तुम्हारे हाथों,
स्वयं मेरे ही हाथों
मारे जा चुके हैं
इन मृत शब्दों की
अंत्येष्टि में आमंत्रित हो तुम
क्योंकि तुम्हारी श्रद्धांजलि ही
उन्हें मोक्ष दिला सकती है
उन्हें स्वर्गिक बना सकती है
अविनाश गौतम...
Friday, January 21, 2011
विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन
विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन
धरती पे भूंचाल आया था उस दिन
मुझे देख सूरज को गश आ गया था
मेरे रूप पर चाँद चकरा गया था
मैं तारीफ़ अपनी करूँ या खुदा की
तकदीर के लेख लिखने थे बाकी
लिखा उसने ये कोई लीडर बनेगा
वकालत करेगा पीडर बनेगा
ये बिगड़ेगा कम, और अक्षर बनेगा
मिलिटरी या नेवी का अफसर बनेगा
बनेगा प्रतिदिन ये घोड़ों का मालिक
हज़ारों का लाखों का करोड़ों का मालिक
ये दुनिया में हल चल मचाता रहेगा
सदा मुफ्त का माल खाता रहेगा
सभी वार है इसके हक में अक्सर
ब्रहस्पति, को बुधवार, शुक्र शनिश्चर
पढ़ा लेख मैंने विधाता का लिखा
शनिश्चर की नी को गलत उसने लिखा
मैं बोला आपने लिखा नी गलत है
शनिश्चर में लिखना बड़ी ई गलत है
वो बोले तू क्यों तर्क कर रहा है
बड़ी छोटी ई में फर्क कर रहा है
अभी तो तू पैदा भी नहीं हुआ है
तुझे क्या पता ये गलत या सही है
करेगा अनजान तू क्या जन्म पाकर
मेरी पोल खोलेगा दुनिया में जाकर
तेरे भाग्य को मैं तो चमका रहा था
शनिश्चर से ले के इतवार तक आ रहा था
जो तू चाहता है, वही कर रहा हूँ
बड़ी ई की गलती सही कर रहा हूँ
इसे ठीक लिखता हूँ मैं तेरे सर पर
शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर
दिया शाप उसने यूं गुस्से में आकर
नहीं चैन पायेगा धरती पे जाकर
जन्म ले के यूं ही विचरता रहेगा
सदा जिंदगी में गलतियाँ ठीक करता रहेगा
फटे हाल होगा, फटीचर रहेगा
उम्र भर तो हिंदी का टीचर रहेगा
--अज्ञात
धरती पे भूंचाल आया था उस दिन
मुझे देख सूरज को गश आ गया था
मेरे रूप पर चाँद चकरा गया था
मैं तारीफ़ अपनी करूँ या खुदा की
तकदीर के लेख लिखने थे बाकी
लिखा उसने ये कोई लीडर बनेगा
वकालत करेगा पीडर बनेगा
ये बिगड़ेगा कम, और अक्षर बनेगा
मिलिटरी या नेवी का अफसर बनेगा
बनेगा प्रतिदिन ये घोड़ों का मालिक
हज़ारों का लाखों का करोड़ों का मालिक
ये दुनिया में हल चल मचाता रहेगा
सदा मुफ्त का माल खाता रहेगा
सभी वार है इसके हक में अक्सर
ब्रहस्पति, को बुधवार, शुक्र शनिश्चर
पढ़ा लेख मैंने विधाता का लिखा
शनिश्चर की नी को गलत उसने लिखा
मैं बोला आपने लिखा नी गलत है
शनिश्चर में लिखना बड़ी ई गलत है
वो बोले तू क्यों तर्क कर रहा है
बड़ी छोटी ई में फर्क कर रहा है
अभी तो तू पैदा भी नहीं हुआ है
तुझे क्या पता ये गलत या सही है
करेगा अनजान तू क्या जन्म पाकर
मेरी पोल खोलेगा दुनिया में जाकर
तेरे भाग्य को मैं तो चमका रहा था
शनिश्चर से ले के इतवार तक आ रहा था
जो तू चाहता है, वही कर रहा हूँ
बड़ी ई की गलती सही कर रहा हूँ
इसे ठीक लिखता हूँ मैं तेरे सर पर
शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर शनिश्चर
दिया शाप उसने यूं गुस्से में आकर
नहीं चैन पायेगा धरती पे जाकर
जन्म ले के यूं ही विचरता रहेगा
सदा जिंदगी में गलतियाँ ठीक करता रहेगा
फटे हाल होगा, फटीचर रहेगा
उम्र भर तो हिंदी का टीचर रहेगा
--अज्ञात
Friday, December 31, 2010
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
------------------------------------------------------------- अदम गोंडवी
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !
------------------------------------------------------------- अदम गोंडवी
Saturday, November 13, 2010
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