( इलाहाबाद विश्वविद्यालय का पहला अंतराष्ट्रीय पुरातन छात्र सम्मेलन 16-17-18 फरवरी को हुआ। किसी वजह से इसमें मैं जा नहीं पाया। इस पुरातन छात्र सम्मेलन की पत्रिका के लिए मुझसे भी विश्वविद्यालय में मेरे विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दिनों के बारे में लेख मांगा गया था। जो, विश्वविद्यालय की पत्रिका में छपा है। मैं यहां वो लेख वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं। ये लेख इस बात पर भी मेरे विचार हैं कि पढ़ाई के साथ छात्र राजनीति कितनी सही है। मुझे लगता है कि इलाहाबादी चाय बैठकी के लिए ये प्रासंगिक हो सकता है और बैठकी में बहस भी इस पर हो सकती है।)
पढ़ाई हमेशा अच्छे भविष्य और मजबूत व्यक्तित्व की बुनियाद होती है। और, मैंने जो, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी पढ़ाई के दौरान पाया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों का गजब का व्यक्तित्व विकास होता है। मैं आज जो कुछ भी हूं उसका बड़ा योगदान इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे पढ़ाई के 7 साल रहे हैं।
मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कोई भी चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन, पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ चुनावों में सक्रिय हिस्सेदारी की वजह से मैं उन्हीं दिनों देश की संसदीय परंपरा से भली-भांति वाकिफ हो गया था। 1993-2000, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस संक्रमण काल के आखिरी दौर में गिना जा सकता है जिसकी एक दशक पहले शुरुआत हुई थी। उस समय तक सत्र देरी से चल रहे थे। विश्वविद्यालय में पढ़ाई का सत्र तो देरी से चल ही रहा था। छात्रसंघ के चुनाव भी समय पर नहीं हो रहे थे। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPCS) के भी 3-3 पुराने सत्रों के परिणाम एक के बाद एक आ रहे थे। यानी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर आगे की योजना बनाने वाले छात्र-छात्राएं, चुनाव लड़कर-जीतकर आगे संसद-विधानसभा का रुख करने की चाहत रखने वाले छात्रनेता और IAS-PCS बनकर किसी जिले में अपनी काबिलियत दिखाने की हसरत रखने वाले छात्र सभी के लिए ये संक्रमण काल था। उस समय ये बात ज्यादा समझ में नहीं आती थी।
खैर, 1996 के बाद से सत्र धीरे-धीरे फिर पटरी पर आने लगे थे। 1998 में शायद ही कोई सत्र लेट रहा हो। 6 महीने के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर वी डी गुप्ता और उसके बाद आए कुलपति प्रोफेसर चुन्नीलाल क्षेत्रपाल ने विश्वविद्यालय को पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले लिए। बीस-बीस सालों से छात्रावस के कमरे में कब्जा जमाए बैठे बूढ़े छात्रों को कमरों से बाहर निकालकर नए छात्रों को मेरिट के आधार पर कमरे मिलने लगे।
एक वाकया जो मुझे याद आ रहा है। विश्वविद्यालय में सत्र की देरी से परेशान छात्रों और छात्रनेताओं का एक वर्ग इस बात के लिए पूरी तरह से मन बना चुका था कि अब किसी भी कीमत पर परीक्षा में देरी नहीं होने दी जाएगी। प्रोफेसर चुन्नी लाल क्षेत्रपाल भी इस फैसले पर मजबूत बना चुके थे कि परीक्षा नहीं टाली जाएगी चाहे जो, हो। लेकिन, सस्ती लोकप्रियता के लिए छात्रनेता, छात्रों के एक वर्ग ने कुलपति पर विधि की परीक्षाएं फिर से टालने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद परीक्षा विरोधी और परीक्षा समर्थक खेमों ने विश्वविद्यालय परिसर में रजिस्ट्रार ऑफिस के सामने अगल-बगल ही मंच लगाकर भाषण करना शुरू कर दिया। भाषण का दुखद अंत मारपीट के साथ हुआ लेकिन, परिणाम सुखद ये रहा कि परीक्षा नियत समय पर ही हुई।
खैर, लोक सेवा आयोग चौराहा और यूनिवर्सिटी के सामने से साइंस फैकल्टी तक जाने वाली सड़क पर आए दिन धरना प्रदर्शन आम बात थी। लेकिन, एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा अपील करती थी कि कहीं भी किसी धरना प्रदर्शन में मुझे ये याद नहीं आ रहा है कि कहीं भी छात्रों ने आंदोलन के दौरान आम लोगों को परेशान किया हो। यही वजह है कि इलाहाबाद अकेला शहर होगा जहां, परिवारों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलनों को मदद मिलती रही है।
बूढ़े-बुजुर्ग (कहलाते सब छात्रनेता ही थे) नेता परिसर में छात्रों के हितों का बीड़ा उठाए घूमते थे। लेकिन, मुझे अपने समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेताओं की एक अच्छी बात ये थी कि दुर्गुणों (शराब, सिगरेट, अपराध) का आरोप शायद ही किसी छात्रनेता पर लगा हो। परिसर में एक साथ अगर 10-12 नौजवानों के बीच में कोई एक खद्दरधारी घूम रहा है तो, आसानी से समझ में आ जाता था कि कोई छात्रनेता चल रहा है। और, अगर एक ही उम्र के ढेर सारे लड़के चुहल करते घूम रहे हैं और किसी एक लड़के के लिए बीच-बीच में नारे भी लगा रहे हैं तो, मतलब साफ है अगले चुनाव के लिए एक नया छात्रनेता तैयार हो रहा है।
चुनाव और परीक्षा के सत्र में देरी की वजह से 1995 के चुनाव तक ज्यादा बुजुर्ग हो चुके छात्रनेताओं (35-45 साल) के बीच नए छात्रनेताओं (20-28 साल) की भी पूरी जमात तैयार हो चुकी थी। उस समय ये भी चर्चा शुरू हो गई थी कि छात्रसंघ चुनाव लड़ने की उम्रसीमा अधिकतम 28 साल होनी चाहिए। मुझे याद है गोरखपुर में 25 साल की उम्रसीमा लागू की गई तो, वहां के छात्रसंघ के महामंत्री जो, अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ना चाहते थे, उम्रसीमा में थोड़ी छूट के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय में याचिका दाखिल करने आए थे। उनकी उम्र 26 साल हो चुकी थी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यालय के नीचे खड़े होकर वो पान खा रहे थे कि तभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष का चुनाव लड़ने वाले 2 (40 साल के ऊपर के) बुजुर्ग छात्रनेता वहां आ गए। उनको देखने के बाद गोरखपुर से उम्रसीमा में छूट के लिए आए छात्रनेता ने चुनाव लड़ने का इरादा त्याग दिया और बिना याचिका दाखिल किए ही लौट गए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में किसी के छात्रनेता बनने की भी शुरुआत बड़े रोचक तरीके से होती थी। पिछले चुनाव मे किसी छात्रनेता के पीछे की सबसे सक्रिय मंडली में से किसी एक को अगला चुनाव लड़ाने की तैयारी हो जाती थी। तर्क ये कि जब हम पुराने छात्रनेता के लिए 100 वोट जुटा सकते हैं तो, अपने साथी के लिए तो, 500 वोट जुटा ही लेंगे। कुछ इसी तरह से हम लोगों की 40-50 लोगों की एक जबरदस्त छात्रों की मंडली (इसमें मेरे जैसे इलाहाबाद में अपने घर में रहने वाले और बाहर के जिले, प्रदेश से आकर छात्रावास या डेलीगेसी में रहने वाले छात्र थे।) ने भी अपने साथ के मनीष शुक्ला को चुनाव लड़ा दिया। मनीष बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बैनर से चुनाव लड़े और फिर बहुत ही कम समय में भारतीय जनता युवा मोर्चा के रास्ते जौनपुर की खुटहन विधानसभा का चुनाव लड़ा। कुछ यही तरीका होता है इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रनेता के चुने जाने का। यानी एकदम लोकतांत्रिक तरीका।
इलाहाबाद को लोकतंत्र की मैं सबसे मजबूत पाठशाला कह रहा हूं तो, इसके पीछे वहां के छात्रों के चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने और अपना नेता चुनकर उसे जिताने तक की बात कर रहा हूं। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अलावा इलाहाबाद विश्वविद्यालय देश का अकेला विश्वविद्यालय होगा जहां, आमने-सामने छात्र नेताओं के मंच लगते हैं। स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहस होती है।
विश्वविद्यालय मार्ग पर चुनाव के एक दिन पहले लगने वाले ये मंच नेता की जीत-हार का पैमाना तय करते हैं। छात्रनेता के समर्थन में पुराने-नए छात्रनेता, पूर्व पदाधिकारी आकर भाषण देते हैं और माना जाता था कि जिसका मंच सबसे बाद तक टिका रहता उसका चुनाव जीतना लगभग तय हो जाता था। जैसे किसी लोकसभा चुनाव में नेता के पक्ष में राष्ट्रीय, राज्य के नेताओं की मीटिंग होती है ठीक वैसे इलाहाबाद में दिल्ली, जेएनयू, बीएचयू या प्रदेश के दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ पदाधिकारी भी अपने प्रत्याशियों के प्रचार में आते थे।
इलाहाबाद की लोकतंत्र की पाठशाला की एक और अद्भुत बात जो, मैं जोड़ रहा हूं वो, हैं यहां के छात्रसंघ चुनाव में निकलने वाला मशाल जुलूस। मशाल जुलूस विश्वविद्यालय मार्ग पर लगे मंचों से नेताओं का भाषण खत्म होने के बाद शुरू होता था। फिर समर्थ प्रत्याशी अपने चुनाव कार्यालय से बांस की खपची, जला तेल, कपड़ा और मिट्टी से बनी कुप्पी जैसी मशाल लेकर निकलते थे। हर प्रत्याशी के जुलूस के बीच में दो ट्रॉली पर अतिरिक्त जला तेल होता था जो, बुझती मशाल को आखिर तक जलाए रखने में मदद करता था। ये मशाल जुलूस अगली सुबह होने वाली चुनाव की दिशा तो तय करता ही थी। लड़कों के लिए ये महिला छात्रावास में बिना रोक घुसने का एक लाइसेंस भी था। लड़कियों के छात्रावास के दरवाजे खुले होते थे। अपने से तय नियम के मुताबिक, एक-एक जुलूस अंदर जाते थे और लड़कियों की ओर से फेंकी गई फूल-मालाओं के साथ थोड़ा और उत्साह से भरकर वापस आ जाते थे। वैसे, ये परंपरा इलाहाबाद में जसबीर सिंह के एसपी सिटी रहने के समय पहले आरएएफ के घेरे में बंधी फिर टूट गई। वैसे, मैंने उद्दंड से उद्दंड छात्रों को भी कभी इस दौरान लड़कियों के छात्रावास में कोई बद्तमीजी करते नहीं देखा था। लोकतंत्र की एक और बेहतर मिसाल।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में चुनाव लड़ने वाले छात्रनेता का चुनाव क्षेत्र एक संसदीय क्षेत्र से भी बड़ा होता है। मेरा घर इलाहाबाद में है। लेकिन, मैंने इलाहाबाद की गलियों को, मोहल्लों को नजदीक से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चुनावों के दौरान ही देखा। परिसर के मुद्दों के अलावा जाति, क्षेत्र, छात्रावास, डेलीगेसी इन सभी मुद्दों पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं को बैलेंस करके चुनाव जीतना होता था। इलाहाबाद में मेरे समय में दक्षिणपंथी छात्र संगठन और वामपंथी छात्र संगठन दोनों ही काफी सक्रिय रहते थे। वामपंथी छात्र संगठनों की वोटों की मामले स्थिति काफी पतली रहती थी जबकि, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मेरे समय में बहुत ही मजबूत स्थिति में था। लेकिन, सेमिनार, धरना-प्रदर्शन पर हर तरह के छात्र संगठनों की मौजूदगी परिसर और परिसर के बाहर निरंतर बनी रहती थी। इस सबके बावजूद आज संसदीय चुनावों को बेहतर करने के लिए जिस बात की सबसे ज्यादा वकालत की जा रही है वो, मेरे समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में खुद ही चल रही व्यवस्था का हिस्सा बन गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बैनर कभी चुनाव नहीं जिता पाता था। मजबूत व्यक्तित्व चुनाव जीतने की पहली शर्त होता था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मिलने अनुभवों के आधार पर ही मेरा ये मजबूत विश्वास है कि पढ़ाई के दौरान हर लड़के-लड़की को किसी न किसी छात्र संगठन से जरूर जुड़ना चाहिए। भले ही वो राइटिस्ट हो, लेफ्टिस्ट हो या फिर सोशलिस्ट हो। क्योंकि, किसी छात्र संगठन में काम करने से सोचने और किसी बात पर प्रतिक्रिया देने की जो आदत बनती है वो, ताउम्र जिंदगी का अहसास दिलाती रहती है।
छात्रसंघ चुनावों के नोटीफिकेशन के साथ ही परिसर में न्यासी मंडल के आदेश ही काम करते थे। छात्रसंघ चुनाव कब होंगे, कितने दिनों तक प्रचार हो सकेगा। प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या होगी, ये सब तय करना न्यासी मंडल का काम होता था। न्यासी मंडल का अध्यक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त जैसी भूमिका में होता था। प्रोफेसर जी के राय को इस बात का जबरदस्त अनुभव है क्योंकि, 1995 के बाद से वो लगातार इस कुर्सी को संभाले हुए हैं। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, उपमंत्री और प्रकाशनमंत्री संसद के मंत्रिमंडल जैसे माने जा सकते हैं जिनका सीधा चुनाव होता है और छात्रावास तथा डेलीगेसी से चुने जाने वाले सदस्य विश्वविद्यालय की संसद के संसद सदस्य जैसे होते हैं।
छात्रसंघ चुनावों के दौरान होने वाल भाषणों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के आत्मविश्वास का अंदाजा लगाया जा सकता है। उस समय हर दूसरा वक्ता चुनाव में इस बात का जिक्र जरूर करता था कि जैसे पंजाब में गेहूं की फसल होती है वैसे ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय से IAS, PCS निकलते हैं। इतना ही नहीं ये भी जरूर गिनाया जाता था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने देश को कई प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्यपाल और एक से बढ़कर एक विद्वान, साहित्यकार, पत्रकार दिए हैं। लेकिन, इसी गुमान में विश्वविद्यालय में एक जो सबसे खराब बात हुई थी कि ये विश्वविद्यालय बदलते भारत के साथ खुद को बदल नहीं रहा था। नॉसट्रैल्जिया में जी रहा था। लेकिन, हमारे विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते विश्वविद्यालय में सुधार की प्रक्रिया का पहला चरण लगभग पूरा हो चुका था।
विश्वविद्यालय में इसके पहले भी पुरातन छात्र सम्मेलन होते रहे हैं। लेकिन, 16 से 18 फरवरी तक ये विश्वविद्यालय का पहला अंतरराष्ट्रीय पुरा छात्र सम्मेलन हुआ है। शायद इस मामले में भी ये पहला होगा कि इस बार कोई बुजुर्ग छात्रसंघ अध्यक्ष, महामंत्री पुरा छात्र सम्मेलन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक करियर को दुरुस्त करने के लिए नहीं कर रहे हैं। बल्कि, ये पुरा छात्र सम्मेलन इस विश्वविद्यालय को उन दिनों की याद दिलाएगा जब ये देश में ऑक्सफोर्ड का प्रतिमान विश्वविद्यालय माना जाता था। वैसे ये प्रतिमान मेरे जैसों को तब भी बुरा लगता था, अब भी बुरा लगता है। क्योंकि, मेरा मानना है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वो सारी काबिलियत है जिसके बूते ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को इस विश्वविद्यालय से उपमा लेनी पड़े। और, ये पुरातन छात्र सम्मेलन इस आंदोलन की शुरुआत हो सकती है।
विश्वविद्यालय के अब के कुलपित प्रोफेसर राजेन हर्षे से मेरी जो एक मुलाकात हुई है और जो उनके बारे में मेरी राय बनी है वो, ये कि प्रोफेसर हर्षे किसी भी तरह सबसे पहले विश्वविद्यालय की माली हालत ठीक करना चाहते हैं। आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। यही वजह है कि विश्वविद्यालय में ढेर सारे नए वोकेशनल कोर्सेज शुरू हो चुके हैं। जो, विश्वविद्यालय के बदलते भारत यानी यंग इंडिया के साथ कदम मिलाने का संकेत दे रहा है। मैं उम्मीद करता हूं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बंद पड़ा जर्नलिज्म डिपार्टमेंट भी जल्द ही शुरू हो सकेगा।
प्रोफेसर हर्षे से बस मेरा एक अनुरोध है कि वो, इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ को भारतीय लोकतंत्र की मजबूत पाठशाला बने रहने के लिए भी जरूरी फैसले लें। पढ़ाई में राजनीति का घालमेल नहीं होना चाहिए। लेकिन, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को चलाने वाले नेता अच्छी पढ़ाई करेंगे और लोकतंत्र के सबक अच्छे से सीखेंगे तभी वो, अच्छे नेता बन सकेंगे। इसके लिए जरूरी पहल इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे परिसरों से ही हो सकती है। और, प्रोफेसर हर्षे जैसे विजनरी कुलपति ही पढ़ाई और राजनीति दोनों में बेहतर तालमेल का फॉर्मूला तलाश सकते हैं।
Wednesday, April 9, 2008
Tuesday, April 8, 2008
संजू बाबा और टीआरपी के लड्डू...!!!
मुझे याद है मुम्बई के वर्सोवा इलाके का वह बद्रीनाथ टावर। वही बद्रीनाथ टावर जहाँ उस दिन तमाम न्यूज़ चैनलों की ओबी वैन सुबह से ही मुस्तैद थी। तमाम रिपोर्टर और कैमरामैन साँस रोके खड़े थे। इंतज़ार इस बात का था कि कब अपने मुन्ना भाई और उनकी नई- नवेली दुल्हन के दीदार हों। बिल्डिंग के बाहर दरवाजे पर टकटकी लगाए पत्रकारों की इस बेचैनी से शायद संजू बाबा भी वाकिफ थे। लाल जोड़े में अपनी दुल्हन ( 'तथाकथित' शब्द जोड़ देना बेहतर होगा) मान्यता समेत वो बाहर आए। और मीडिया से कहा कि- "मैंने कहा था न कि जब मैं शादी करूँगा तो आप को पहले बुलाऊँगा ।" मुन्ना भाई मान गए कि आपको सब कुछ याद रहता है... और इसीलिए आपने मीडिया को बुलाया। पर हमारी याददाश्त भी कोई खास कमजोर नहीं है !
आपको याद दिला दूँ कि बाहर निकले "दत्त दंपति" के विजुअल्स याद कीजिए तो जितनी मजबूत पकड़ उनके हाथों की थी, उतनी ही मजबूती वो उस गाँठ को भी देने की कवायद कर रहे थे जिससे बँधे हुए वो बाहर आए थे। जिस पर गोला बना-बना कर चैनलों ने खूब दिखाया भी था।
पर ये क्या संजू बाबा...? वो गाँठ इतनी जल्दी ढीली पद गई...? या फिर कोई और चक्कर है...?
अब ये कौन सी बात हुई कि आप अपनी शादी बात से मुकर गए...और शादी को लिव इन रिलेशन का दर्जा दे दिया। अरे भाई "लिव इन" के लिए इतने ताम-झाम की भला कोई ज़रूरत होती है...? खैर संजू बाबा की सौ बुराइयाँ माफ़...। अरे भाई शादी में बुलाया था न ? और लड्डू भी खिलाया था न ? अरे भाई टीआरपी का लड्डू ...!!! अब क्या बच्चे की जान लोगे...!
संजू बाबा, यार कुछ भी करो पर थोड़ा संभाल के... समझे न ? अब पता नहीं तुम्हारी कौन सी खुराफात एक नया फसाना बन जाए। हमको क्या... हम तो फिर वही खा लेंगे। क्या पूछा ? अरे वही... टीआरपी के लड्डू...!!!
अभिनव राज
आपको याद दिला दूँ कि बाहर निकले "दत्त दंपति" के विजुअल्स याद कीजिए तो जितनी मजबूत पकड़ उनके हाथों की थी, उतनी ही मजबूती वो उस गाँठ को भी देने की कवायद कर रहे थे जिससे बँधे हुए वो बाहर आए थे। जिस पर गोला बना-बना कर चैनलों ने खूब दिखाया भी था।
पर ये क्या संजू बाबा...? वो गाँठ इतनी जल्दी ढीली पद गई...? या फिर कोई और चक्कर है...?
अब ये कौन सी बात हुई कि आप अपनी शादी बात से मुकर गए...और शादी को लिव इन रिलेशन का दर्जा दे दिया। अरे भाई "लिव इन" के लिए इतने ताम-झाम की भला कोई ज़रूरत होती है...? खैर संजू बाबा की सौ बुराइयाँ माफ़...। अरे भाई शादी में बुलाया था न ? और लड्डू भी खिलाया था न ? अरे भाई टीआरपी का लड्डू ...!!! अब क्या बच्चे की जान लोगे...!
संजू बाबा, यार कुछ भी करो पर थोड़ा संभाल के... समझे न ? अब पता नहीं तुम्हारी कौन सी खुराफात एक नया फसाना बन जाए। हमको क्या... हम तो फिर वही खा लेंगे। क्या पूछा ? अरे वही... टीआरपी के लड्डू...!!!
अभिनव राज
इलाहाबाद! एक गहरे बिछोह का नाता है तुझसे
इलाहाबाद आया तो दस साल की उम्र से ही घर-परिवार और दोस्तों से बार-बार बिछुड़ते रहने का इतना दंश झेल चुका था कि पत्थर बन गया था। इतना रो चुका था कि आंखों से आंसू निकलते ही नहीं थे। पलकों से लुढ़कने के पहले ही आंसू गरम तवे पर पड़े पानी की तरह छन्न से सूख जाते थे। आंसुओं को बनानेवाली ग्रंथियां भी सुन्न पड़ गई सी लगती थीं। लेकिन जब आखिरी बार इलाहाबाद छोड़ा तो कंपनी बाग, साइंस फैकल्टी के म्योर टॉवर, अपने अमरनाथ झा हॉस्टल, आनंद भवन के सामने बनी अपनी लाइब्रेरी, सीनेट हॉल, प्रयाग स्टेशन और फाफामऊ के पुल को पार करते हुए हंहक-हंहक कर रोया था। शुक्रिया इलाहाबाद, तूने मुझे फिर से रोना सिखा दिया, एक संज्ञाशून्य होते इंसान में नई संवेदना भर दी तूने।इस बात का भी शुक्रिया इलाहाबाद कि सात साल के प्रवास में तूने इतने वेगवान मंथन से गुजारा कि अमृत या विष भी जो अंदर था, निकलकर बाहर आ गया। मैंने यहीं जाना कि देश और देशभक्ति का असली मतलब क्या होता है। जीवन का क्या मतलब होता है, इतिहास क्या होता है, शासन क्या होता है, सरकार क्या होती है। मैं आज़ादी की लड़ाई के संदर्भ-प्रसंग से यहीं परिचित हुआ। साहित्य को जाना, समाज को समझा। इलाहाबाद मैं तेरा ऋणी हूं कि आज जो कुछ भी नितांत मेरा है, वह तेरा ही दिया हुआ है। मैं उन सभी लोगों का ऋणी हूं जिनके ज़रिए देश-दुनिया और समाज का ज्ञान मुझ पर पहुंचा। वो न होते तो एकदम ठन-ठन गोपाल की तरह मैं कहीं अफसर बना कुढ़ रहा होता। शुक्रिया इलाहाबाद, तूने मुझे जीने का मकसद सिखाया।
इस बात का भी शुक्रिया इलाहाबाद कि तूने ही मुझे किसी लड़की के परिपक्व प्यार से पहला परिचय कराया। दिखाया कि अपने पैरों पर खड़ा होने की 100% काबिलियत रखनेवाली एक मेधावी लड़की भी कैसे अपने जीवनसाथी के चयन जैसे निजी फैसले को भी मां-बाप की इच्छाओं के हवाले छोड़ देती है और फिर पहाड़-सी ज़िंदगी अकेले काटने का अभिशाप खुद अपने ऊपर ओढ़ लेती है। देशप्रेम, सामाजिक उत्तरदायित्व, क्रांति के प्रति समर्पण भाव और निजी प्रेम में किसको वरीयता देनी चाहिए, यह सबक भी इलाहाबाद तूने ही मुझे सिखाया। तू नहीं होता तो इतने कठिन फैसले मैं एक झटके में नहीं कर सकता।
हां, कभी-कभी लगता है कि ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होता क्या होता। लेकिन इसके पीछे भाव बस यही रहता है कि कैसे अपनी और अपने जैसे सैकड़ों नौजवानों की ऊर्जा का और ज्यादा बेहतर इस्तेमाल समाज और देशहित में हो सकता था। कहीं भी, कोई भी पछतावा नहीं है कि मैंने सात साल इलाहाबाद में रहने के दौरान जो किया, वो क्यों किया। इसलिए अगर कुछ लोग कहते हैं कि मैं उस जीवन-खंड को डिनाउंस करता हूं तो मेरे प्यारे इलाहाबाद, तू उनकी बातों को दिल पर मत लेना क्योंकि वे जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। पंथ की सोच से आच्छादित, जड़ों से कटे हुए, आत्मरति के शिकार हैं ये लोग। दया के पात्र हैं। नॉस्टैल्जिया में जीना इनकी मजबूरी है क्योंकि आज इनका व्यक्ति इतने ठहराव का शिकार हो चुका है कि कुछ भी साफ-साफ नहीं दिखता। इतने जड़ हो चुके हैं कि जड़ता को तोड़ने की इनकी सहज मानवीय इच्छा तक जड़ हो गई है।
इलाहाबाद छोड़ने के कई साल बाद वहां गया तो बस जहां-तहां भटकता रहा। कहां जाता? कहीं कोई और कुछ भी तो अपना नहीं बचा था। साइंस फैकल्टी में जाता तो कहां जाता। कोई क्लास तो लगनी नहीं थी अपनी। गुरुजनों से मिलना बेमतलब था क्योंकि इतनी कम क्लासेज़ में गया था कि कोई पहचानता ही नहीं। म्योर नाम के औपनिवेशिक तमगे पर गर्व करनेवाले अमरनाथ झा हॉस्टल में जाता तो किसके पास? हां, उसके दरवाज़े तक ज़रूर गया था। लेकिन न कोई देखनेवाला था, न पहचानने वाला। कर्नलगंज, कटरा, यूनिवर्सिटी रोड, यूनियन हॉल, सीनेट हॉल, वीमेंस हॉस्टल, ताराचंद, बैंक रोड, लक्ष्मी चौराहा, ममफोर्डगंज, अल्लापुर, सोहबतियाबाग... पूरे दिन हर उस जगह से गुजरता रहा जहां से तनिक-भी यादें जुड़ी थीं।
फिर शाम को ट्रेन पकड़कर अपने गांव की ओर रवाना हो गया। लेकिन आज भी लगता है कि मेरा कोई अंश अब भी कहीं इलाहाबाद में छूटा हुआ है। वह अब भी वहीं कहीं भटकता है। डेलीगेसी में, हॉस्टलो में, सड़कों पर चौराहों पर। नशे के आगोश में डूबते लड़कों में, कंप्टीशन की तैयारी करते मृग मरीचिका की सैर करते छात्रों में, बेरोज़गारी की जिल्लत में डूबे बूढ़े होते नौजवानों में। न जाने किस अधूरे मकसद को पूरा करने की तलाश है उसे। इसी तरह और भी टुकड़े हैं मेरे। कोई टुकड़ा नैनीताल में है तो कोई फैज़ाबाद में और कोई गोरखपुर में। लेकिन वर्तमान से इतना घिरा रहता हूं कि बाकी टुकड़ों का होश तभी आता है, जब कोई बताता है, जतलाता है, याद दिलाता है।
Monday, April 7, 2008
टीआरपी का गेमप्लान
नवजवान जब कॉलेज की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में निकलता है तो उसे क्या पता कि बाजार नाम की चीज भी आ गयी है। वह दिन रात कड़ी मेहनत करता है...एक सिफ्ट में नहीं बल्कि दो-दो सिफ्ट में काम करता है...वह आशावान रहता है कि आज नहीं तो कल नौकरी हाथ लगेगी। लेकिन जब तक उसे बाजार की समझ की तिकड़म का पता चलता है तब तक काफी समय निकला चुका होता है और वह टीआरपी के चक्कर में फंस कर हाय तौबा करने लगता है। मैं बात कर रहा हूं मीडिया की जो इन दिनों टीआरपी के गेमप्लान में फंसता जा रहा है और खबरों की जगह प्रोग्राम को जगह दिया जाने लगा है...चैनेल के अंदर लगातार मीटिंग करने का शिलशिला जारी रहता है और नवजवानों की भीड़ लगातार चैनेल के बाहर बढ़ती जाती है। अगर उनमें से कोई एक सफल हो जाता है तो उसके चेहरे पर खुशियां छा जाती है और अपने आप को एक अलग ग्रुप में समझने लगता है। आज नवजवानों भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है उनमें खबरों की ललक कम, मगर पैसा और सोहरत कमाने की ललक ज्यादा रहती है और वह अपने को उसी भीड़ में शामिल कर रहे है जिनकी गुणवत्ता लगातार काम होती जा रही है। अगर चैनेलों के टीआरपी चार्ट पर एक नजर डाले तो हमें पता चल जाएगा कि पिछले तीन से चार सालों में चैनेलों का स्तर क्या रहा है? टीआरपी के चक्कर से हम तभी सामना कर पाएंगे जब हम एक सही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से काम करेंगे। और एक बात रोजगार का अवसर तभी बढ़ेगा जब हमें शिक्षा का अवसर समान रूप से मिलेगा और हर एक नवजवान अपने-अपने क्षेत्र में रोजगार को बढ़ाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करेगा।
Sunday, April 6, 2008
As the song goes...
I don't believe in superstars,
Organic food and foreign cars.
I don't believe the price of gold;
The certainty of growing old.
That right is right and left is wrong,
That north and south can't get along.
That east is east and west is west.
And being first is always best.
But I believe in love.
I believe in babies.
I believe in Mom and Dad.
And I believe in you.
Well, I don't believe that heaven waits,
For only those who congregate.
I like to think of God as love:
He's down below, He's up above.
He's watching people everywhere.
He knows who does and doesn't care.
Sometimes I wonder who I am.
But I believe in love.
I believe in music.
I believe in magic.
And I believe in you.
Well, I know with all my certainty,
What's going on with you and me,
Is a good thing.
It's true, I believe in you.
I don't believe virginity,
Is as common as it used to be.
In working days and sleeping nights,
That black is black and white is white.
That Superman and Robin Hood,
Are still alive in Hollywood.
That gasoline's in short supply,
The rising cost of getting by.
But I believe in love.
I believe in old folks.
I believe in children.
I believe in you.
But I believe in love.
I believe in babies.
I believe in Mom and Dad.
And I believe in you.
Organic food and foreign cars.
I don't believe the price of gold;
The certainty of growing old.
That right is right and left is wrong,
That north and south can't get along.
That east is east and west is west.
And being first is always best.
But I believe in love.
I believe in babies.
I believe in Mom and Dad.
And I believe in you.
Well, I don't believe that heaven waits,
For only those who congregate.
I like to think of God as love:
He's down below, He's up above.
He's watching people everywhere.
He knows who does and doesn't care.
Sometimes I wonder who I am.
But I believe in love.
I believe in music.
I believe in magic.
And I believe in you.
Well, I know with all my certainty,
What's going on with you and me,
Is a good thing.
It's true, I believe in you.
I don't believe virginity,
Is as common as it used to be.
In working days and sleeping nights,
That black is black and white is white.
That Superman and Robin Hood,
Are still alive in Hollywood.
That gasoline's in short supply,
The rising cost of getting by.
But I believe in love.
I believe in old folks.
I believe in children.
I believe in you.
But I believe in love.
I believe in babies.
I believe in Mom and Dad.
And I believe in you.
Friday, April 4, 2008
Maha Shiva raatri
Ashok Bhai ne abhi kal hi aadesh kiya ki kuch naya kam nahin dikh raha hain tumhara...ye sahi bhi hain kyonki idhar beech mai thoda gharelu karadon ke chalte maidan se bahar raha halanki niyati dwara diya gaya ye nirwasan abhi poora hone ka naam nahin le raha hain phir bhi ashok bhai ke aadesh ka samman karte huye ye kuch purani tasveeren bhej raha hoon mulahiza farmayen....ek raaz ki bat ye ki mai aajkal Reporter banne ke phiraq mai laga hoon jo ki moolatah mai hoon....hindi font na hone ke karan yahan roman mai hi likha ja sakta hai ....maaf kariyega.... Har Har mahadev.....Tuesday, March 18, 2008
Sunday, February 24, 2008
samagh mai nahi aayega...
Bahut sahi.........PHOTU...rohit ji man kar raha hain ki kaash....ham bhi hote wahan....
kai bhai logon ko lag raha hain ki chay bathaqi ko garam karne ki zarurat hai.....waise bhi tanda matlab koka cola aur bhi Bidesi chizon se parhez karna chahiye...aur hamara to mijaz hi thoda garam hain....garmi hoti achchi cheez hain par is mohalle mai kabhi kabhi daman jala deti hain...kul mila ke garma garm jab tak chay type ki cheez ho tabhi tak sahi ....
kai bhai logon ko lag raha hain ki chay bathaqi ko garam karne ki zarurat hai.....waise bhi tanda matlab koka cola aur bhi Bidesi chizon se parhez karna chahiye...aur hamara to mijaz hi thoda garam hain....garmi hoti achchi cheez hain par is mohalle mai kabhi kabhi daman jala deti hain...kul mila ke garma garm jab tak chay type ki cheez ho tabhi tak sahi ....
बहुरूपिया......



देखो देखो.........
शहर की बीच सड़क पर भेष बदले शांती का संदेश दे रहा है बहुरूपिया।
और टकटकी लगाये लोग तख्ती पर नजर डाले बगैर
देख रहे हैं बहुरूपिया के अजब गजब चेहरे को।
ये बहुरूपिया रोज निकलता है नये नये भेष में।
लोग सिर्फ उसके रूप रंग पर मर जाते हैं,
कोई नही समझता उसकी चाल को।
कोई नही समझता उसके संदेश को।
सब कुछ नाटक सा चलता रहता है
शहर की सड़को वाले रंगमंच पर।
हे बहुरूपियें तुम रोज निकलो शांति संदेश के साथ
कभी न कभी लोग तुम पर नही तुम्हारी तख्ती पर नजर जरूर डालेगें।
Sunday, February 17, 2008
Friday, February 15, 2008
itna sanatta kahe bhai
ka bhai ka matlab hai valentine wale din baithkeee mein itna sanatta. inext mein praveen ji ka article chappa hai in the favour of love. aap logo ne pada. agar pada to phir uske baad bhi itni prem virodhi chuppi kyon. shiv sena walen se dar rahe ho ka bhai logo. aur ha sunil bhai aaj kal 11 baje so kar ut rahe hai. badiya photo dekhe to jamana beet gaya.bus city light mein mast hai .aur ha ashok sir aap se request type ki cheej hai ki prabhat sir ko tatkal prabhav se invite kar di jiye taki bakiti ka star thoda uccha uth jaaye. waise bhai sahab agle do char din mein allahabad aane ka mood bana rahe hain.
Wednesday, February 13, 2008
हम भी पा गए चाय बथ्की
पढें लिखे टू थोड़ा बहत हम भी है लेकिन चाय बठकीकी आप लोगो की बेकती नही पड़ पा रहा था .दरअसल पढें लिंखे लोगो को उन्पद बना देने की जो इंटरनेशनल खुराफात चल रही है मैं भी उसका सिकार हो गया था । खैर मैंने अपने देसी जुगाड़ से इस तरकीब से निपट लिया है .और हा अशोक सर आपने बाकि ब्लोग्गेर्स से हम लोगो का परिचय कराया इसके लिए सुक्रिया .लेकिन सुनील भाई इस बात से बहुत नाराज थे की आप उनको भी किसी परिचय का मोहताज समझ रहे है अपन अल्लाहबदी है टैब कहे का परिचय .बाकि जो अलाहाबाद मां दुई बच्चा अखबार गएँ है उई बैया बैया चले लगे की नही .बाकि सब तीख है मरत की चाय मैं चीनी जादा है .
Tuesday, February 12, 2008
साहित्य की अलख जगाये रखिये...
सभी बैठक बाज़ भाइयों को नमस्कार।
कम्प्यूटर जी कुछ दिनों से हमसे नाराज़ चल रहे थे (कुछ तकनीकी कारणों से चाय बैठकी का पेज खुल नही रहा था) पर आज हमारे और कम्प्यूटर जी के बीच सभी गिले-शिकवे दूर हो गए। और शायद इसीलिए आपके सामने आ सका हूँ। बीते एक-दो पखवारे में बैठक बाज़ी को जैसे ग्रहण लग गया है। मैं आज लौटा तो मुझे कुछ ऐसा ही लगा। भाई संदीप सिंह और अजय राय जी भी कहीं और व्यस्त हो गए हैं। उनसे ये अपेक्षा नहीं है। और हाँ कुछ नए साथी जुडे तो ज़रूर पर उनकी मौजूदगी को शब्दों के जरिये नहीं महसूसा जा सका। हाँ एक बात और, संदीप सिंह की बेहतरीन लेखनी के लिए उन्हें बधाई और साधुवाद। ठिठुरन भरे इस सर्द मौसम में साहित्य की अलख जगाये रखिये... अगर वास्तव में बैठक बाज़ी के शौकीन हैं तो।
आपके शब्दों के इंतज़ार में, आपका भाई
अभिनव राज
कम्प्यूटर जी कुछ दिनों से हमसे नाराज़ चल रहे थे (कुछ तकनीकी कारणों से चाय बैठकी का पेज खुल नही रहा था) पर आज हमारे और कम्प्यूटर जी के बीच सभी गिले-शिकवे दूर हो गए। और शायद इसीलिए आपके सामने आ सका हूँ। बीते एक-दो पखवारे में बैठक बाज़ी को जैसे ग्रहण लग गया है। मैं आज लौटा तो मुझे कुछ ऐसा ही लगा। भाई संदीप सिंह और अजय राय जी भी कहीं और व्यस्त हो गए हैं। उनसे ये अपेक्षा नहीं है। और हाँ कुछ नए साथी जुडे तो ज़रूर पर उनकी मौजूदगी को शब्दों के जरिये नहीं महसूसा जा सका। हाँ एक बात और, संदीप सिंह की बेहतरीन लेखनी के लिए उन्हें बधाई और साधुवाद। ठिठुरन भरे इस सर्द मौसम में साहित्य की अलख जगाये रखिये... अगर वास्तव में बैठक बाज़ी के शौकीन हैं तो।
आपके शब्दों के इंतज़ार में, आपका भाई
अभिनव राज
Monday, February 11, 2008
Wednesday, January 30, 2008
sab kuch swikaar...namaskaar, vyavhaar, pratikaar.....
Aap sabke aashirwaad se wo din aaya bhi aur ghuzar bhi gaya...lekin ye thand ka mausam pata nahin kyun ekdam chipak sa gaya hain...jabki use bhi ye maalum hain ki Elahabaad mai kuch nai na...kal tak jo zara sa kuch tha wo bhi pichali raat rajdhani ke saath kalkatta chala gaya...
kulmila ke maamla ye ki bhaiya thand maharaj kuch raham karo aur agar ruke hau to unke aane tak ruke hi rahau..
aap logon ke aashirwaad ka aakanchi......ab to ham dono hi ....
kulmila ke maamla ye ki bhaiya thand maharaj kuch raham karo aur agar ruke hau to unke aane tak ruke hi rahau..
aap logon ke aashirwaad ka aakanchi......ab to ham dono hi ....
Sunday, January 27, 2008
Saturday, January 26, 2008
AGALI BAAR LENAA
abki baar kisi ko nahin mila bhartratna kyoki hamane nahin liya.
pdma purskar videshiyon ka ho gaya. sonia ko mayake walon se naari sulabh prem hai. isliye use liya nahin. raajdeep, barkha angreji bolate hain. vinod dua desh kha rahe hain. inko mila theek hua. ham baad main lenge.
pdma purskar videshiyon ka ho gaya. sonia ko mayake walon se naari sulabh prem hai. isliye use liya nahin. raajdeep, barkha angreji bolate hain. vinod dua desh kha rahe hain. inko mila theek hua. ham baad main lenge.
Thursday, January 24, 2008
ki हम भी जुड़ ही गए
अशोक जी चाय बैठकी में आमंत्रण के लिए धन्यवाद .काफ़ी पर चाय हमेशा भारी पड़ जाती है Abhimanu जी को शादी कि बधाई उनकी शादी के बाद के सफर के लिए शुभकामनाये एवं न पहुंच पाने के लिए माफ़ी
शुभकामनाएं ....
मित्रों ,
चाय बैठकी के साथी अभिमन्यु शर्मा १९ जनवरी को विवाह बन्धन में बंध गए ...पूरी चाय बैठकी कि टीम कि तरफ से उनके सुखी दाम्पत्य जीवन शुभ कामनाएं ....
परम्परा विवाह को बन्धन कहने कि है ...सो भैया बन्धन मुबारक ...जल्दी भौजी के साथ चाय बैठकी माँ आयो..
चाय बैठकी के साथी अभिमन्यु शर्मा १९ जनवरी को विवाह बन्धन में बंध गए ...पूरी चाय बैठकी कि टीम कि तरफ से उनके सुखी दाम्पत्य जीवन शुभ कामनाएं ....
परम्परा विवाह को बन्धन कहने कि है ...सो भैया बन्धन मुबारक ...जल्दी भौजी के साथ चाय बैठकी माँ आयो..
Wednesday, January 23, 2008
बिदक गई ख़बर....
अभिनव भाई की परोसी चंद तस्वीरों की बानगी के बाद बहुतों की आस को आज बड़ा धक्का लगा होगा। रूमानियत से थोड़ा भी वास्ता रखने वाले लोगों के लिए खबर भी सदमा पहुंचाने जैसी ही है......ब्रूनी भारत नहीं आ रहीं हैं।
जी हां वही ब्रूनी जो भारत दौरे से पहले ही मीडिया के लिए गर्मागर्म खबर बन गईं थीं। चैनल और अखबार उस गर्माहट का ताप भी महसूस कराने लगे थे। दरअसल फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी गणतंत्र दिवस के दिन भारत के खास मेहमान हैं।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर आ रहे निकोलस के साथ उनकी महिला मित्र कार्ला ब्रूनी के भी भारत आने की संभावना थी, क्योंकि राष्ट्रपति महोदय का इश्क इस कदर परवान चढ़ चुका है कि हर वक्त ब्रूनी और वो साथ ही देखे जाते हैं ऐसे में दोनो के साथ भारत आने की भी उम्मीदें थी लेकिन एक सवाल इन उम्मीदों के आड़े आ रह था वो था...प्रोटोकॉल।
सियासत से वास्ता रखने वालों को शायद ये सवाल उतना परेशान नहीं कर रहा था जितना बिरादरी के बंधुओं को। वजह साफ है दौरे के दौरान ब्रूनी की मौजूदगी खबरनवीशों को अभी से ठंढ़ी में गर्मी का अहसास देने लगी थी, वो तो खबर को इस तरह दुहने में जुटे की अधिकारियों को भी पसीने छूटने लगे उन्होंने भी मसला जल्दी सुलझाने के लिए मानो दबाव बनाना शुरू कर दिया ताकि दौरे के बाद उन्हें प्रोटोकॉल में हुई चूक का तकाज़ा देकर बधिया न किया जा सके।
नतीजा अब खूबसूरत मॉडल ब्रूनी राष्ट्रपति निकोलस के साथ भारत नहीं आ रही हैं।
पन्हाय से पहिले दुहै का नतीजा अब सामने है, बिचक गई न (ख़बर) अब बाल्टी लिए बैठे न रहो आग बारौ हाथ सेंकौ.....साथ मा चार कट के ऑडर भी कै देव दिगाव और धुंआ उड़ाव, तबौ गर्मी न आवै तौ नीचे परोसी गई तस्वीरन पर एक बार फिर से नज़र डाल लेव।.....जिंदाबाद।
जी हां वही ब्रूनी जो भारत दौरे से पहले ही मीडिया के लिए गर्मागर्म खबर बन गईं थीं। चैनल और अखबार उस गर्माहट का ताप भी महसूस कराने लगे थे। दरअसल फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सर्कोजी गणतंत्र दिवस के दिन भारत के खास मेहमान हैं।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर आ रहे निकोलस के साथ उनकी महिला मित्र कार्ला ब्रूनी के भी भारत आने की संभावना थी, क्योंकि राष्ट्रपति महोदय का इश्क इस कदर परवान चढ़ चुका है कि हर वक्त ब्रूनी और वो साथ ही देखे जाते हैं ऐसे में दोनो के साथ भारत आने की भी उम्मीदें थी लेकिन एक सवाल इन उम्मीदों के आड़े आ रह था वो था...प्रोटोकॉल।
सियासत से वास्ता रखने वालों को शायद ये सवाल उतना परेशान नहीं कर रहा था जितना बिरादरी के बंधुओं को। वजह साफ है दौरे के दौरान ब्रूनी की मौजूदगी खबरनवीशों को अभी से ठंढ़ी में गर्मी का अहसास देने लगी थी, वो तो खबर को इस तरह दुहने में जुटे की अधिकारियों को भी पसीने छूटने लगे उन्होंने भी मसला जल्दी सुलझाने के लिए मानो दबाव बनाना शुरू कर दिया ताकि दौरे के बाद उन्हें प्रोटोकॉल में हुई चूक का तकाज़ा देकर बधिया न किया जा सके।
नतीजा अब खूबसूरत मॉडल ब्रूनी राष्ट्रपति निकोलस के साथ भारत नहीं आ रही हैं।
पन्हाय से पहिले दुहै का नतीजा अब सामने है, बिचक गई न (ख़बर) अब बाल्टी लिए बैठे न रहो आग बारौ हाथ सेंकौ.....साथ मा चार कट के ऑडर भी कै देव दिगाव और धुंआ उड़ाव, तबौ गर्मी न आवै तौ नीचे परोसी गई तस्वीरन पर एक बार फिर से नज़र डाल लेव।.....जिंदाबाद।
Tuesday, January 22, 2008
बधाई अभिमन्यु को
सभी साथी जो इस वक्त चाय बैठकी मे शामिल रहते थे आज आपके बाहू भोज में शामिल हैं मैं न आ सका। मेरी बधाई स्वीकार करें।
सुनील कैथवास
सुनील कैथवास
बांधो न नाव इस ठांव बंधु....
महाकवि निराला की इन पंक्तियों की संवेदनशीलता तभी महसूस हो पाती है जब नाव निराला के इंगित ठौर पर न बांधे जाने की सलाह के बावजूद बांधी जा चुकी होती है। हालांकि वो कविता में उस खतरे से आगाह करते ही दिखाई देते हैं ‘बांधो न नाव इस ठांव बंधु, पूछेगा सारा गांव बंधु’ लेकिन इस खतरे को मोल लेने का मजा छोड़ना आसान नहीं है।
कविता के मूल भाव से थोड़ा इतर जाएं तो ये ठांव बन जाता है शहर इलाहाबाद जहां देश के किसी कोने से आया व्यक्ति 'इलाहाबादी' लफ़्ज की समष्टि ही जीना चाहता है।इसके लिए चाहे कितनी ही जहालत झेलनी पड़े। खटास की लार से मुंह भर जाए तो भी थूकने के बजाए गटक जाना ही बेहतर समझा जाता है।
हालिया दिनों में नया ज्ञानोदय पत्रिका में छपे संपादकीय लेख को लेकर एक इलाहाबादी वरिष्ठ साहित्यकार (प्रकाशन भी है) ने संपादक पर बेलाग निशाना साधा। सोचा था प्रतिक्रिया स्वरूप लिखे लेख में खूब मसाला मिलेगा पर ऐसा हो नही पाया वजह वही कि वो भी ठहरे गंगा किनारे के वो भी तेलियरगंज की गंगा। संपादक जी को बखूब आता था कब चुप्पी साधनी है और कब हल्ला मचाना।
हालांकि उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में काफी पहले हुई एक बहुचर्चित फोटोग्राफी चित्र प्रदर्शनी के दौरान काटे गए बवाल के बाद शहर में ही हुई एक गोष्ठी में संपादक जी ने एक वरिष्ठ खांटी इलाहाबादी पत्रकार छायाकार प्रदीप सौरभ जी को चेताया था कि 'इस शहर (इलाहाबाद) में स्पीड ब्रेकर बहुत हैं, गाड़ी ज्यादा रफ्तार से दौड़ाने पर पटखनी तय है' , पर संपादक जी को इलाहाबाद छोड़े लंबा अर्सा बीत चुका था। अब दिल्ली में थे सो संपादकीय में जोखिम ले बैठे। इलाहाबादी पुरोधा के लिए तो मानो छींका टूटा, फुफकारता जवाबी लेख तैयार था। पर संपादक जी खतरा भांप चुके थे सो दो महीने की चुप्पी से पूरे बखेड़े की हवा निकाल गए।
वैसे तो मामला काफी पुराना है लेकिन लाश मा सांस फूकै बदे बेताब बैठकबाजन के लिए का पुराना का नया सुट्टा के साथ कट होए फिर तो आजू-बाजू धत्त-धत्त और दूसरे दिन ताज़ा मामला तैयार। दुई सुट्टा दिगै भरै का है अब चलत हई....जिंदाबाद।
कविता के मूल भाव से थोड़ा इतर जाएं तो ये ठांव बन जाता है शहर इलाहाबाद जहां देश के किसी कोने से आया व्यक्ति 'इलाहाबादी' लफ़्ज की समष्टि ही जीना चाहता है।इसके लिए चाहे कितनी ही जहालत झेलनी पड़े। खटास की लार से मुंह भर जाए तो भी थूकने के बजाए गटक जाना ही बेहतर समझा जाता है।
हालिया दिनों में नया ज्ञानोदय पत्रिका में छपे संपादकीय लेख को लेकर एक इलाहाबादी वरिष्ठ साहित्यकार (प्रकाशन भी है) ने संपादक पर बेलाग निशाना साधा। सोचा था प्रतिक्रिया स्वरूप लिखे लेख में खूब मसाला मिलेगा पर ऐसा हो नही पाया वजह वही कि वो भी ठहरे गंगा किनारे के वो भी तेलियरगंज की गंगा। संपादक जी को बखूब आता था कब चुप्पी साधनी है और कब हल्ला मचाना।
हालांकि उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में काफी पहले हुई एक बहुचर्चित फोटोग्राफी चित्र प्रदर्शनी के दौरान काटे गए बवाल के बाद शहर में ही हुई एक गोष्ठी में संपादक जी ने एक वरिष्ठ खांटी इलाहाबादी पत्रकार छायाकार प्रदीप सौरभ जी को चेताया था कि 'इस शहर (इलाहाबाद) में स्पीड ब्रेकर बहुत हैं, गाड़ी ज्यादा रफ्तार से दौड़ाने पर पटखनी तय है' , पर संपादक जी को इलाहाबाद छोड़े लंबा अर्सा बीत चुका था। अब दिल्ली में थे सो संपादकीय में जोखिम ले बैठे। इलाहाबादी पुरोधा के लिए तो मानो छींका टूटा, फुफकारता जवाबी लेख तैयार था। पर संपादक जी खतरा भांप चुके थे सो दो महीने की चुप्पी से पूरे बखेड़े की हवा निकाल गए।
वैसे तो मामला काफी पुराना है लेकिन लाश मा सांस फूकै बदे बेताब बैठकबाजन के लिए का पुराना का नया सुट्टा के साथ कट होए फिर तो आजू-बाजू धत्त-धत्त और दूसरे दिन ताज़ा मामला तैयार। दुई सुट्टा दिगै भरै का है अब चलत हई....जिंदाबाद।
Friday, January 18, 2008
स्वागत....
मित्रों ...
चाय बैठकी कि टीम में शामिल नए सदस्यों से आपका परिचय करा दूं ...
हमारा आमंत्रण स्वीकार कर आदरणीय अनिल रघुराज जी हमारे साथ आ गए हैं .आप स्टार न्यूज़ मुम्बई से जुडे हैं.हम टीम कि तरफ से उनका स्वागत करते हैं.आप इलाहाबाद विश्व विद्यालय से भी जुडे रहे हैं इस नाते हमारे सीनियर भी हुए . छात्रावास कि परम्परा के मुताबिक जम कर चाय ,बन खाइए बिल सर के मत्थे ...
बैठकी कि टीम में आई नेक्स्ट मेरठ से जुडे अनुराग शुक्ल भी शामिल हो गए हैं ,वो अपने को आंशिक इलाहाबादी कहते हैं ...पर हम उन्हें पूरा इलाहाबादी मानते हैं क्यों कि इलाहाबादकि साहित्यिक परम्परा को कायम रखते हुए उनकी कहानी लव स्टोरी वाया फ्लैश बैक " ने कथा देश पत्रिका कि कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया है ...
भाई सुनील कैथ्वास और संजय कनोजिया से तो आप परिचित ही हैं ...एक ने आई नेक्स्ट तो दुसरे ने पी टी आई और इंडियन एक्सप्रेस में अपनी तस्वीरों से झंडे गाडे हैं ...कलम से कोम्पोजिशन के उनके हुनर से आप बैठकी में जल्द ही रूबरू होंगे ...
भाई अनंत जी आजकल अहमदाबाद में फ्री लांस आर्टिस्ट के बतौर काम कर रहे हैं .बैठकी में वो रेफूजी नाम से शामिल हैं ...
बाक़ी आप लोगन के का परिचय देई ...आप खुदे समझदार हो ॥
अपने एक भाई 'इलाहाबादी' नाम से शामिल भये है ..आपन नाम नई बतावा चाहतें ...आवे वाले टाइम माँ उ खुदे आपन परिचय देइहैन ....चलते हैं ..
चाय बैठकी जिन्दाबाद....
चाय बैठकी कि टीम में शामिल नए सदस्यों से आपका परिचय करा दूं ...
हमारा आमंत्रण स्वीकार कर आदरणीय अनिल रघुराज जी हमारे साथ आ गए हैं .आप स्टार न्यूज़ मुम्बई से जुडे हैं.हम टीम कि तरफ से उनका स्वागत करते हैं.आप इलाहाबाद विश्व विद्यालय से भी जुडे रहे हैं इस नाते हमारे सीनियर भी हुए . छात्रावास कि परम्परा के मुताबिक जम कर चाय ,बन खाइए बिल सर के मत्थे ...
बैठकी कि टीम में आई नेक्स्ट मेरठ से जुडे अनुराग शुक्ल भी शामिल हो गए हैं ,वो अपने को आंशिक इलाहाबादी कहते हैं ...पर हम उन्हें पूरा इलाहाबादी मानते हैं क्यों कि इलाहाबादकि साहित्यिक परम्परा को कायम रखते हुए उनकी कहानी लव स्टोरी वाया फ्लैश बैक " ने कथा देश पत्रिका कि कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया है ...
भाई सुनील कैथ्वास और संजय कनोजिया से तो आप परिचित ही हैं ...एक ने आई नेक्स्ट तो दुसरे ने पी टी आई और इंडियन एक्सप्रेस में अपनी तस्वीरों से झंडे गाडे हैं ...कलम से कोम्पोजिशन के उनके हुनर से आप बैठकी में जल्द ही रूबरू होंगे ...
भाई अनंत जी आजकल अहमदाबाद में फ्री लांस आर्टिस्ट के बतौर काम कर रहे हैं .बैठकी में वो रेफूजी नाम से शामिल हैं ...
बाक़ी आप लोगन के का परिचय देई ...आप खुदे समझदार हो ॥
अपने एक भाई 'इलाहाबादी' नाम से शामिल भये है ..आपन नाम नई बतावा चाहतें ...आवे वाले टाइम माँ उ खुदे आपन परिचय देइहैन ....चलते हैं ..
चाय बैठकी जिन्दाबाद....
Thursday, January 17, 2008
BHARAT RATN KI DOUD.....
DOSTON, BHARATRATNA BANT RAHA HAI। ISKE LIYE ROJ NAAMANKAN HO RAHE HAIN। PRASTAVAK BHI KAMAL KE HAIN। ATAL BIHAARI VAJPEYEE KO BHARATRATNA MILANA CHAHIYE KYONKI BHARAT KI AZADI KI LADAII KE SAMAY JAWAAN THE PER UNKA KHOON NAHIN KHAOLA TAB BHEE THADE THE AUR AAJ BHI THANDE HAIN। AGRA MEN UNHONE KYA KIY CHOD DIJIYE. JYOTI BASU BANGAAL KE CM THE PAR UNKO SURJEET NE PM NAHIN BANANE DIY. BAAD MAIN PATA CHALA KI YAH AITIHASIK GALATI THEE. AB BATAO SURJIT BADE NETA KI BASU.
DR HARIBANS RAI BACHCHAN KE LIYE MANGA HAI. MAANAGANE WALE KAVI HAIN NAAM HAI NAADAN BANARSI. UNKA KAHANA HAI KI DR BACHCHAN NE ACHCHHI KAHANIYAN LIKHI HAIN. UNKI BAHU JAYAPRADA HAIN. POORE PARIVAAR NE DESH KI SEWA KI HAI. MAANGANE WAALE AMITABH KE LIYE BHEE MANG RAHE HAIN. AB AMITABH KABI N.R.I. RAHE HONGE KYA KAREN. JAWANI MEN TO GANDHI JI BHI VIDESH GAYE THE AUR SUBHASH BABU NE TO JAPAN MEN SENA TAK BANA LI THEE.
BANARAS MAIN BABULAAL RAHATE HAIN. SHAHAR KE GIRIJAGHAR CHAORAHE PAR ROJ ANE-JANE WALON KO PANKHA HANKTE RAHTE HAIN. UNHONE BADE BADON KO HAWA DI HAI. DUNIYA BHAR KE SAILANI UNKI PHOTO APANE SANG LE JATE HAIN. AISE LOKPRIYA ADAMI KO BHATATRATNA KYON NA DIYA JAY? AAP CHHEN TO APANE LIYE YAA PHIR MERE LIYE BHI BBHAARATRANA MANG SAKTE HAIN. TO CHUP NA BAITH SHURU HO JA GURU . BHARAT APANA DESH HAI. HAM ISKE RATNA HAIN. HAMNE ISKO SABSE KAM CHARA KHAYA HAI, SABASE KAM NUKSAAN PAHUCHAYA HAI. ASALI HAKDAAR HAM HAI. KYONKI HUM UN JAISO KO SAH RAHE HAIN. JHELANE KE LIYE THANKU.
DR HARIBANS RAI BACHCHAN KE LIYE MANGA HAI. MAANAGANE WALE KAVI HAIN NAAM HAI NAADAN BANARSI. UNKA KAHANA HAI KI DR BACHCHAN NE ACHCHHI KAHANIYAN LIKHI HAIN. UNKI BAHU JAYAPRADA HAIN. POORE PARIVAAR NE DESH KI SEWA KI HAI. MAANGANE WAALE AMITABH KE LIYE BHEE MANG RAHE HAIN. AB AMITABH KABI N.R.I. RAHE HONGE KYA KAREN. JAWANI MEN TO GANDHI JI BHI VIDESH GAYE THE AUR SUBHASH BABU NE TO JAPAN MEN SENA TAK BANA LI THEE.
BANARAS MAIN BABULAAL RAHATE HAIN. SHAHAR KE GIRIJAGHAR CHAORAHE PAR ROJ ANE-JANE WALON KO PANKHA HANKTE RAHTE HAIN. UNHONE BADE BADON KO HAWA DI HAI. DUNIYA BHAR KE SAILANI UNKI PHOTO APANE SANG LE JATE HAIN. AISE LOKPRIYA ADAMI KO BHATATRATNA KYON NA DIYA JAY? AAP CHHEN TO APANE LIYE YAA PHIR MERE LIYE BHI BBHAARATRANA MANG SAKTE HAIN. TO CHUP NA BAITH SHURU HO JA GURU . BHARAT APANA DESH HAI. HAM ISKE RATNA HAIN. HAMNE ISKO SABSE KAM CHARA KHAYA HAI, SABASE KAM NUKSAAN PAHUCHAYA HAI. ASALI HAKDAAR HAM HAI. KYONKI HUM UN JAISO KO SAH RAHE HAIN. JHELANE KE LIYE THANKU.
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